नई दिल्ली. देश के पांच अहम राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों के नतीजों ने राजनीतिक परिदृश्य को झकझोर दिया है। मतदाताओं ने कई जगह लंबे समय से सत्तारूढ़ सरकारों को बाहर का रास्ता दिखाया, जबकि कुछ राज्यों में सत्ता बरकरार भी रही। इस बार का जनादेश साफ तौर पर बदलाव और विकल्प की ओर झुकाव दर्शाता है।
तमिलनाडु: विजय की पार्टी TVK का ऐतिहासिक उभार
तमिलनाडु में अभिनेता से नेता बने जोसेफ विजय की पार्टी तमिलगा वेट्री कझगम (TVK) ने बड़ा उलटफेर करते हुए 234 में से 108 सीटों पर जीत/बढ़त हासिल की। DMK को 59 और AIADMK को 47 सीटों पर सिमटना पड़ा। सबसे बड़ा झटका तब लगा जब मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन अपने ही कोलाथुर सीट से हार गए। यह नतीजा राज्य में दशकों से चली आ रही DMK-AIADMK की राजनीति के अंत की ओर इशारा करता है।
पश्चिम बंगाल: BJP ने खत्म किया ममता का 15 साल का शासन
पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी ने 294 में से 206 सीटें जीतकर शानदार जीत दर्ज की। TMC को सिर्फ 80 सीटों पर संतोष करना पड़ा। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भी अपनी भवानिपुर सीट से हार गईं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे “ऐतिहासिक जीत” बताते हुए कहा कि बंगाल अब “भयमुक्त” हो गया है। हालांकि, ममता बनर्जी ने चुनाव प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं।
केरल: UDF की वापसी, लेफ्ट का किला ढहा
केरल में कांग्रेस के नेतृत्व वाला UDF गठबंधन 140 में से 102 सीटें जीतकर सत्ता में लौट आया। LDF को सिर्फ 35 सीटें मिलीं, जिससे पिनाराई विजयन सरकार का अंत हो गया।
यह नतीजा इसलिए भी अहम है क्योंकि अब देश में कोई भी राज्य लेफ्ट के शासन में नहीं बचा है।
पुडुचेरी: NDA ने बरकरार रखी सत्ता
पुडुचेरी में NDA ने 30 में से 18 सीटें जीतकर सरकार बना ली है। एन. रंगासामी पांचवीं बार मुख्यमंत्री बनने जा रहे हैं। विपक्षी दलों के बीच तालमेल की कमी उनकी हार का बड़ा कारण रही।
असम: NDA की लगातार तीसरी जीत
असम में NDA ने 126 में से 102 सीटों पर जीत/बढ़त हासिल कर लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी की। मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा के नेतृत्व में BJP ने अकेले 81 सीटें जीतीं। यह राज्य उन कुछ जगहों में रहा जहां एंटी-इंकंबेंसी का असर नहीं दिखा।
चुनाव की बड़ी तस्वीर: एंटी-इंकंबेंसी और वेलफेयर का असर
इन चुनावों में एक ओर जहां एंटी-इंकंबेंसी की लहर दिखी, वहीं दूसरी ओर कल्याणकारी योजनाएं भी निर्णायक कारक रहीं। महिलाओं के लिए नकद ट्रांसफर, सब्सिडी और घरेलू सहायता योजनाएं कई राज्यों में वोटरों को प्रभावित करती दिखीं।
चुनाव से पहले करीब ₹1,271 करोड़ की नकदी और सामान की जब्ती भी चुनावी माहौल की गंभीरता को दर्शाती है।
आर्थिक चुनौती: वादों और वित्तीय संतुलन की परीक्षा
नई सरकारों के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती चुनावी वादों और वित्तीय अनुशासन के बीच संतुलन बनाना है। विशेषज्ञों का मानना है कि बढ़ते कर्ज और कल्याणकारी योजनाओं के दबाव के बीच राज्यों को आर्थिक संतुलन बनाए रखना आसान नहीं होगा।
इन चुनावों ने साफ कर दिया है कि भारतीय मतदाता अब बदलाव के लिए तैयार हैं। जहां कुछ राज्यों में स्थिरता बनी रही, वहीं कई जगहों पर सत्ता परिवर्तन ने यह संकेत दिया कि प्रदर्शन और भरोसा ही अब जीत की कुंजी है।
