नई दिल्ली. कर्नाटक में विधान परिषद (MLC) चुनाव के नतीजों ने राज्य की राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है। जून में हुए विधान परिषद चुनावों में कांग्रेस ने सात में से पांच सीटें जीतकर भारतीय जनता पार्टी (BJP) और उसकी सहयोगी जनता दल (सेक्युलर) यानी JD(S) को झटका दिया था। उस समय NDA के कुछ विधायकों की कथित क्रॉस वोटिंग को भी कांग्रेस की जीत की एक वजह माना गया था। लेकिन करीब चार महीने बाद तस्वीर पूरी तरह बदल गई है। 23 अक्टूबर को चार स्नातक और शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों के लिए हुए चुनाव में NDA ने सभी चार सीटें जीत लीं। इनमें भाजपा ने तीन और JD(S) ने एक सीट पर कब्जा जमाया।
इस नतीजे से मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार पर विपक्ष का दबाव बढ़ सकता है। हालांकि, इन चुनावों का विधान परिषद में कांग्रेस के बहुमत पर तत्काल कोई असर नहीं पड़ेगा। 75 सदस्यीय उच्च सदन में कांग्रेस के 38 सदस्य हैं। इसके बावजूद चुनावी नतीजों ने भाजपा और JD(S) के गठबंधन को नया राजनीतिक उत्साह दिया है। दोनों दलों ने इसे कांग्रेस सरकार के खिलाफ जनता के रुख के तौर पर पेश किया है।
जून की जीत के बाद कांग्रेस को चार महीने में लगा बड़ा झटका
जून में हुए विधान परिषद चुनाव में कांग्रेस ने सात में से पांच सीटें जीतकर मजबूत प्रदर्शन किया था। भाजपा को केवल दो सीटें मिली थीं। उस समय NDA के कुछ विधायकों की कथित क्रॉस वोटिंग की चर्चा भी सामने आई थी। इससे भाजपा और JD(S) को राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ा था।
लेकिन अक्टूबर में हुए चुनावों में NDA ने वापसी करते हुए चारों सीटों पर जीत दर्ज की। भाजपा ने उत्तर-पूर्व शिक्षक, पश्चिम स्नातक और दक्षिण-पूर्व स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों में अपना कब्जा बरकरार रखा। वहीं, JD(S) ने बेंगलुरु शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र कांग्रेस से छीन लिया।
इन नतीजों को विपक्षी गठबंधन के लिए अहम माना जा रहा है, क्योंकि भाजपा और JD(S) ने एक साथ चुनाव लड़कर कांग्रेस के खिलाफ अपनी स्थिति मजबूत की है। दोनों दल अब इस जीत के सहारे राज्य की राजनीति में अपनी सक्रियता और बढ़ा सकते हैं।
बेंगलुरु शिक्षक सीट पर JD(S) की वापसी, पुट्टन्ना को मिली हार
इस चुनाव का सबसे चर्चित मुकाबला बेंगलुरु शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में हुआ। यहां JD(S) के उम्मीदवार एपी रंगनाथ ने कांग्रेस के मौजूदा एमएलसी पुट्टन्ना को हराकर जीत हासिल की। रंगनाथ ने 10,810 वोट हासिल किए, जबकि पुट्टन्ना को 9,902 वोट मिले। इस तरह रंगनाथ ने 908 वोटों के अंतर से जीत दर्ज की।
रंगनाथ इस सीट से तीसरी बार चुनाव मैदान में उतरे थे। इससे पहले 2024 में हुए उपचुनाव में उन्हें पुट्टन्ना के हाथों 1,507 वोटों से हार का सामना करना पड़ा था। इस बार उन्होंने पिछली हार का बदला लेते हुए सीट JD(S) के खाते में डाल दी।
पुट्टन्ना का राजनीतिक सफर भी इस मुकाबले को खास बनाता है। वह 2002 से इस सीट पर पांच बार जीत दर्ज कर चुके थे। इनमें से चार जीत उन्होंने JD(S) के उम्मीदवार के तौर पर हासिल की थीं। वर्ष 2019 में JD(S) से निष्कासित होने के बाद वह 2020 में भाजपा में शामिल हो गए। इसके बाद 2023 में कांग्रेस में आए और बेंगलुरु की राजाजीनगर विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा, लेकिन उन्हें हार मिली। वर्ष 2024 में उन्होंने कांग्रेस के टिकट पर बेंगलुरु शिक्षक सीट का उपचुनाव जीत लिया था। इस बार रंगनाथ ने उन्हें हराकर सीट पर JD(S) की वापसी करा दी।
पश्चिम स्नातक सीट पर भाजपा का दबदबा कायम
पश्चिम स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में भाजपा के एसवीएस संकनूर ने लगातार तीसरी बार जीत हासिल की। उन्होंने कांग्रेस के मोहन लिम्बिकाई को 9,323 वोटों के अंतर से हराया। इस सीट पर भाजपा का दबदबा वर्ष 2008 से बना हुआ है और ताजा नतीजे ने पार्टी की स्थिति को और मजबूत किया है।
