नई दिल्ली. देश में जल संकट, बढ़ती मजदूरी लागत और बदलते मौसम की चुनौतियों के बीच धान की खेती को अधिक टिकाऊ बनाने की दिशा में बड़ी सफलता मिली है। Indian Council of Agricultural Research और International Rice Research Institute द्वारा विकसित धान की दो नई किस्मों की पहचान भारत में जारी करने के लिए की गई है। इन किस्मों को विशेष रूप से डायरेक्ट सीडेड राइस (DSR) प्रणाली के लिए तैयार किया गया है, जिससे किसानों को कम पानी, कम श्रम और कम लागत में बेहतर उत्पादन मिल सकेगा।
डायरेक्ट सीडेड राइस खेती को मिलेगा बढ़ावा
पारंपरिक धान की खेती में पौध तैयार करने के बाद उसे पानी भरे खेतों में रोपा जाता है। इसके विपरीत DSR पद्धति में बीज सीधे खेत में बोए जाते हैं। इस तकनीक से 20 से 30 प्रतिशत तक पानी की बचत होती है, मजदूरों पर निर्भरता कम होती है और मीथेन गैस उत्सर्जन में भी कमी आती है। हालांकि अब तक ऐसी किस्मों की कमी थी जो DSR पद्धति में बेहतर प्रदर्शन कर सकें।
इसी चुनौती को ध्यान में रखते हुए वैज्ञानिकों ने आधुनिक जीनोमिक तकनीक का उपयोग कर नई धान किस्में विकसित की हैं।
DRR धान 92 ने दिखाया शानदार प्रदर्शन
नई विकसित किस्मों में DRR धान 92 विशेष रूप से चर्चा में है। इस किस्म में बेहतर अंकुरण, तनाव सहन करने की क्षमता, रोग एवं कीट प्रतिरोधकता और उच्च गुणवत्ता वाले दानों जैसे गुण शामिल हैं। राष्ट्रीय परीक्षणों में इसने DSR परिस्थितियों में 5.8 टन प्रति हेक्टेयर उत्पादन दिया, जो लोकप्रिय किस्म MTU 1010 की तुलना में लगभग 18 प्रतिशत अधिक है।
यह किस्म पूर्वोत्तर भारत के लिए जारी किए जाने की पहचान प्राप्त कर चुकी है और किसानों को बेहतर उत्पादन देने में मदद कर सकती है।
CR धान 217 भी साबित हुई प्रभावी
दूसरी नई किस्म CR धान 217 ने भी राष्ट्रीय परीक्षणों में औसतन 5.9 टन प्रति हेक्टेयर उत्पादन दिया। अनुकूल परिस्थितियों में इसका उत्पादन 8.7 टन प्रति हेक्टेयर तक पहुंचा। लगभग 118 दिनों में तैयार होने वाली यह किस्म पूर्वी और मध्य भारत के लिए उपयुक्त मानी जा रही है, जहां खेती का कार्यक्रम मानसून से जुड़ा होता है।
जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से निपटने में मददगार
वैज्ञानिकों के अनुसार इन किस्मों में 19 से अधिक महत्वपूर्ण जीनों का संयोजन किया गया है। इनमें जलभराव और कम ऑक्सीजन वाली परिस्थितियों में अंकुरण, खरपतवार नियंत्रण के लिए तेज शुरुआती वृद्धि, मजबूत तना और विभिन्न जलवायु परिस्थितियों में स्थिर उत्पादन जैसी विशेषताएं शामिल हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि ये किस्में किसानों को अनियमित बारिश, भूजल संकट और श्रमिकों की कमी जैसी चुनौतियों से निपटने में मदद करेंगी।
किसानों तक पहुंचाने की तैयारी
इन दोनों किस्मों का तीन वर्षों तक राष्ट्रीय स्तर पर परीक्षण किया गया है। सरकार की औपचारिक अधिसूचना के बाद इन्हें किसानों के लिए उपलब्ध कराया जाएगा। DRR धान 92 को भारत के जैव प्रौद्योगिकी विभाग के सहयोग से विकसित किया गया है, जबकि CR धान 217 के विकास में एशियाई विकास बैंक और फिनलैंड सरकार का सहयोग रहा है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि इन किस्मों को बड़े पैमाने पर अपनाया गया तो धान की खेती में पानी की बचत होगी, उत्पादन बना रहेगा और पर्यावरण पर पड़ने वाला दबाव भी कम होगा। यह भारतीय कृषि को अधिक टिकाऊ और जलवायु अनुकूल बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
