बाबूलाल मरांडी पीड़ित विस्थापितों से मिलने बारूघुटू पहुंचे

बाबूलाल मरांडी पैदल चल कर पीड़ित विस्थापितों से मिलने बारूघुटू पहुंचे -Panchayat Times

रामगढ़. रामगढ़ जिले के वेस्ट बोकारो स्थित टाटा की कंपनी ने रविवार को पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी का काफिला रोक दिया. बाबूलाल मरांडी वेस्ट बोकारो के दुर्गम इलाके बारूघुटू में विस्थापितों से मिलने जा रहे थे. टाटा कंपनी रोड़ा अटकाने के बाद भी पूर्व मुख्यमंत्री नहीं रुके. उन्होंने अपना काफिला रोक दिया और पैदल ही गड्ढों को पार कर उस दुर्गम गांव में पहुंच गए.

मौके पर पहुंचे पूर्व मुख्यमंत्री सह झाविमो सुप्रीमो बाबूलाल मरांडी ने कहा कि 5 दिन पहले बारूघुटू के 38 परिवारों को बेरहमी से टाटा कंपनी के गुंडों ने पीटा था उनकी झोपड़ियों को तोड़ डाला था. कई मरीजों का इलाज रांची के रिम्स में चल रहा था. टाटा कंपनी के इस रवैए के खिलाफ वह विस्थापितों से बात कर रहे थे.

गरीब चिंता में है कि वह अपने बच्चों को कैसे आगे बढ़ाएं : बाबूलाल मरांडी

मरांडी ने कहा कि बारूघुटू गांव को टाटा कंपनी ने उजाड़ दिया है. यह उनकी गुंडागर्दी का ही परिचायक है. यह सारे कार्य रघुवर सरकार के साथ मिलकर कंपनी कर रही है. उन्होंने सीधे तौर पर टाटा कंपनी को गुंडों को पालने, दलालों को प्रश्रय देने और गरीबों को उजाड़ने वाली कंपनी करार दिया. कहा, अगर टाटा कंपनी को वहां से कोयला निकालना ही था तो वहां रह रहे लोगों को पहले पुनर्वासित करना चाहिए था. लेकिन कंपनी ने उन्हें बिना कोई स्थान दिए गुंडागर्दी के सहारे बेघर कर दिया.

बाबूलाल मरांडी पैदल चल कर पीड़ित विस्थापितों से मिलने बारूघुटू पहुंचे-Panchayat Times

उन्होंने कहा कि कोयला टाटा कंपनी की बपौती नहीं है. उस इलाके में रह रहे लोगों के नाम मतदाता सूची में शामिल हैं. वहां के राशन कार्ड में उनका नाम है. वहां के आधार कार्ड में मजदूरों के नाम शामिल हैं। ऐसी स्थिति में सिर्फ जमीन का राग अलापना टाटा कंपनी के लिए सही नहीं है.

बाबूलाल मरांडी ने कहा कि भाजपा की सरकार 2022 तक प्रदेश के हर परिवार को घर देने का दावा करती है, लेकिन हकीकत यह है कि वह गरीबों की झोपड़ियां भी उजाड़ रही है. उन्होंने यह भी कहा कि वेस्ट बोकारो एरिया में टाटा कंपनी ने कुछ दलालों को पाल रखा है. यहां तक कि कुछ राजनीतिक दल के कार्यकर्ता भी हैं जो उन दलालों की सूची में शामिल हैं. जब भी कोई व्यक्ति टाटा कंपनी के विरोध में आवाज उठाता है तो कंपनी उसके घर की बिजली और पानी काट देती है.

उन्होंने कहा कि जब जेआरडी टाटा उद्योग लगाने आए थे तो झारखंड में ही उन्हें पहला स्थान मिला था. आज कोयला व्यापार का राष्ट्रीयकरण हो चुका है, लेकिन टाटा की माइंस का नेशनलाइजेशन नहीं हुआ है. पर, इसका अर्थ यह नहीं है कि कंपनी जमींदारी प्रथा पर उतर आए. गुंडागर्दी के सहारे गरीबों को उखाड़ फेंके. इसकी इजाजत उसे किसी ने नहीं दी है। जो गरीब दुर्गम इलाके में रह रहे हैं वह भी कभी यहां अंडरग्राउंड माइन्स में काम करने ही आए होंगे. कई ऐसे विस्थापितों से उनकी मुलाकात हुई जो इसी दुर्गम स्थान पर पैदा हुए और यही बूढ़े हो चले हैं. कई लोग 50 साल तो, कई लोग 100 साल से इस इलाके में रह रहे हैं और नारकीय जीवन जीने को विवश हैं. बावजूद इसके टाटा कंपनी सीएसआर फंड से विकास का खोखला दावा कर रही है.

बाबूलाल मरांडी पैदल चल कर पीड़ित विस्थापितों से मिलने बारूघुटू पहुंचे -Panchayat Times

उन्होंने कहा कि एक सप्ताह में विस्थापितों की सूची बन कर उनके पास पहुंच जाएगी. इस मुद्दे को वे सीधे टाटा के पास रखेंगे. अगर उन्हें न्याय नहीं मिलता है तो इस पर अपने आंदोलन की रणनीति तैयार करेंगे. उन्होंने कहा कि टाटा कंपनी बारूघुटू में झोपड़ियों में रह रहे लोगों को ₹400 प्रति स्क्वायर फीट की दर से मुआवजा देने की बात करती है. यह रकम काफी कम है. इस मुआवजे की रकम से न तो वह गरीब परिवार कहीं जमीन खरीद सकता है और न ही कहीं उसे आसरा मिलेगा.