भारत का एक गांव जहां खाना केवल सोर्य उर्जा से ही पकता है

गांव में बाहरी प्रदूषण तो कम होता पर घर के अंदर जानलेवा प्रदूषण Panchayat Times

नई दिल्ली. भारत के किसी भी गांव को देखकर कहा जा सकता है कि वहां प्रदुषण शहरों के मुताबिक कम है लेकिन बहुत हद तक ये कहना ये ठीक नहीं है. क्योंकि गांव में बाहरी प्रदूषण तो कम होता पर घर के अंदर जानलेवा प्रदूषण होता है. जिसका बहुत बड़ा कारण है लकड़ी को जलाकर खाना पकाना. साथ ही गोबर को सुखाकर फिर उसको जलाकर या फिर पेड़ के सुखे पत्तों को जलाकर भी खाना पकाया जाता है. इससे घरों के अंदर बेहद खतरनाक प्रदुषण होता है जिससे निजात दिलाना बेहद जरूरी है.

केंद्र सरकार और राज्य सरकारें अपनी तरफ से कई प्रयास कर रहे हैं. उज्जवला योजना के कारण अब घर-घर में रसोई गैस कनैक्शन पहुंच रहे हैं. लेकिन ग्रामीण कनैक्शन तो ले लेते हैं पर रसौई गैस को भरवाना उनको काफी मंहगा पड़ता है. जिस कारण कई लोग वापस लकड़ी के चुल्हों को दोबारा उपयोग करने लगे हैं. सुर्य इस समस्या का समाधान कर सकते हैं. मतलब सोलर एनर्जी जिससे बिना प्रदुषण के बिजली मिलेगी और इंडक्शन चुल्हों पर रोटियां सिकेंगी, खाना पकेगा.

एक गांव जो सोलर एनर्जी से खाना पकाता है

मध्य प्रदेश के बेतूल जिले में बांचा गांव इसका सबसे अच्छा उदाहरण हो सकता है. बेतूल गांव में 73 घर हैं जहां अब हर घर में सोलर एनर्जी से मिली बिजली से इंडक्शन चुल्हों पर खाना पकाया जाता है. यहां रहने वाले लोगों को अब लकड़ियों के धुएं से छुटकारा मिल गया है. दरअसल, केंद्र सरकार के सहयोग से इस गांव में सोलर पैनल लगाए गए हैं और इसी सौर उर्जा की मदद से ग्रामीण लोग इंडक्शन पर खाना बनाते हैं. यही वजह है कि गांव में घरों में ईंधन की सप्लाई आसानी से हो रही है और महिलाएं बिना किसी परेशानी के खाना बना रही हैं. उन्हें आंखों में लगने वाले धुएं से छुटकारा मिल गया है.

गांव में इस मॉडल को आईआईटी बॉम्बे के छात्रों ने बनाया है. केंद्र सरकार ने बांचा गांव को प्रयोग के लिए चुना. पिछले साल दिसंबर, 2018 में यहां सोलर प्लेट लगवाने का काम पूरा हुआ था. गांव वाले इस प्रयोग से बेहद खुश हैं. उन्हें अब लकड़ियां चुनने के लिए जंगल नहीं जाना पड़ता है. बारिश के दिनों में तो लकड़ियां गिली हो जाती थी तो परेशानी भी बढ़ जाती थी. अब आराम है हर मौसम में खाना आराम से बनाया जा रहा है. पर्यावरण संरक्षण के लिए ऐसे प्रयोग हजारों गांवों में करने की जरूरत है.