नई दिल्ली. दिल्ली में विरोध-प्रदर्शन के लिए इस्तेमाल होने वाले जंतर-मंतर (Jantar Mantar) को निर्धारित प्रदर्शन स्थल की सूची से हटा दिया गया है। दिल्ली पुलिस (Delhi Police) ने गृह मंत्रालय (Ministry of Home Affairs) की एक समिति की सलाह पर यह कदम उठाया है। अब प्रदर्शनकारियों को रामलीला मैदान (Ramlila Maidan), उत्तरी दिल्ली के बुराड़ी ग्राउंड (Burari Ground) या पूर्वी दिल्ली के CBD ग्राउंड जैसे स्थानों पर प्रदर्शन करना होगा। यह फैसला ऐसे समय में आया है, जब मध्य दिल्ली में प्रदर्शनकारियों पर पाबंदियां और सुरक्षा व्यवस्था सख्त किए जाने की खबरें सामने आई हैं। इस फैसले ने एक बार फिर सवाल खड़ा कर दिया है कि राजधानी में लोग अपनी मांगों को लेकर कहां प्रदर्शन कर सकते हैं और इन स्थानों को तय करने का अधिकार किसके पास है। यह मुद्दा केवल कानून-व्यवस्था का नहीं, बल्कि नागरिकों के मौलिक अधिकारों और लोकतांत्रिक विरोध की स्वतंत्रता से भी जुड़ा है।
दिल्ली में प्रदर्शन स्थल कौन तय करता है?
किसी निर्धारित प्रदर्शन स्थल (Designated Protest Site) का अर्थ ऐसी जगह से है, जहां पुलिस की अनुमति और तय शर्तों के तहत लोग धरना, प्रदर्शन या सार्वजनिक सभा कर सकते हैं। इन शर्तों में प्रदर्शनकारियों की संख्या, यातायात व्यवस्था और सार्वजनिक सुरक्षा जैसे पहलू शामिल हो सकते हैं। इसका उद्देश्य विरोध करने के अधिकार और आम लोगों की सुविधा के बीच संतुलन बनाए रखना है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (Freedom of Speech and Expression) देता है, जबकि अनुच्छेद 19(1)(b) शांतिपूर्वक और बिना हथियारों के एकत्र होने का अधिकार प्रदान करता है। हालांकि, इन अधिकारों पर सार्वजनिक व्यवस्था (Public Order) सहित संविधान में निर्धारित आधारों पर उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।
दिल्ली के मामले में संवैधानिक व्यवस्था कुछ अलग है। अनुच्छेद 239AA(3)(a) के तहत दिल्ली विधानसभा को पुलिस, सार्वजनिक व्यवस्था और भूमि जैसे विषयों पर कानून बनाने का अधिकार नहीं है। दिल्ली पुलिस केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधीन काम करती है। इसलिए राजधानी में प्रदर्शन स्थलों के निर्धारण और अनुमति से जुड़ी व्यवस्था में केंद्र सरकार तथा दिल्ली पुलिस की प्रमुख भूमिका रहती है।
जंतर-मंतर पर पहले क्या थे नियम?
जंतर-मंतर लंबे समय से राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों और विभिन्न जन आंदोलनों के प्रदर्शन का प्रमुख केंद्र रहा है। यहां प्रदर्शन करने के लिए आयोजकों को सामान्यतः 10 दिन पहले आवेदन करना होता था और प्रदर्शनकारियों की संख्या 1,000 तक सीमित रखी गई थी।
इसके मुकाबले रामलीला मैदान में लगभग 50,000 लोगों के एकत्र होने की क्षमता बताई जाती है। हालांकि, अधिक क्षमता वाले स्थान पर प्रदर्शन की अनुमति मिलने से यह सवाल खत्म नहीं होता कि क्या प्रदर्शनकारियों को सत्ता के प्रमुख केंद्र के नजदीक अपनी बात रखने का अवसर मिलना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में क्या कहा था?
