18 करोड़ से संवरेगी बर्फानी तेंदुए की किस्मत

18 करोड़ से संवरेगी बर्फानी तेंदुए की किस्मत

शिमला. हिमाचल आने वाले देशी-विदेशी सैलानियों की पहली पसंद हिमाचल का राजकीय पशु बर्फानी तेंदुए को बचाने के लिए नई कवायद शुरू हुई है. हिमाचल के लाहौल-स्पीती और पांगी के क्षेत्रों में पाए जाने वाले बर्फानी तेंदुए कितने सुरक्षित हैं और इनके लिए कितना भोजन उपलब्ध है, इसका अब अध्ययन किया जाएगा. इसको लेकर संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) के सहयोग से चलने वाले सिक्योर हिमाचल प्रोजेक्ट को केंद्र सरकार ने मंजूर कर लिया है.

हिमाचल प्रदेश प्रधान मुख्य अरण्यपाल (वन्य प्राणी) डॉ. आरसी कंग ने कहा कि सिक्योर हिमालय प्रोजेक्ट को मंजूरी मिल गई है. प्रोजेक्ट के तहत जहां बर्फानी तेंदुओं और जैव विविधता को संरक्षित किया जाएगा, वहीं स्थानीय लोगों को आजीविका से जोड़ा जाएगा. सिक्योर हिमालय प्रोजेक्ट के तहत वन विभाग स्थानीय लोगों को गाइड के तौर पर प्रशिक्षित करेगा, ताकि वे लोग हिम तेंदुओं के दर्शन के लिए आने वाले सैलानियों का मार्गदर्शन कर आजीविका कमा सकें.

इस प्रोजेक्ट के तहत हिमाचल के लिए 18 करोड़ रुपये की ग्रांट मंजूर की गई है. इस प्रोजेक्ट के तहत राज्य के लाहौल व पांगी क्षेत्रों में बर्फानी तेंदुए के संरक्षण के साथ-साथ जैव विविधता संरक्षण को लेकर कदम उठाए जाएंगे. सिक्योर हिमालय प्रोजेक्ट दो अक्तूबर 2017 को भारत के पर्यावरण मंत्रालय द्वारा संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) की भागीदारी में लॉन्च किया गया था. प्रोजेक्ट को हिमाचल सहित उत्तराखंड, जम्मू-कश्मीर और सिक्किम में लागू किया जाना है. राज्य सरकार की ओर से कुछ समय पहले इसका एक्शन प्लान तैयार कर केंद्र सरकार को भेजा गया था। केंद्र ने इस प्रोजेक्ट को अंतिम मंजूरी दे दी है.

हिमाचल में इस प्रोजेक्ट को लाहौल-पांगी क्षेत्रों में लागू किया जाएगा. यह प्रोजेक्ट अगले छह सालों तक चलेगा. लाहौल-स्पीति के पिन घाटी नेशनल पार्क, चंद्रताल, वाइल्ड लाइफ सेंक्चुरी और किब्बर वाइल्ड लाइफ सेंक्चुरी में हिम तेंदुओं को देखा गया है. वहीं अब इन क्षेत्रों का विस्तृत अध्ययन किया जाएगा. बर्फानी तेंदुए के लैंडस्कैप का अध्ययन कर यह देखा जाएगा कि इन इलाकों में इनके लिए कौन से जीव-जंतु उपलब्ध हैं, जिन पर ये निर्भर रहते हैं.

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इस प्रोजेक्ट में यह भी देखा जाएगा कि जिन इलाकों में हिम तेंदुए हैं वहां पर बाहरी हस्तक्षेप कितना है और तेंदुओं को शिकारी और बाहरी लोगों से कितना खतरा है. इन इलाकों में सैलानियों की गतिविधियां कैसी हैं, और इनका तेंदुओं पर क्या असर पड़ रहा है. जिन इलाकों में हिम तेंदुए रहते हैं, वहां पर क्या लोग जड़ी-बूटियों व अन्य वन संपदा का दोहन करते हैं. इस तरह हिम तेंदुओं से संबंधित विभिन्न पहलुओं का अध्ययन कर हिम तेंदुओं समेत दूसरे वन्यजीवों का संरक्षण और वासस्थल का विकास किया जाएगा. संरक्षित क्षेत्रों से सटे गावों में इको टूरिज्म, जड़ी-बूटी और फलोत्पादन, रोजगारपरक प्रशिक्षण इत्यादि पर बल दिया जाएगा.

दुर्लभ जीव है बर्फानी तेंदुआ

बर्फानी तेंदुआ एक सुंदर जानवर है, लेकिन इसकी गुर्राहट डराने के लिए काफी है. यह अत्यंत दुर्लभ जीव है. यह देश के कुछ खास चिड़ियाघरों में ही दिखाई देता है. यह हिमालय की ऊंची पर्वत श्रंखलाओं में वृक्षविहीन जगह पर देखने को मिलता है. यह समुद्रतल से 3600 मीटर से लेकर लगभग 4000 मीटर की ऊंचाई पर पाया जाता है. यह दुर्गम शिखरों पर घूमता रहता है. सामान्यत: यह कश्मीर से भूटान के मध्य के क्षेत्र में नजर आता है. प्राणि विज्ञान के अनुसार इस वन्यजीव का नाम पांतेरा उंचिआ है. अंग्रेजी में इसे स्नो लेपर्ड कहते हैं. सामान्य तेंदुए की तुलना में यह कुछ छोटा होता है. इसका माथा ऊंचा होता है तथा छोटी-सी थूथनी होती है.

इसकी पूंछ की लंबाई करीब 90 सेंटीमीटर तक होती है, जबकि इसकी लंबाई एक मीटर के आसपास होती है. एक वयस्क हिम तेंदुए का वजन 35 से 40 किग्रा के बीच होता है. इसका रंग एकदम सफेद न होकर कुछ मैला सफेद जैसा होता है और पूरे शरीर पर मुलायम रोंए होते हैं. सफेद रंग की खाल पर काले रंग के धब्बे के कारण यह बर्फ और चट्टानों के बीच नजर नहीं आता. इससे इसे घात लगा कर शिकार करने में आसानी रहती है. हिम तेंदुए का जीवनकाल 15-20 वर्ष का होता है.

रात में शिकार के लिए प्रसिद्ध है बर्फानी तेंदुआ

बर्फानी तेंदुए बर्फ से ढके निर्जन इलाकों में अकेले रहने के आदी होते हैं. ये प्राय: दिन में सोते हैं तथा रात में शिकार पर निकलते हैं. शिकार करने के लिए यह बिजली सी फुर्ती से छलांग लगाते हैं. चट्टानों पर छलांग लगाने में लंबी पूंछ इनकी सहायता करती है. जंगली बकरी, खरगोश, कस्तूरी मृग आदि इनका शिकार होते हैं. गड़रिये जब भेड़-बकरी चराने जाते हैं तो यह मौका देख भेड़-बकरियों का शिकार भी कर लेते हैं.

बर्फानी तेंदुए की खुराक शेर और बाघ की तुलना में कम होती है, लेकिन देखने में यह उतने ही रोबीले लगते हैं. सर्दियों में करीब 1500 से 1800 मीटर तक निचले स्थानों पर आ जाते हैं. अत्यधिक ऊंचाई पर प्राकृतिक आवास के कारण यह काफी हद तक सुरक्षित रहते हैं. आज इन्हें इंसानों से अधिक खतरा है. यही कारण है कि इन्हें संकटग्रस्त जीवों की सूची में शामिल किया गया है. पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग में हिम तेंदुआ संरक्षण केंद्र है.