भाजपा के लिए यह जीत इसलिए भी अहम रही, क्योंकि पार्टी ने इस सीट पर अपनी पुरानी पकड़ बनाए रखी। कांग्रेस उम्मीदवार इस मुकाबले में भाजपा को चुनौती देने में सफल नहीं हो सके।
उत्तर-पूर्व शिक्षक सीट पर शशिल जी. नामोशी की पांचवीं जीत
उत्तर-पूर्व शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में भाजपा के शशिल जी. नामोशी ने एक बार फिर जीत दर्ज की। उन्होंने कांग्रेस उम्मीदवार मत्तूर को 3,297 वोटों से हराया। नामोशी को कुल 15,596 वोट मिले, जबकि मत्तूर को 12,299 वोट प्राप्त हुए।
नामोशी ने वर्ष 1996 से इस सीट पर पांचवीं बार जीत हासिल की है। इस जीत के साथ भाजपा ने उत्तर-पूर्व शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में अपना राजनीतिक आधार बरकरार रखा। लगातार जीत इस क्षेत्र में पार्टी की मजबूत स्थिति को दर्शाती है।
दक्षिण-पूर्व स्नातक सीट पर भाजपा के नए उम्मीदवार ने दिलाई जीत
दक्षिण-पूर्व स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में भाजपा ने अपने मौजूदा एमएलसी चिदानंद गौड़ा को दोबारा उम्मीदवार बनाने के बजाय केएम सुरेश को मैदान में उतारा था। पार्टी का यह फैसला सफल रहा। सुरेश ने कांग्रेस के शशि हुलिकुंटे मठ को बड़े अंतर से हराया।
केएम सुरेश को कुल 66,020 वोट मिले, जबकि कांग्रेस उम्मीदवार को 42,922 वोट प्राप्त हुए। इस तरह भाजपा ने 23,098 वोटों के अंतर से जीत दर्ज की। वर्ष 2008 से इस सीट पर भाजपा या JD(S) का कब्जा रहा है। इस बार भी भाजपा ने अपनी स्थिति मजबूत बनाए रखी।
NDA ने जीत को कांग्रेस सरकार के खिलाफ जनादेश बताया
चारों सीटों पर जीत के बाद भाजपा और JD(S) ने इसे कांग्रेस सरकार के कथित कुशासन के खिलाफ जनता का फैसला बताया। JD(S) के वरिष्ठ नेता और केंद्रीय भारी उद्योग एवं इस्पात मंत्री एचडी कुमारस्वामी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि झूठ, कुशासन, धनबल और बाहुबल की हार हुई है।
कुमारस्वामी ने NDA की जीत को ऐतिहासिक बताते हुए दावा किया कि यह परिणाम 2028 के विधानसभा चुनावों के लिए भी संदेश देता है। उन्होंने गठबंधन की एकजुटता पर जोर देते हुए कहा कि चुनाव ने दिखाया है कि ताकत एकता और गठबंधन में है।
कुमारस्वामी के बयान से साफ है कि JD(S) इस जीत को केवल विधान परिषद चुनाव तक सीमित नहीं रखना चाहती, बल्कि इसे आगामी विधानसभा चुनावों की तैयारी के लिए भी राजनीतिक आधार के तौर पर इस्तेमाल करना चाहती है।
भाजपा ने कांग्रेस सरकार पर भ्रष्टाचार और प्रशासनिक विफलता के आरोप लगाए
कर्नाटक विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष और भाजपा नेता आर. अशोक ने चुनाव परिणामों को कांग्रेस सरकार के लिए एक और चेतावनी बताया। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रशासनिक विफलता, भ्रष्टाचार और जनविरोधी नीतियों के कारण राज्य सरकार जनता का भरोसा खो रही है।
अशोक ने दावा किया कि आने वाले समय में राज्य की जनता कांग्रेस सरकार को उसके कामकाज का जवाब देगी। वहीं, कर्नाटक भाजपा अध्यक्ष बीवाई विजयेंद्र ने भी चुनाव परिणामों को कांग्रेस के खिलाफ निर्णायक जनादेश बताया।
विजयेंद्र ने खास तौर पर इस बात का जिक्र किया कि ये चुनाव बैलेट पेपर के जरिए कराए गए थे। उन्होंने कांग्रेस नेता राहुल गांधी के ‘वोट चोरी’ के आरोपों पर निशाना साधते हुए कहा कि कांग्रेस को वोट चोरी नहीं, बल्कि जनता के भरोसे की चोरी का सामना करना पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि EVM हो या बैलेट पेपर, कर्नाटक ने कांग्रेस के खिलाफ स्पष्ट फैसला दिया है।
कांग्रेस को दो सीटों की थी उम्मीद, बेंगलुरु की हार से लगा झटका
