नई दिल्ली. Netherlands ने 11वीं सदी की चोल कालीन ताम्रपट्टिकाएं (Chola Copper Plates) औपचारिक रूप से भारत को वापस सौंप दी हैं। यह ऐतिहासिक हस्तांतरण प्रधानमंत्री Narendra Modi की नीदरलैंड्स यात्रा के दौरान हुआ। इन ताम्रपट्टिकाओं को यूरोप में “Leiden Plates” के नाम से जाना जाता है और इन्हें चोल साम्राज्य के सबसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक अभिलेखों में गिना जाता है।
वर्षों की कूटनीतिक कोशिशों के बाद मिली सफलता
भारत वर्ष 2012 से इन ऐतिहासिक धरोहरों की वापसी की मांग कर रहा था। दोनों देशों के बीच लंबे समय तक चली कूटनीतिक बातचीत के बाद आखिरकार नीदरलैंड्स सरकार ने इन्हें भारत को लौटाने का फैसला किया। यह कदम भारत और नीदरलैंड्स के मजबूत होते सांस्कृतिक और द्विपक्षीय संबंधों का प्रतीक माना जा रहा है।
पीएम मोदी बोले- हर भारतीय के लिए गर्व का पल
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर इस उपलब्धि को साझा करते हुए इसे “हर भारतीय के लिए खुशी और गर्व का क्षण” बताया। उन्होंने कहा कि ये ताम्रपट्टिकाएं सिर्फ ऐतिहासिक वस्तुएं नहीं, बल्कि भारत की विरासत और सभ्यता की अमूल्य कहानी हैं।
विदेश मंत्रालय ने बताया भावनात्मक क्षण
Ministry of External Affairs ने कहा कि इन चोल ताम्रपट्टिकाओं की वापसी भारत के लोगों के लिए गहरी भावनात्मक अहमियत रखती है। मंत्रालय के अनुसार ये धरोहर भारत की समृद्ध सभ्यता, इतिहास और सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण प्रमाण हैं।
करीब 30 किलो वजनी हैं ताम्रपट्टिकाएं
इतिहासकारों के अनुसार इन ताम्रपट्टिकाओं का वजन लगभग 30 किलोग्राम है। इन्हें एक कांस्य रिंग से बांधा गया है, जिस पर चोल शासकों की शाही मुहर अंकित है।इन अभिलेखों का एक हिस्सा संस्कृत में और दूसरा तमिल भाषा में लिखा गया है।
राजराजा चोल प्रथम और राजेंद्र चोल प्रथम से जुड़ा इतिहास
इतिहासकार बताते हैं कि इन ताम्रपट्टिकाओं में सम्राट Rajaraja Chola I द्वारा एक बौद्ध मठ को दिए गए अनुदान का उल्लेख है।
बताया जाता है कि मूल आदेश पहले ताड़पत्रों पर लिखे गए थे, लेकिन बाद में उनके पुत्र Rajendra Chola I ने उन्हें लंबे समय तक सुरक्षित रखने के लिए तांबे की प्लेटों पर खुदवाया।
इन प्लेटों को बांधने वाली कांस्य रिंग पर राजेंद्र चोल प्रथम की शाही मुहर भी मौजूद है।
डच शासन काल में पहुंचे थे यूरोप
ये ताम्रपट्टिकाएं 18वीं सदी में नीदरलैंड्स पहुंचीं। बताया जाता है कि डच नियंत्रण वाले नागपट्टिनम क्षेत्र में आए मिशनरी समूह के सदस्य Florentius Camper इन्हें अपने साथ यूरोप ले गए थे।
अंतरराष्ट्रीय समिति ने माना भारत का अधिकार
भारत के दावे को अंतर-सरकारी समिति (Intergovernmental Committee on Return and Restitution) के 24वें सत्र में मान्यता मिली थी। समिति ने भारत को इन धरोहरों का वैध मूल देश माना और दोनों देशों के बीच बातचीत के जरिए इनके प्रत्यावर्तन को प्रोत्साहित किया। इसके बाद नीदरलैंड्स सरकार ने प्रधानमंत्री मोदी की यात्रा के दौरान इन्हें औपचारिक रूप से भारत को सौंपने का निर्णय लिया।
