कुल्लू दशहरा : भगवान नरसिंह संग राजा की जलेब

कुल्लू. आज भी सैंकड़ों वर्षों पुरानी परंपराओं को कुल्लू दशहरा में जिंदा रखा गया है. लोग आज भी उतनी श्रद्धा और उत्सावह से अपनी इस परंपरा का निर्वाह कर रहे हैं. इसी कड़ी में कुल्लू शहर के रक्षक माने जाने वाले भगवान नरसिंह की अलौकिक एवं भव्य जलेब यात्रा शुरू हो गई है. आकर्षण का केंद्र रहने वाली नरसिंह भगवान की जलेब में भव्य नजारा देखने को मिला. इस दौरान कुल्लू शहर वाद्ययंत्रों की ध्वनि से गूंज उठा. इस जलेब को राजा की जलेब भी कहा जाता है, क्योंकि इस जलेब में कुल्लू के राजा परंपरा के अनुसार पालकी में सज-धज कर यात्रा करते हैं.

कुल्लू के राजा माने जाने वाले महेश्वर सिंह इस विशेष प्रकार की पालकी में बैठकर परिक्रमा पर निकल पड़े हैं और यह जलेब पांच दिनों तक चलेगी. इसमें दशहरा पर्व में भाग लेने आए सैंकड़ों देवी-देवता बारी-बारी से भाग लेते हैं. इस जलेब में जहां आगे-आगे नरसिंह भगवान की घोड़ी सज धज कर चलती है. वहीं, राजा की पालकी के साथ दोनों तरफ देवता के रथ चलते हैं. यह जलेब राजा की चनणी से शुरू होती है और पूरे ढालपुर की परिक्रमा करके चनणी के पास ही समाप्त होती है.

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यह जलेब पुराने समय में कानून व्यवस्था बनाए रखने और दुष्ट आत्माओं की कुदृष्टि से बचने के लिए चलती थी. यह परंपरा आज भी जीवित है. कुल्लू की देव संस्कृति अपनी अलग परंपरा के लिए विश्व भर में प्रसिद्ध है. सदियों से चली आ रही परंपरा को चलाने के लिए यहां के लोग सिर धड़ की बाजी देने के लिए भी तैयार रहते हैं. यही कारण है कि आज भी पुराने समय से चली आ रही परंपरा कुल्लू में जिंदा है. गौर रहे कि राजा की जलेब की परंपरा सदियों से चली आ रही है. जब से दशहरा पर्व शुरू हुआ तभी से यह परंपरा चली है. दशहरा पर्व में पुरातन समय में कुल्लू के राजाओं की जो भूमिका थी वह आज भी उनके वंशज उसी तरह से पुरातन रीति रिवाजों और परंपरागत ढंग से निभा रहे हैं.

बहरहाल दशहरा पर्व में आज भी सदियों से चली आ रही पुरानी प्रथाएं एवं अनूठी संस्कृति सांस ले रही है. राजा की चनणी से लेकर पूरे शहर में निकली इस जलेब में दर्जनों देवी-देवता ढोल-नगाड़ों की  थाप पर परिक्रमा पर निकले और लोग नाचते-गाते रहे. कुल्लू के राजा आज भी पालकी में बैठकर कुल्लू शहर की सैर करते हैं. बेशक राजतंत्र समाप्त हुआ हो लेकिन कुल्लू में दशहरा उत्सव के दौरान फिर से राजतंत्र जीवित हो उठा है. यह परंपरा भी उसी दौरान 1651 ईस्वी में शुरू हुई थी जब यहां पर भगवान रघुनाथ जी के आगमन के बाद दशहरा पर्व शुरू हुआ था. माना जाता है कि भगवान नरसिंह इस दौरान पूरे कुल्लू शहर की किलाबंदी कर देते हैं और अपनी शक्तियों से किसी भी दुष्ट आत्मा को देवनगरी में प्रवेश करने नहीं देते.