शिमला. किसी भी राष्ट्र के विकास में शिक्षा और साक्षरता की अहम भूमिका होती है. खासतौर पर भारत जैसे दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में स्वस्थ लोकतांत्रिक मूल्यों को स्थापित करना और बनाए रखना एक शिक्षित समाज के बिना संभव नहीं है. ज्ञान और जानकारी तक पहुंचने के लिए साक्षरता पहला कदम है. यह बात अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस की पूर्वसंध्या पर राष्ट्रीय साक्षरता मिशन के पूर्व सलाहकार और प्रदेश में साक्षरता आन्दोलन के पुरोद्धा रहे डॉ. कुलदीप सिंह तंवर ने कही.
डॉ. तंवर ने कहा कि जिस तरीके से आज समाज में अंधविश्वास और रूढि़यां अपने पैर जमाने की कोशिश कर रही हैं और साम्प्रदायिक व कट्टरवादी ताकतें समाज की एकता को छिन्न-भिन्न करने की कोशिश कर रही हैं, ऐसे में साक्षरता और शिक्षा के ज़रिये ही समाज में वैज्ञानिक दृष्टिकोण पैदा किया जा सकता है और तर्कसंगत सामाजिक व्यवस्था की स्थापना हो सकती है.
उन्होंने कहा कि साक्षरता की परिभाषा में यह स्पष्ट कहा गया था कि लोग अपनी बदहाली के कारणों को समझते हुए उनसे मुक्ति की दिशा में प्रयास करें और ज़रूरत के अनुसार संगठन भी बनाएं. वहीं साक्षरता की परिभाषा में अपनी आर्थिक स्थिति को मज़बूत करने के साथ-साथ छोटे परिवार के तौर-तरीकों को अपनाने और सामाजिक बुराइयों और अंधविश्वासों के खिलाफ लड़ने का भी आह्वान किया गया था. इसलिए आज साक्षरता की परिभाषा के पुनर्पाठ की ज़रूरत है और सभी को साक्षर करने की ज़रूरत है.
डॉ. तंवर ने कहा के इस समय हिमाचल प्रदेश जैसे छोटे राज्य में भी 71,23,184 की लगभग 14 प्रतिशत आबादी निरक्षर हैं. जिसमें 10 प्रतिशत के करीब महिलाएं हैं. कुल 10,25,968 निरक्षरों में 4,70,937 लोग 14-45 साल की उम्र के हैं.
उन्होंने कहा कि प्रदेश को पूर्ण साक्षर बनाया जा सकता है, लेकिन इसके लिए राजनैतिक इच्छाशक्ति की ज़रूरत है. अगर सरकार चाहे तो राज्य के खज़ाने पर बोझ डाले बगैर भी प्रदेश को साक्षर बनाया जा सकता है. कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी के तहत साक्षरता के लिए साधन जुटाए जा सकते है. साक्षरता के लिए राष्ट्रीय सेवा योजना (एनएसएस) और एनसीसी के छात्र-छात्राओं को जि़म्मा दिया जा सकता है. लेकिन इसके लिए सरकार को नीतिगत निर्णय लेना होगा.
डॉ. तंवर ने कहा कि इसमें प्रदेश को केरल और त्रिपुरा जैसे राज्यों से सीख लेनी चाहिए, जहां सौ फीसदी साक्षरता को हासिल करने के लिए दोनों में होड़ लगी है. इन राज्यों की प्रगतिशील सरकारों ने अपने राज्यों को पूर्ण साक्षर बनाने का प्रण लिया है. त्रिपुरा राज्य ने 2011 की जनगणना में 87.22 साक्षरता दर को 2016 में 94.65 प्रतिशत तक लाकर केरल के समक्ष भी बड़ी चुनौती पेश की है. वहीं केरल ने प्राथमिक शिक्षा को सुनिश्चित करने में सौ फीसदी लक्ष्य हासिल कर लिया है. हिमाचल प्रदेश इन सभी मानाकों को हासिल कर सकता है अगर सरकार की मंशा प्रदेश को पूर्ण साक्षर बनाने की हो जाए. पूरा प्रदेश साक्षर हो सकता है.
वहीं राज्य संसाधन केन्द्र के निदेशक डॉ. ओम प्रकाश भूरेटा ने कहा कि प्रदेश में अभी केवल चंबा के अन्दर साक्षर भारत मिशन का कार्यक्रम चल रहा है लेकिन प्रदेश में अभी भी कुछ क्षेत्र ऐसे हैं जहां साक्षरता दर कम हैं. इन क्षेत्रों को चिन्हित करके वहां के लिए विशेष साक्षरता मुहिम चलाई जानी चाहिए.
उन्होंने कहा कि इस बार अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस का नारा है कि ‘डिजिटल विश्व में साक्षरता’. लेकिन डिजिटल साक्षरता से पहले हमें अंक और अक्षर की साक्षरता का लक्ष्य हासिल करना ज़रूरी है ताकि लोग डिजिटल तरीकों के इस्तेमाल करने में भय या संकोच महसूस न करें.