नई दिल्ली. सर्दियों के शुरू होते ही दिल्ली में हवा एक बार फिर जहरीली होती जा रही है। हर साल की तरह इस बार भी राजधानी खतरनाक स्तर के प्रदूषण से जूझ रही है। 18 नवंबर को केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के 24 घंटे के आंकड़ों में दिल्ली का AQI 374 दर्ज किया गया, जो “बहुत खराब” श्रेणी में आता है। स्विट्ज़रलैंड की एयर क्वालिटी मॉनिटरिंग कंपनी IQAir ने अपनी अक्टूबर 2025 की रिपोर्ट में दिल्ली को दुनिया के शीर्ष 10 सबसे प्रदूषित शहरों में शामिल किया है। 14 अक्टूबर की सुबह दिल्ली को दुनिया का सबसे प्रदूषित बड़ा शहर बताया गया। यूनिवर्सिटी ऑफ़ शिकागो की Air Quality Life Index (AQLI) 2025 रिपोर्ट के अनुसार, अगर दिल्ली की हवा विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के स्तर तक साफ हो जाए, तो यहां रहने वाला एक व्यक्ति अपनी जिंदगी के लगभग 8 साल अधिक जी सकता है।
इसी बीच हाल के हफ्तों में प्रदूषण बढ़ने के बाद कई जगहों पर लोग, पर्यावरण संगठनों और स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं ने प्रदर्शन शुरू कर दिए हैं। उनकी मांग है कि सरकार सख्त कदम उठाए और स्थिति पर साफ-साफ जानकारी दे।
लेकिन इस पूरे संकट के बीच एक महत्वपूर्ण सवाल उठ रहा है
क्या दिल्ली के पास इतना मजबूत मॉनिटरिंग सिस्टम है कि वह अपने हर इलाके में हवा की गुणवत्ता सही तरीके से माप सके?
दिल्ली में मॉनिटरिंग सिस्टम कैसे काम करता है?
विशेषज्ञों के अनुसार एयर क्वालिटी मॉनिटरिंग के तीन स्तर होने चाहिए: रेगुलेटरी मॉनिटरिंग (सरकारी मानकों के हिसाब से निगरानी,दिल्ली में ऐसे 38 स्टेशन हैं। ये रियल-टाइम में 8 प्रमुख प्रदूषकों को मापते हैं। नियमों के मुताबिक, 50 लाख से ज्यादा आबादी वाले शहर में कम से कम 12 स्टेशन होने चाहिए। लेकिन दिल्ली की आबादी 2 करोड़ से ज्यादा है, इसलिए उसके हिसाब से दिल्ली में कम से कम 52 स्टेशन होने चाहिए।
रेफ़रेंस मॉनिटरिंग (डेटा की जांच और गुणवत्ता नियंत्रण)
ये लैब-ग्रेड मशीनें होती हैं जो यह जांचती हैं कि सरकारी मॉनिटर्स सही काम कर रहे हैं या नहीं।
लोकल एरिया मॉनिटरिंग (इलाका-स्तर पर निगरानी)
ये सबसे जरूरी हैं, क्योंकि यह देखते हैं कि किस मोहल्ले में कितना प्रदूषण है। किस जगह ट्रैफिक, निर्माण कार्य या फैक्ट्रियों की वजह से प्रदूषण ज़्यादा है। यही सिस्टम दिल्ली में बेहद कमजोर है।
दिल्ली में मॉनिटरिंग गैप कितना बड़ा है?
एक मॉनिटरिंग स्टेशन लगभग 2 किलोमीटर के दायरे का डेटा देता है। लेकिन इंडिया स्पेंड की रिपोर्ट के अनुसार केवल 34.5% दिल्ली क्षेत्र ही किसी स्टेशन की कवरेज में आता है। यानी 66% दिल्ली बिना भरोसेमंद डेटा के सांस ले रही है। दिल्ली के केंद्रीय और अमीर इलाकों में ज्यादा मॉनिटरिंग स्टेशन हैं, जैसे,इंडिया गेट,लोधी रोड,चांदनी चौक,सिविल लाइंस लेकिन बाहरी दिल्ली के क्षेत्र जहां प्रदूषण ज्यादा है-वहां मॉनिटरिंग बेहद कम है, जैसे,बवाना,वैशाली,छतरपुर,गोकलपुर,ककरोला आयानगर यहीं पर फैक्ट्रियां, ईंट भट्टे, कचरा जलाना और भारी ट्रक यातायात जैसे प्रदूषण स्रोत हैं।
कम कीमत वाले मॉनिटर का रोल
कम कीमत वाले पोर्टेबल सेंसर अब कई जगह लगाए जा रहे हैं, ताकि खाली जगहों में डेटा मिल सके। लेकिन इन्हें सही ढंग से लगाना जरूरी है। सीधे ट्रैफिक या निर्माण के पास लगाने से गलत आंकड़े आ सकते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि सरकारी रेफरेंस स्टेशन + लो-कॉस्ट सेंसर = सही और किफायती समाधान।
डेटा में हेरफेर के आरोप
हाल ही में कुछ वीडियो सामने आए, जिनमें मॉनिटरिंग स्टेशनों के पास पानी के छिड़काव की जा रही थी, जिससे AQI artificially बेहतर दिख सकता है। साथ ही, एक रिपोर्ट में सामने आया जांच किए गए 25 में से 22 स्टेशन गलत जगह लगाए गए हैं, जो सरकार के नियमों का उल्लंघन है।
क्या होना चाहिए अब?
दिल्ली को जरूरत है:
ज्यादा मॉनिटरिंग स्टेशनों की
सही जगह पर लगाए गए सेंसरों की
पारदर्शी और भरोसेमंद डेटा सिस्टम की
CPCB और दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति को इस मुद्दे पर जवाब के लिए मेल भेजा है। जवाब आने पर रिपोर्ट अपडेट की जाएगी।
