115 साल की हुई विश्व धरोहर कालका-शिमला रेलवे लाइन

115 साल की हुई विश्व धरोहर कालका-शिमला रेलवे लाइन
कालका-शिमला रेलवे लाइन

शिमला/ नई दिल्ली. यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल कालका-शिमला रेलवे लाइन आज 115 साल की हो गई. नौ नवंबर 1903 को शुरु की गई कालका-शिमला रेल लाइन को मूल रूप से 107 सुरंगों के बीच से निकाला गया था, लेकिन अब यह रेलवे लाइन 102 सुरंगों से होकर गुजरती है.

कालका-शिमला टॉय ट्रेन 869 पुलों और 919 तीखे मोड़ों से होकर गुजरती है. इसका सबसे कम 48 डिग्री का तीखा मोड़ इंजीनियरिंग कौशल की मिसाल है. मनमोहक वादियों से गुजरती देश की सबसे संकरी रेल लाइन बेजोड़ इंजीनियरिंग का जीता जागता उदाहरण है.

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इस रेलवे लाइन पर सबसे बड़ी सुरंग बड़ोग में है जो एक किलोमीटर लंबी है. बड़ोग सुरंग को कर्नल एस. बड़ोग के नाम पर रखा गया है जिन पर सुरंग के गलत अलाइनमेंट की वजह से हुए नुकसान के लिए ब्रिटिश सरकार ने एक रुपए का जुर्माना लगाया था. इससे आहत होकर उन्होंने इस सुरंग में आत्महत्या कर ली थी. उनकी याद में इस सुरंग का नाम बड़ोग रख दिया गया.

बाबा भलकू बाबा भलकू की देन है कालका-शिमला रेलवे लाइन

कर्नल बड़ोग की मौत के बाद इंजीनियर हेरिंगटन को इसके निर्माण का काम सौंपा गया. उन्होंने इसके निर्माण में बाबा भलकू की सहायता ली. ऐसा कहा जाता है कि बाबा भलकू ने जो रास्ता बताया उसी पर यह सुरंग बनकर तैयार हुई.

द ग्रेटेस्ट नैरो गेज इंजीनियरिंग ऑफ इंडिया’

इस क्षेत्र पर रेल लाइन बिछाने का कार्य बेहद चुनौतीपूर्ण था. चट्टानों के गिरने वाले क्षेत्रों के किनारे निर्माण करने का सवाल ही नहीं था, इसलिए पहाड़ियों की तलहटी में खोदकर रास्ता बनाना एकमात्र विकल्प था. गहरी घाटियों की कम चौड़ाई पर कार्य करने की समस्या से निपटने के लिए उन घाटियों की ऊंचाई को काटकर तथा समतल बनाकर बुद्धिमानी से पुलों का निर्माण किया गया.

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‘गिनीज बुक ऑफ रेल फैक्ट्स एंड फीट’ ने इसे ‘द ग्रेटेस्ट नैरो गेज इंजीनियरिंग ऑफ इंडिया’ बताया है. इस रेलवे लाइन को रिकॉर्ड चार वर्ष में पूरा किया गया. यूनेस्को ने 2008 में इसे विश्व धरोहर घोषित किया था.