नई दिल्ली. Tamil Nadu, West Bengal, Assam, Kerala और Puducherry में चल रहे विधानसभा चुनावों ने इस बार सिर्फ राजनीतिक नहीं बल्कि आर्थिक बहस भी तेज कर दी है। Election Commission of India (ECI) के आंकड़ों के मुताबिक मतदान से पहले करीब ₹1,271 करोड़ की नकदी, शराब, ड्रग्स और अन्य प्रलोभन सामग्री जब्त की गई। अधिकारियों का अनुमान है कि ₹200–300 करोड़ की अतिरिक्त रकम को वितरण से पहले ही रोक लिया गया।
‘फ्रीबीज’ की राजनीति और अर्थव्यवस्था पर असर
भारत में चुनावों के दौरान “फ्रीबीज” या मुफ्त सुविधाएं लंबे समय से राजनीतिक रणनीति का हिस्सा रही हैं। राजनीतिक दल नकद सहायता, उपभोक्ता वस्तुएं और welfare schemes के जरिए मतदाताओं तक सीधा पहुंच बनाने की कोशिश करते हैं।
अर्थशास्त्रियों के अनुसार, ये प्रलोभन स्थानीय स्तर पर consumption और liquidity को अस्थायी रूप से बढ़ाते हैं, लेकिन साथ ही यह वोटिंग व्यवहार को भी प्रभावित करते हैं। खासकर महिलाओं को लक्षित योजनाएं कई राज्यों में निर्णायक साबित हो रही हैं।
बड़े राज्यों में बड़ा पैसा, बढ़ी निगरानी
इन चुनावों का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि ये राज्य मिलकर देश के GDP का 20% से अधिक योगदान देते हैं। तमिलनाडु में सबसे ज्यादा ₹599.24 करोड़ की जब्ती हुई, जबकि पश्चिम बंगाल में ₹510 करोड़ बरामद किए गए। असम में ₹97 करोड़, केरल में ₹58 करोड़ और पुडुचेरी में ₹7 करोड़ की जब्ती दर्ज की गई। इस बार aerial surveillance और financial tracking जैसे आधुनिक तरीकों का इस्तेमाल बढ़ा है, जिससे चुनावी फंडिंग के पैमाने का अंदाजा मिलता है।
वादों की भरमार, लेकिन वित्तीय दबाव का खतरा
चुनावी प्रचार के दौरान राजनीतिक दलों ने बड़े पैमाने पर welfare promises किए हैं। तमिलनाडु में महिलाओं के लिए cash transfer, मुफ्त लैपटॉप और रोजगार योजनाएं प्रमुख हैं, जबकि पश्चिम बंगाल में महिलाओं और युवाओं के लिए आर्थिक सहायता पर जोर है। असम में बड़े infrastructure projects और रोजगार के वादे किए गए हैं, वहीं केरल में पेंशन और सामाजिक सुरक्षा योजनाएं केंद्र में हैं। Economic Survey 2025–26 के अनुसार, देश में welfare spending ₹1.7 लाख करोड़ तक पहुंच चुकी है। विशेषज्ञों का मानना है कि नए वादे लागू होने पर राज्यों के खर्च में करीब ₹50,000 करोड़ की अतिरिक्त बढ़ोतरी हो सकती है, जिससे fiscal deficit और borrowing पर दबाव बढ़ सकता है।
ज्यादा मतदान, लेकिन आर्थिक मुद्दों की गूंज
इन चुनावों में voter turnout भी काफी ऊंचा रहा है। पुडुचेरी में लगभग 89.87%, असम में 85.83% और केरल में 78.27% मतदान दर्ज किया गया। महिलाओं की भागीदारी कई जगह पुरुषों के बराबर या उससे अधिक रही, जो targeted welfare schemes के प्रभाव को दिखाती है। वहीं, शहरी युवाओं में कम मतदान को रोजगार और आर्थिक अवसरों की कमी से जोड़कर देखा जा रहा है।
अमीर जनप्रतिनिधि और आम जनता के बीच बढ़ती खाई
Association for Democratic Reforms (ADR) की रिपोर्ट ने चुनावी बहस में असमानता का मुद्दा भी जोड़ दिया है। रिपोर्ट के मुताबिक राज्यसभा के 14% सांसद करोड़पति नहीं बल्कि अरबपति श्रेणी में आते हैं। औसतन एक सांसद की संपत्ति ₹120.69 करोड़ है, जबकि बड़ी आबादी आर्थिक दबाव से जूझ रही है। World Inequality Lab के अनुसार, देश की कुल आय का लगभग 58% हिस्सा शीर्ष 10% लोगों के पास है, जबकि निचले 50% को सिर्फ 15% आय मिलती है।
चुनावों में दिखता है अनौपचारिक अर्थव्यवस्था का चेहरा
विशेषज्ञों का मानना है कि जब्त की गई रकम वास्तविक cash flow का सिर्फ एक हिस्सा है। चुनावों के दौरान बड़ी मात्रा में अनौपचारिक नकदी का उपयोग होता है, जो enforcement के दौरान सामने आता है। यह नकदी स्थानीय बाजारों को प्रभावित करती है और अस्थायी रूप से economic activity को बढ़ाती है, लेकिन इससे पारदर्शिता पर सवाल भी खड़े होते हैं।
आर्थिक चुनौतियों के बीच चुनावी फैसले
इन पांचों राज्यों के सामने अपनी-अपनी आर्थिक चुनौतियां हैं। कहीं कर्ज का दबाव है तो कहीं रोजगार और निवेश की कमी। ऐसे में बड़े-बड़े वादों को पूरा करना नई सरकारों के लिए आसान नहीं होगा। नतीजों से ज्यादा अहम होगी आर्थिक दिशा। जैसे-जैसे मतगणना की तारीख करीब आ रही है, ध्यान अब सिर्फ जीत-हार पर नहीं बल्कि governance और आर्थिक नीतियों पर भी केंद्रित हो रहा है। ये चुनाव साफ संकेत देते हैं कि भारत में अब राजनीति, अर्थव्यवस्था और असमानता एक-दूसरे से गहराई से जुड़ चुके हैं।