साल 2018 में Mazdoor Kisan Shakti Sangathan v. Union of India मामले में सुप्रीम कोर्ट ने विरोध-प्रदर्शन के अधिकार और स्थानीय निवासियों की सुविधाओं के बीच संतुलन पर विचार किया था। याचिकाकर्ताओं ने दलील दी थी कि रामलीला मैदान सत्ता के केंद्र से काफी दूर है। अदालत ने जंतर-मंतर रोड के एक हिस्से को नियंत्रित और विनियमित प्रदर्शनों के लिए खुला रखने की व्यवस्था की थी।
जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थल की सूची से हटाए जाने के बाद अब यह सवाल उठ रहा है कि 2018 के फैसले के तहत संरक्षित प्रदर्शन की जगह पर नए निर्णय का क्या प्रभाव पड़ेगा।
BNSS की धारा 163 क्या है?
दिल्ली में कुछ क्षेत्रों में सभाओं और लोगों के एकत्र होने पर प्रतिबंध भी लगाए गए हैं। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita – BNSS) की धारा 163 के तहत सक्षम अधिकारियों को आपात परिस्थितियों में सार्वजनिक शांति बनाए रखने के लिए आवश्यक आदेश जारी करने का अधिकार है।
इस प्रावधान का इस्तेमाल ऐसे मामलों में किया जा सकता है, जहां तत्काल रोकथाम की जरूरत हो। हालांकि, इसका उपयोग किन परिस्थितियों में और कितने व्यापक क्षेत्र में किया जा सकता है, यह कानून तथा संबंधित परिस्थितियों पर निर्भर करता है। बार-बार व्यापक प्रतिबंध लगाए जाने पर शांतिपूर्ण सभा के मौलिक अधिकार को लेकर सवाल उठ सकते हैं।
Law and Order और Public Order में क्या अंतर है?
सुप्रीम कोर्ट ने Ram Manohar Lohia v. State of Bihar (1966) मामले में कानून-व्यवस्था (Law and Order), सार्वजनिक व्यवस्था (Public Order) और राज्य की सुरक्षा (Security of the State) के बीच अंतर समझाया था। अदालत ने इन्हें तीन संकेंद्रित वृत्तों के रूप में देखा, जिनमें सार्वजनिक व्यवस्था, कानून-व्यवस्था से अधिक व्यापक प्रभाव वाली स्थिति को दर्शाती है। उदाहरण के लिए, सड़क पर दो लोगों के बीच झगड़ा होना स्थानीय कानून-व्यवस्था की समस्या हो सकती है। इसके विपरीत, बड़े पैमाने पर हिंसा या ऐसी अव्यवस्था, जिसका असर व्यापक समुदाय पर पड़े, सार्वजनिक व्यवस्था का प्रश्न बन सकती है। हालांकि, किसी घटना को किस श्रेणी में रखा जाएगा, यह उसके वास्तविक प्रभाव और परिस्थितियों पर निर्भर करता है।
In Re: Ramlila Maidan Incident (2012) मामले में भी सुप्रीम कोर्ट ने प्रतिबंधों की प्रकृति और उनकी गंभीरता पर विचार किया था। इसका मूल संदेश यह है कि हर छोटी-मोटी शांति भंग होने की घटना को सार्वजनिक व्यवस्था के लिए बड़ा खतरा नहीं माना जा सकता।
क्या पुलिस प्रदर्शन करने की जगह सीमित कर सकती है?
