नई दिल्ली. जलवायु परिवर्तन और लगातार बढ़ता तापमान कृषि क्षेत्र के लिए बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। इसका असर केवल फसलों की पैदावार तक सीमित नहीं है, बल्कि किसानों की आय, उनकी आजीविका और वैश्विक खाद्य सुरक्षा पर भी पड़ रहा है। गर्मी और मौसम में अनिश्चितता के कारण किसानों को उत्पादन में कमी, बढ़ती लागत और आर्थिक अस्थिरता का सामना करना पड़ रहा है।
तापमान बढ़ने से फसलों की पैदावार में कमी
सामान्य से अधिक तापमान का असर कई प्रमुख खाद्यान्न फसलों के उत्पादन पर तुरंत दिखाई देता है। चावल, गेहूं, ज्वार, मक्का, बाजरा, चना, अरहर और गन्ने जैसी फसलों में गर्मी के कारण पैदावार घट सकती है। अलग-अलग फसलों पर इसका असर अलग होता है और कुछ मामलों में गेहूं की उपज में करीब 2 प्रतिशत, जबकि बाजरे में लगभग 10 प्रतिशत तक की कमी देखी जा सकती है।
तापमान में केवल 1 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी भी खेती में हासिल की गई उत्पादकता के वर्षों के लाभ को खत्म कर सकती है। अनुमान के मुताबिक, इतनी वृद्धि चावल और गेहूं में करीब चार साल की productivity gains, मक्का और बाजरे में करीब छह साल तथा गन्ने में करीब आठ साल के उत्पादकता लाभ के बराबर असर डाल सकती है।
आने वाले वर्षों में बढ़ सकती है समस्या
भविष्य में तापमान बढ़ने की स्थिति में कृषि उत्पादन पर दबाव और बढ़ने की आशंका है। अनुमानों के मुताबिक वर्ष 2080 तक दक्षिण एशिया में गेहूं की पैदावार में 50 प्रतिशत तक की गिरावट हो सकती है। वहीं वर्षा आधारित चावल की उपज में करीब 47 प्रतिशत तक कमी का अनुमान जताया गया है।
ऐसी स्थिति में खेती पर निर्भर क्षेत्रों में खाद्य उत्पादन की क्षमता प्रभावित हो सकती है और किसानों के लिए आय बनाए रखना और कठिन हो सकता है।
फसल की कम पैदावार से घटती है किसान की कमाई
जब मौसम की वजह से फसल का वास्तविक उत्पादन कम होता है, तो उसका सीधा असर किसान की आय पर पड़ता है। कम उपज का मतलब बाजार में बेचने के लिए कम उत्पादन और उससे मिलने वाली कम आमदनी है। इसके साथ अगर खेती की लागत बढ़ती रहती है, तो किसानों की आर्थिक स्थिति और कमजोर हो सकती है।
बार-बार फसल खराब होने और कर्ज बढ़ने की स्थिति छोटे और सीमांत किसानों के लिए अतिरिक्त दबाव पैदा करती है। लगातार मौसम संबंधी झटकों के कारण इन समुदायों में मानसिक तनाव और गंभीर मनोवैज्ञानिक परेशानियों का जोखिम भी बढ़ सकता है।
छोटे किसानों पर सबसे ज्यादा दबाव
दो हेक्टेयर से कम जमीन पर खेती करने वाले छोटे किसान मौसम में अचानक होने वाले बदलावों के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं। बीज, खाद, सिंचाई, कीटनाशक और अन्य इनपुट की लागत पहले से ही उनके लिए बड़ी चुनौती होती है। ऐसे में सूखा, अत्यधिक गर्मी, बेमौसम बारिश या अन्य मौसम संबंधी घटनाएं आर्थिक नुकसान को और बढ़ा सकती हैं।
लगातार नुकसान की स्थिति में किसान कर्ज के ऐसे चक्र में फंस सकते हैं, जिससे बाहर निकलना मुश्किल हो जाता है।
कम उत्पादन से बढ़ सकती हैं खाद्य कीमतें
कृषि उत्पादन में गिरावट का असर केवल किसानों पर नहीं पड़ता। जब बाजार में किसी फसल की उपलब्धता कम होती है, तो उसकी कीमत बढ़ने का दबाव बन सकता है। इससे खाद्य महंगाई बढ़ सकती है और बड़ी संख्या में उपभोक्ताओं पर आर्थिक बोझ पड़ सकता है।
खाद्य कीमतों में बढ़ोतरी खासतौर पर कम आय वाले परिवारों को ज्यादा प्रभावित कर सकती है, क्योंकि उनकी आय का बड़ा हिस्सा भोजन पर खर्च होता है।
पोषण की गुणवत्ता पर भी असर
बढ़ते तापमान और वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड की अधिक मात्रा का असर फसलों की nutritional quality पर भी पड़ सकता है। गर्मी के तनाव के कारण पौधों में प्रोटीन बनने की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। वहीं चावल और गेहूं जैसी प्रमुख फसलों में आयरन और जिंक जैसे जरूरी micronutrients की मात्रा कम होने की चिंता भी जताई गई है।
इसका असर उन आबादी पर ज्यादा हो सकता है, जो पहले से ही पोषण की कमी का सामना कर रही हैं। इससे ‘Hidden Hunger’ यानी पर्याप्त कैलोरी मिलने के बावजूद जरूरी पोषक तत्वों की कमी की समस्या बढ़ सकती है।
सप्लाई चेन पर भी बढ़ता दबाव
चरम गर्मी और मौसम की अनिश्चितता का असर फसल के बाद के चरणों पर भी पड़ता है। अत्यधिक तापमान से भंडारण व्यवस्था पर दबाव बढ़ सकता है और post-harvest food safety से जुड़े जोखिम बढ़ सकते हैं।
इसके अलावा पशुधन और डेयरी क्षेत्र भी गर्मी और बदलते मौसम से प्रभावित हो सकते हैं। पशुओं की productivity घटने से खाद्य आपूर्ति और किसानों की आय, दोनों पर असर पड़ सकता है।
जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए खेती में बदलाव जरूरी
कृषि पर बढ़ते जलवायु दबाव के बीच खेती के ऐसे तरीकों की जरूरत बढ़ रही है, जो मौसम के जोखिम को कम कर सकें और किसानों की आय को अधिक स्थिर बना सकें। फसल विविधीकरण, जल संरक्षण, बेहतर सिंचाई प्रबंधन और climate-smart farming जैसी रणनीतियां इस दिशा में महत्वपूर्ण हो सकती हैं।
कृषि क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन का असर अब केवल भविष्य की चिंता नहीं है। बढ़ती गर्मी, बदलते मौसम और उत्पादन में उतार-चढ़ाव ने किसानों की आय और खाद्य सुरक्षा से जुड़े सवालों को और गंभीर बना दिया है। ऐसे में उत्पादन बढ़ाने के साथ खेती को बदलती जलवायु के अनुरूप ढालना भी जरूरी होता जा रहा है।
