11 नवंबर को आदिवासी आत्मकथा ‘जंगल से आगे’ का लोकार्पण

रांची. भारत की पहली आदिवासी आत्मकथा ‘बियोंड द जंगल’... - Panchayat Times
प्रतीक चित्र

रांची. भारत की पहली आदिवासी आत्मकथा ‘बियोंड द जंगल’ के प्रकाशन के 50 साल पूरे होने पर एक दिवसीय राष्ट्रीय आयोजन 11 नवंबर को रांची में होगा. इस अवसर पर अनेक आदिवासी साहित्यकार रांची में जुटेंगे. आयोजन की थीम है ‘जंगल के पारः आदिवासी आत्म कथाकार’. कार्यक्रम में ‘बियोंड द जंगल’ के हिंदी अनुवाद ‘जंगल से आगे’ का लोकर्पण भी होगा.

आयोजन का उद्घाटन सुबह 10.30 बजे प्रख्यात आदिवासी साहित्यकार डॉ. निर्मल मिंज करेंगे तथा वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी व आत्म संस्मरण लेखिका वंदना दादेल विशिष्ट अतिथि के रूप में मौजूद रहेंगी. इस एक दिवसीय राष्ट्रीय कार्यक्रम का आयोजन झारखंडी भाषा साहित्य संस्कृति अखड़ा की ओर से रांची प्रेस क्लब के सभागार में होगा. अखड़ा की महासचिव वंदना टेटे ने आयोजन की जानकारी देते हुए बताया कि इरुला आदिवासी समुदाय की सीता रत्नमाला ने 50 साल पहले अपनी आत्मकथा अंग्रेजी में लिखी थी. जिसे लंदन के प्रतिष्ठित प्रकाशन संस्थान ब्लैकवुड ने प्रकाशित किया था. सीता की लिखी हुई ‘बियोंड द जंगल’ भारत की पहली आदिवासी आत्मकथा है जो अब रेयर हो चुकी है. यह आत्मकथा भारतीय साहित्य की एक बड़ी उपलब्धि है जिसे हमने फिर से खोज निकाला है.

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उन्होंने बताया कि इस एक दिवसीय आयोजन में दिल्ली के जामिया मिलिया की अंग्रेजी प्राध्यापक डॉ. आईवी हांसदा, दिल्ली विश्वविद्यालय में सहायक प्रोफेसर रही डॉ. हीरा मीणा, पश्चिम बंगाल के संताली साहित्यकार सुंदर मनोज हेम्ब्रम, बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय के डॉ. अनुज लुगुन, महात्मा गांधी सेंट्रल युनिवर्सिटी, कटिहार के डॉ. प्रमोद मीणा, घाटशिला के संताली लेखक चंद्रमोहन किस्कु सहित ज्योति लकड़ा, सावित्री बड़ाईक, शांति खलखो और ग्लैडसन डुंगडुंग प्रमुख वक्ता होंगे.