सुप्रीम कोर्ट ने Himat Lal K. Shah v. Commissioner of Police, Ahmedabad (1972) मामले में माना था कि सार्वजनिक सड़कों पर सभाओं के लिए पुलिस पूर्व अनुमति की व्यवस्था कर सकती है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि सरकार हर सार्वजनिक स्थान पर सभा करने के अधिकार को पूरी तरह समाप्त कर सकती है।
वहीं, 2018 के फैसले में अदालत ने माना था कि प्रदर्शन को नियंत्रित करने के लिए विशेष क्षेत्रों का निर्धारण किया जा सकता है। ऐसे निर्णय लेते समय प्रदर्शनकारियों के अधिकारों, स्थानीय निवासियों की सुविधाओं और सार्वजनिक सुरक्षा के बीच संतुलन जरूरी है।
पुलिस को प्रतिबंध लगाने के लिए संबंधित कानून और अपने अधिकारों का आधार स्पष्ट करना होता है। केवल कानून-व्यवस्था का सामान्य हवाला देकर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर मनमाने प्रतिबंध नहीं लगाए जा सकते।
प्रदर्शन स्थलों पर प्रतिबंध से जुड़ी प्रमुख चुनौतियां
प्रदर्शन के लिए पहले से अनुमति लेना, लोगों की संख्या सीमित करना और प्रदर्शन स्थल को सत्ता के केंद्र से दूर रखना प्रशासनिक व्यवस्था का हिस्सा हो सकता है। लेकिन यदि इन शर्तों के कारण लोगों के लिए अपनी बात रखना अत्यधिक कठिन हो जाए, तो यह सवाल उठता है कि कहीं नियमन, विरोध के अधिकार को सीमित करने का माध्यम तो नहीं बन रहा।
इसी तरह, बड़े क्षेत्रों में बार-बार निषेधाज्ञा लागू करने से शांतिपूर्ण सभाओं पर असर पड़ सकता है। Anuradha Bhasin v. Union of India (2020) मामले में सुप्रीम कोर्ट ने प्रतिबंधात्मक आदेशों की समीक्षा और उनकी आवश्यकता से जुड़े महत्वपूर्ण सिद्धांतों पर चर्चा की थी।
दूसरी ओर, बड़े प्रदर्शनों से यातायात, स्थानीय कारोबार और निवासियों की रोजमर्रा की जिंदगी प्रभावित हो सकती है। Amit Sahni v. Commissioner of Police (2020) मामले, जिसे शाहीन बाग प्रदर्शन मामले के रूप में भी जाना जाता है, में सुप्रीम कोर्ट ने सार्वजनिक सड़कों के अनिश्चितकालीन कब्जे और आम लोगों के आवागमन के अधिकार पर विचार किया था।
आगे क्या रास्ता हो सकता है?
प्रदर्शन स्थलों को निर्धारित करने और उनकी सूची से हटाने के लिए स्पष्ट नियम और सार्वजनिक मानदंड तय किए जा सकते हैं। अनुमति देने से इनकार करने पर लिखित कारण बताने और फैसले के खिलाफ शीघ्र अपील की व्यवस्था करने से पारदर्शिता बढ़ सकती है। इसी तरह, BNSS की धारा 163 के तहत प्रतिबंधों को आवश्यक क्षेत्र और अवधि तक सीमित रखना महत्वपूर्ण है।
राजधानी में सत्ता के केंद्र के नजदीक किसी नियंत्रित प्रदर्शन स्थल को बनाए रखने पर भी विचार किया जा सकता है, ताकि नागरिक अपनी मांगों को संबंधित अधिकारियों तक पहुंचा सकें और साथ ही सार्वजनिक सुरक्षा तथा यातायात व्यवस्था भी बनी रहे।
जंतर-मंतर को निर्धारित प्रदर्शन स्थलों की सूची से हटाने का फैसला दिल्ली में विरोध-प्रदर्शन के अधिकार और प्रशासनिक नियंत्रण के बीच संतुलन पर नई बहस खड़ी करता है। एक ओर सार्वजनिक सुरक्षा और आम लोगों की सुविधा जरूरी है, तो दूसरी ओर शांतिपूर्ण विरोध लोकतंत्र का अहम हिस्सा है। अब इस मामले में महत्वपूर्ण सवाल यह होगा कि जंतर-मंतर से जुड़े नए निर्णय का 2018 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर क्या प्रभाव पड़ेगा और क्या अदालत इसे प्रदर्शन के नियमन के रूप में देखेगी या शांतिपूर्ण सभा के अधिकार पर अत्यधिक प्रतिबंध के रूप में।