चुनाव परिणामों से कांग्रेस खेमे को निराशा हुई। मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने कहा कि पार्टी को दो सीटें जीतने की उम्मीद थी। उनके मुताबिक, कांग्रेस के पास पहले एक सीट थी और वह एक अन्य सीट जीतने की आशा कर रही थी। उन्होंने स्वीकार किया कि पार्टी को बेंगलुरु शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में हार की उम्मीद नहीं थी।
हालांकि, शिवकुमार ने इन नतीजों को सरकार के प्रदर्शन का अंतिम पैमाना मानने से इनकार किया। उन्होंने विपक्षी गठबंधन से सवाल करते हुए कहा कि मई 2023 में कांग्रेस के सत्ता में आने के बाद हुए कई विधानसभा उपचुनावों में NDA को भी हार का सामना करना पड़ा था। उनका तर्क था कि केवल MLC चुनावों के आधार पर सरकार के प्रदर्शन का आकलन नहीं किया जाना चाहिए।
शिवकुमार ने यह भी कहा कि कांग्रेस उम्मीदवारों को अच्छी संख्या में वोट मिले हैं। उनके बयान से संकेत मिलता है कि पार्टी इन नतीजों को बड़ा राजनीतिक संकट मानने के बजाय चुनावी परिस्थितियों के संदर्भ में देखना चाहती है।
कांग्रेस ने माना BJP-JD(S) गठबंधन से बढ़ी चुनौती
कर्नाटक प्रदेश कांग्रेस कमेटी (KPCC) के अध्यक्ष बीके हरिप्रसाद ने स्वीकार किया कि भाजपा और JD(S) के साथ आने से कांग्रेस के सामने चुनौती बढ़ गई है। उन्होंने कहा कि यदि दोनों विपक्षी दल मिलकर चुनाव लड़ते हैं, तो कांग्रेस के लिए खतरा पैदा हो सकता है। ऐसे में पार्टी को आगे की रणनीति पर विचार करना होगा।
हरिप्रसाद ने दावा किया कि भाजपा को पता है कि वह अकेले चुनाव नहीं जीत सकती। उनके मुताबिक, इस चुनाव में कुमारस्वामी को आगे रखकर गठबंधन ने जीत हासिल की।
कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष ने पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया से जुड़े कथित स्टिंग वीडियो और इस साल जून में राज्य सरकार के नेतृत्व में बदलाव को भी चुनावी हार की वजह मानने से इनकार किया। उन्होंने इन घटनाओं और MLC चुनाव के परिणामों के बीच किसी सीधे संबंध को स्वीकार नहीं किया।
जब उनसे पूछा गया कि क्या इन नतीजों को कांग्रेस सरकार के कुशासन का संकेत माना जाना चाहिए, तो उन्होंने भाजपा के वाराणसी में MLC सीटें हारने का उदाहरण दिया। वाराणसी लोकसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी करते हैं। इस तर्क के जरिए उन्होंने कहा कि किसी एक चुनाव के परिणाम को सीधे सरकार के कामकाज से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए।
2028 के विधानसभा चुनाव से पहले क्या है इस जीत का संकेत?
कर्नाटक के इन MLC चुनावों का विधानसभा में कांग्रेस के बहुमत पर तत्काल कोई असर नहीं पड़ेगा। विधान परिषद में पार्टी के पास 75 में से 38 सदस्य हैं, इसलिए चार सीटों के परिणाम से उसकी मौजूदा स्थिति नहीं बदली है। लेकिन राजनीतिक स्तर पर इस जीत का महत्व जरूर है।
भाजपा और JD(S) ने मिलकर चारों सीटें जीतकर यह दिखाया है कि गठबंधन के तौर पर वे कांग्रेस को चुनौती दे सकते हैं। खासकर बेंगलुरु शिक्षक सीट पर कांग्रेस के मौजूदा सदस्य की हार ने विपक्ष को अतिरिक्त उत्साह दिया है। भाजपा ने अपनी तीन पुरानी सीटें बचाईं, जबकि JD(S) ने एक सीट कांग्रेस से छीन ली।
दूसरी ओर, कांग्रेस ने नतीजों को सरकार के खिलाफ व्यापक जनादेश मानने से इनकार किया है। पार्टी का कहना है कि विधानसभा उपचुनावों में NDA की हार को भी इसी तरह देखा जाना चाहिए। हालांकि, इन परिणामों ने यह सवाल जरूर खड़ा किया है कि क्या भाजपा और JD(S) की एकजुटता 2028 के विधानसभा चुनावों से पहले कांग्रेस के लिए बड़ी चुनौती बन सकती है।
फिलहाल, MLC चुनावों में NDA की जीत ने कर्नाटक की राजनीति में विपक्षी गठबंधन का मनोबल बढ़ाया है। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि भाजपा और JD(S) इस सफलता को राज्यव्यापी राजनीतिक अभियान में कैसे बदलते हैं और कांग्रेस अपने संगठन तथा चुनावी रणनीति में क्या बदलाव करती है।
