झारखंड: पुण्यतिथि पर याद किए गए जन नायक भगवान बिरसा मुंडा

बिरसा मुंडा के पुण्यतिथि पर झारखंड की राज्यपाल द्रौपदी मुर्मू ने उनके समाधि स्थल पर श्रद्धा सुमन अर्पित किए.

रांची. भारतीय इतिहास में बिरसा मुंडा एक ऐसे नायक थे जिन्होंने भारत के झारखंड में अपने क्रांतिकारी चिंतन से उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में आदिवासी समाज की दशा और दिशा बदलकर नवीन सामाजिक और राजनीतिक युग का सूत्रपात किया था. 9 जून 1900 में बिरसा मुंडा शहीद हो गए थे. धरती आबा भगवान बिरसा मुंडा के पुण्यतिथि पर झारखंड की राज्यपाल द्रौपदी मुर्मू ने उनके समाधि स्थल पर श्रद्धा सुमन अर्पित किए. वहीं, मुख्यमंत्री रघुवर दास ने ट्वीट कर कहा है कि आजादी के जंग के महानायक, आदिवासी समाज में आई नवचेतना के सूत्रधार, झारखण्ड के वीर योद्धा, धरती आबा, भगवान बिरसा मुंडा की पुण्यतिथि पर शत-शत नमन अर्पित करते हुए कहा कि आइये हम सब मिलकर उनके सपनों के अनुरुप शिक्षित और विकसित झारखण्ड बनाकर उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि दें.

धरती आबा भगवान बिरसा मुंडा के शहादत दिवस के अवसर पर पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा, डिप्टी मेयर संजीव विजयवर्गीय सहित सैकड़ों की संख्या में आम लोगो और पाहन लोगो ने पारंपरिक रीति रिवाज के साथ पूजा-अर्चना की. इस मौके पर बिरसा मुंडा को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए अर्जुन मुंडा ने कहा कि उनके विचारों से प्रेरणा लेने की जरुरत है. आज झारखंड उनके बताए हुए आदर्श पर बढ़ रहा है और आने वाले दिनों में झारखंड देश-दुनिया का विकसित राज्य में से एक होगा.

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हेमंत सोरेन ने कहा कि बिरसा मुंडा की सहादत को अनंत काल तक याद किया जाएगा. उन्होंने युवाओं को एक जुट कर आजादी की लड़ाई शुरू की थी. उन्होंने कहा कि झारखंड का जन्म उनके जयंती के दिन हुआ है और झारखंड को हमसब मिल कर उनके सपने की तरह बनाएंगे. हेमंत सोरेन ने युवाओं से आह्वान किया कि वे धरती आबा के आदर्शों को अपने जीवन मे उतारें.

शिक्षा का महत्व समझाया

बिरसा मुंडा काले कानूनों को चुनौती देकर बर्बर ब्रिटिश साम्राज्य को हिला दिया. बिरसा मुंडा सही मायने में पराक्रम और सामाजिक जागरण के धरातल पर तत्कालीन युग के एकलव्य और स्वामी विवेकानंद थे. भारतीय जमींदारों और जागीरदारों तथा ब्रिटिश शासकों के शोषण की भट्टी में आदिवासी समाज झुलस रहा था. बिरसा मुंडा ने आदिवासियों को शोषण से मुक्ति दिलाने के लिए उन्हें तीन स्तरों पर संगठित करना आवश्यक समझा. पहला तो सामाजिक स्तर पर ताकि आदिवासी-समाज अंधविश्वासों और ढकोसलों के चंगुल से छूट कर पाखंड के पिंजरे से बाहर आ सके. इसके लिए उन्होंने ने आदिवासियों को स्वच्छता का संस्कार सिखाया. शिक्षा का महत्व समझाया. सहयोग और सरकार का रास्ता दिखाया.

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बिरसा मुंडा के पुण्यतिथि पर झारखंड की राज्यपाल द्रौपदी मुर्मू ने उनके समाधि स्थल पर श्रद्धा सुमन अर्पित किए.

सामाजिक स्तर पर आदिवासियों के इस जागरण से जमींदार-जागीरदार और तत्कालीन ब्रिटिश शासन तो बौखलाया ही, पाखंडी झाड़-फूंक करने वालों की दुकानदारी भी ठप हो गई. ये सब बिरसा मुंडा के खिलाफ हो गए. उन्होंने बिरसा को साजिश रचकर फंसाने की काली करतूतें प्रारंभ की. आर्थिक स्तर पर सुधार ताकि आदिवासी समाज को जमींदारों और जागीरदारों क आर्थिक शोषण से मुक्त किया जा सके. बिरसा मुंडा ने जब सामाजिक स्तर पर आदिवासी समाज में चेतना पैदा कर दी तो आर्थिक स्तर पर सारे आदिवासी शोषण के विरुद्ध स्वयं ही संगठित होने लगे. बिरसा मुंडा ने उनके नेतृत्व की कमान संभाली.

आदिवासियों में चेतना की चिंगारी

आदिवासियों ने ‘बेगारी प्रथा’ के विरुद्ध जबर्दस्त आंदोलन किया. परिणामस्वरूप जमींदारों और जागीरदारों के घरों और खेतों और वन की भूमि पर कार्य रूक गया. राजनीतिक स्तर पर आदिवासियों को संगठित करना. चूंकि उन्होंने सामाजिक और आर्थिक स्तर पर आदिवासियों में चेतना की चिंगारी सुलगा दी थी, इसलिए राजनीतिक स्तर पर इसे आग बनने में देर नहीं लगी. आदिवासी अपने राजनीतिक अधिकारों के प्रति सजग हुए. ब्रिटिश हुकूमत ने इसे खतरे का संकेत समझकर बिरसा मुंडा को गिरफ्तार करके जेल में डाल दिया. वहां अंग्रेजों ने उन्हें धीमा जहर दिया था. जिस कारण वे 9 जून 1900 को शहीद हो गए.