कोरोना के चलते बंद हुए स्कूलों का बच्चों की पढ़ाई पर गहरा प्रभाव, 37 फिसदी ग्रामीण बच्चे बिल्कुल नहीं कर रहे पढ़ाई जबकि 48 फीसदी को कुछ शब्दों के अलावा कुछ नहीं आता : सर्वे

कोरोना के चलते बंद हुए स्कूलों का बच्चों की पढ़ाई पर गहरा प्रभाव, 37 फिसदी ग्रामीण बच्चे बिल्कुल पढ़ाई नहीं कर रहे जबकि 48 फीसदी को कुछ शब्दों के अलावा कुछ नहीं आता : सर्वे - Panchayat Times
The teacher teaches students with all covid-19 norms in MP. Pic from :- School Education Department, MP

नई दिल्ली. कोरोना महामारी के कारण पिछले लगभग डेढ़ साल से बंद चल रहे स्कूलों का बच्चों की पढ़ाई पर गहरा प्रभाव पड़ा है. ‘‘लॉक्ड आउट : इमरजेंसी रिपोर्ट ऑन स्कूल एजुकेशन” शीर्षक के साथ जारी एक नये सर्वेक्षण में दावा किया गया है कि 37 फिसदी ग्रामीण बच्चे बिल्कुल पढ़ाई नहीं कर रहे हैं और 48 फीसदी बच्चों को पढ़ाई के नाम पर कुछ शब्दों के अलावा कुछ नहीं आता है.

कितना बड़ा है सर्वे का दायरा

इस सर्वेक्षण को 15 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के वंचित परिवारों से आने वाले करीब 1,400 स्कूली बच्चों पर अगस्त महीने के दौरान किया गया. जिन राज्य के परिवारों को सर्वेक्षण में शामिल किया गया उनमें असम, बिहार, दिल्ली, हरियाणा, झारखंड, महाराष्ट्र, पंजाब, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल शामिल हैं.

ग्रामीण इलाकों में केवल 28 फिसदीबच्चे ही नियमित तौर पर कर रहे है पढ़ाई

सर्वेक्षण में कहा गया है, ‘‘इस सर्वेक्षण से जो तस्वीर सामने आई है वह घोर निराशाजनक है. सर्वेक्षण के समय ग्रामीण इलाकों में केवल 28 फिसदीबच्चे ही नियमित तौर पर पढ़ाई कर रहे थे जबकि 37 फिसदीबच्चे बिल्कुल पढ़ नहीं रहे हैं. सामान्य पढ़ाई की क्षमता को लेकर सर्वेक्षण के नतीजे आगाह करने वाले है क्योंकि इसमें शामिल करीब आधे बच्चे कुछ शब्दों के अलावा कुछ भी नहीं पढ़ पा रहे थे.’

क्या है शहरों की स्थिति

सर्वेक्षण में दावा किया गया है कि शहरी इलाकों में नियमित तौर पर पढ़ाई करने वाले, बिल्कुल पढ़ाई नहीं करने वाले और कुछ शब्दों से अधिक न पढ़ पाने वाले बच्चों की संख्या क्रमश: 47 फिसदी, 19 फिसदी और 42 फिसदी है.

वंचित बस्तियों पर केंद्रित था सर्वेक्षण

एससीएचओओएल ने बताया कि उसका सर्वेक्षण वंचित बस्तियों पर केंद्रित था जहां पर रहने वाले बच्चे आम तौर पर सरकारी स्कूलों में पढ़ने जाते हैं. सर्वेक्षण के मुताबिक नियमित रूप से ऑनलाइन कक्षा में भाग लेने वाले विद्यार्थियों का अनुपात शहरी और ग्रामीण इलाकों में क्रमश: चौबीस और आठ फिसदी है.

पैसे की कमी, खराब कनेक्टिविटी या स्मार्टफोन नही होना प्रमुख कारण

सर्वेक्षण के अनुसार पैसे की कमी, खराब कनेक्टिविटी या स्मार्टफोन नही होना विद्यार्थियों तक ऑनलाइन शिक्षा की सीमित पहुंच के कुछ कारण रहे. एससीएचओओएल सर्वे ने अपनी रिपोर्ट में कहा, ‘‘इसके लिए एक कारण अध्ययन में शामिल परिवारों (ग्रामीण इलाकों में आधे) के पास स्मार्टफोन ही नहीं है. लेकिन यह महज पहली बाधा है क्योंकि जिन परिवारों के पास स्मार्टफोन है उनमें भी नियमित रूप से ऑनलाइन अध्ययन करने वाले विद्यार्थियों का अनुपात कम है.

शहरी इलाकों में यह अनुपात 31 फिसदी और ग्रामीण इलाकों में यह 15 फिसदी रहा. स्मार्टफोन का अक्सर इस्तेमाल परिवार में काम करने वाला वयस्क करता है और यह बच्चों के लिए उपलब्ध नहीं हो पाता, खासतौर पर दो या उससे अधिक बच्चे होने पर परिवार के छोटे सदस्य को.”

दलित और आदिवासी परिवारों की स्थिति और अधिक खराब

सर्वेक्षण के मुताबिक वंचित परिवारों में भी दलित और आदिवासी परिवारों की स्थिति अधिक खराब है. उदाहरण के लिए ग्रामीण इलाकों में अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति के परिवारों के केवल चार फिसदी बच्चे ही नियमित तौर पर ऑनलाइन पढ़ाई करते हैं जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में अन्य विद्यार्थियों की संख्या 15 फिसदी है. इनमें से करीब आधे बच्चे कुछ शब्दों के अलावा कुछ भी नहीं पढ़ सकते.

सर्वेक्षण के मुताबिक, अधिकतर अभिभावकों का मानना है कि उनके बच्चे की पढ़ने और लिखने की क्षमता लॉकडाउन के दौरान कम हुई है. यहां तक कि 65 फिसदी शहरी अभिभावक भी ऐसा मानते हैं. इसके उलट केवल चार फिसदी अभिभावक मानते हैं कि उनके बच्चों की क्षमता सुधरी है. ग्रामीण इलाकों में रहने वाले अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति अभिभावकों में से 98 फिसदी चाहते हैं कि स्कूलों को जल्द से जल्द खोला जाना चाहिए.

किसने किया सर्वे

इस सर्वेक्षण को करने में करीब 100 स्वयंसेवकों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और रिपोर्ट समन्वय समिति ने तैयार की जिसमें अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज और निराली बाखला जैसी प्रसिद्ध हस्तिंया भी शामिल थीं.