आदि महोत्सव : बम्बू और तुम्बा आर्ट पर लोगों का रूझान ज्यादा

आदि महोत्सव : बम्बू और तुम्बा आर्ट पर लोगों का रूझान ज्यादा-Panchayat Times

रांची. पिछले शनिवार 29 फरवरी से मोरहाबादी मैदान में प्रारंभ हुई आदि महोत्सव दिन-ब-दिन लोगों का रूझान बढ़ता जा रहा है. कई लोग प्रत्येक दिन पूरे देश के 27 राज्यों से आए जनजातीय कलाकृतियों व सजावटी सामानों को देखने व खरीदने के लिए महोत्सव में आ रहे हैं.

जनजातीय कार्य मंत्रालय के ट्राइफेड द्वारा आयोजित इस महोत्सव में जनजातीय समुदाय द्वारा निर्मित सामग्रियों की खूब बिक्री हो रही है. ट्राइफेड के आकड़ों के अनुसार प्रति दिन 7-8 लाख रुपये से ज्यादा के सामानों की बिक्री हो रहा है आयोजकों के द्वारा उम्मीद जताई गई कि महोत्सव के समापन तक करीब एक करोड़ रुपये के सामानों की बिक्री होगी. महोत्सव में 400 जनजातीय कलाकार आए हुए हैं.

आदि महोत्सव : बम्बू और तुम्बा आर्ट पर लोगों का रूझान ज्यादा-Panchayat Times

महोत्सव में चारों ओर जनजातीय जीवन शैली की झलक देखने को मिल रही है. कई जनजातीय मूर्तिकला की भी प्रस्तुति की गई है. जहां आने वाले दर्शक और खरीददार सपरिवार फोटों खिंचवाने और सेल्फी लेने का क्रेज भी उनमें देखने को मिल रहा है.

बम्बू और तुम्बा आर्ट पर लोगों का रूझान ज्यादा

महोत्सव में छत्तीसगढ़ से आए बम्बू और तुम्बा आर्ट के स्टॉल में लोगों का ज्यादा रुझान है। बांस से बनी सामग्री लोगों में ज्यादा रोचक पैदा कर रही है. इसमें बांस का बना रेन मेकर आवाज निकलता हुआ बांस की कीमत 600 रुपये, बांस को घुमाने पर बांसुरी जैसी आवाज निकालने वाली यंत्र का मूल्य 200-250 रुपये तक है. सजावट के लिए तीर-धनुष 450-500 रुपये, वीन चैंग बांस का बना हुआ 500-600, बम्बू लैम्प 500 रुपये और बम्बू का लॉकी लैम्प 1500 रुपये में उपलब्ध है. कारीगर बुटलू राम ने बताया कि ये सामग्री बस्तर में बनता है. निर्माण कार्य से 22 लोग जुड़े है और पूरे देश में घुम घुमकर ये सामग्री बनाकर ट्राइफेड के माध्यम से बेचते है. इससे सभी को रोजगार मिला हुआ हैं.

सबर जाति के लोगों को मिला है अवसर

महोत्सव में सबर जनजाति समुदाय के द्वारा बनाई जाने वाली सामग्री भी उपलब्ध है. इसमें रोटी रखने की टोकरी, फल रखने, बास्केट सहित अन्य खजूर के पेड़ की पत्तियों और खासी घास से बनाई जाने वाली सामग्री शामिल है. कीमत 300 रुपये से शुरुआत होती है. कारीगर समर सबर ने बताया कि निर्माण कार्य से 20 लोगों को रोजगार मिला हुआ है.

झारखंडी जनजातीय वेशभूषा की धूम

महोत्सव में झारखंडी जनजातीय वेशभूषा और पोशाकों की काफी मांग हो रही है. सिमडेगा से आए कारीगर सायनाथ मेहर ने बताया कि हमलोगों के साथ 10 लोग निर्माण कार्य से जुड़े है. यही उनका पेशा भी है. आदिवासी गम्छा 100-350, पड़िया साड़ी 650-ढाई हजार, शॉल 400-950 रुपये में उपलब्ध है.