गांव में महुआ के पेड़ कहींं यादों में ही न रह जाए

बाग-बगीचों से अब महुआ के पेड़ खत्म हो रहे हैं - Panchayat Times

नई दिल्ली. वैज्ञानिक हमेशा से मानते आए हैं कि महुआ कई रोगों को नाश कर देती है लेकिन अफसोस की बात है कि अब कई जगह महुआ के पेड़ लूप्त होने के कगार पे हैं. बिहार में पश्चिमी चंपारण जिले की बगहा नगरपालिका (कस्बा) के बाग-बगीचों से अब महुआ के पेड़ खत्म हो रहे हैं. जबकि अठाहरवीं, उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी तक बगहा के बाग-बगीचों में महुआ का पेड़ लगाकर घरों से असाध्य रोगों को भगाने का उपाय माना जाता था. लोगों की धारणा थी कि महुआ खाने  से परिवार के सदस्यों में गठिया, एनीमिया, ब्रोंकाइटिस, मुंह के छाले, दांत की बीमारी और अन्य कई बीमारियों से घर के लोग ग्रसित नहीं होंगे.

इक्कीसवीं शताब्दी के व्यापारिक दौर में बाग-बगीचों में महुआ के पौधे के स्थान पर दूसरे कीमती फल देनेवाले पौधों को लगाने की प्रथा जब से शुरू हुई,तब से अब तक महुआ के पेड़ लुप्त होने लगे हैं. वाल्मीकि व्याघ्र परियोजना में मौजूद महुआ के पेड़ों से निकलनेवाले फूल और फल जमीनदोज हो जाते हैं या आदिवासी क्षेत्र के रहनेवाले लोग पुलिस की  दबिश और चुपचोरी इन जंगलों से चुनकर शराब बनाने का काम करते हैं. बिहार सरकार महुआ से शराब बनाने पर प्रतिबंध लगा चुकी है. फिर भी इस क्षेत्र में महुआ से शराब लोग बनाते हैं. कुल मिलाकर जो महुआ बगहा क्षेत्र में असाध्य रोगों के इलाज के लिए जाना जाता था, उसकी पहचान  सिमटकर अब शराब बनाने तक रह गयी है. ग्रामीणों के अनुसार महुआ पोषक तत्वों की खान है और यह महिलाओं के लिए विशेषकर ग्रामीण क्षेत्र की महिलाओं में आम तौर पर होने वाली खून की कमी जैसी समस्या को दूर करता है.

महुआ के पेड़ लूप्त होने के कगार पे हैं - Panchayat Times

इलाहाबाद विश्वविद्यालय के गृह विज्ञान विभाग की एसोसिएट प्रोफेसर और न्यूट्रीशनल बायोकेमिस्ट्री विशेषज्ञ नीतू मिश्रा के नेतृत्व में हुए शोध से इस  बात की पुष्टि होती है कि महुआ बीमार महिलाओं के लिए अमृततुल्य है. इसी विश्विद्यालय के सेंटर फॉर फूड टेक्नोलॉजी की पीएचडी की छात्रा जेबा खान और अन्य विद्यार्थियों ने मांडा खास, मउहारी, निवेरिया और भरारी गांव में 200 से अधिक महिलाओं को इस अध्ययन में शामिल किया. नीतू मिश्रा के प्रकाशित शोधों में कहा गया है कि महिलाओं को दो समूहों में बांटा गया. एक समूह को महुआ और इससे बने खाद्य उत्पाद को खिलाया गया. दूसरे समूह को इससे वंचित रखा गया. यह प्रयोग एक महीने तक किया गया. जिन महिलाओं को महुआ से बने खाद्य उत्पाद खिलाए गए, उनके खून में एनीमिया का स्तर कम होता पाया गया. केंद्र सरकार के विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग की इस परियोजना पर आगे और काम किया जायेगा. अगर यह कहा जाय कि ग्रामीण इलाकों में महिलाओं में एनीमिया का स्तर बहुत ऊंचा है और इसे ठीक करने के लिए स्थानीय स्तर पर महुआ जैसी कई चीजें उपलब्ध हैं लेकिन अज्ञानता की वजह से लोग इसका लाभ नहीं उठा नहीं पा रहे हैं.

महुआ के पेड़ लूप्त होने के कगार पे हैं - Panchayat Times

ग्रामीण अम्बिका महतो, विपत महतो का कहना है कि हमलोग जंगल किनारे सटे गांव रामपुरवा ननहकार से हैं. पहले जंगल से झरता-परता चुनने का वन विभाग ने अधिकार दिया था लेकिन वन विभाग की अब मनाही है जो जंगल में महुआ चुनने जायेगा, वह जेल जायेगा. इसके अलावा अब गांवों में भी महुआ चुनने की प्रथा खत्म हो गई. बगहा बाजार आनन्दनगर के रहनेवाले कृषक संजय तिवारी बताते हैं कि अब के बाग-बगीचों में महुआ का पेड़ रखना घाटा का सौदा है, पहले यह सोचकर यह पेड़ लोग लगाते थे कि अपने और दूसरों के घर में महुआ का फूल-फल जायेगा तो असाध्य रोग का खात्मा होगा पर अब यह सोच ऐसी हो गयी है कि महुआ के पेड़ की  जगह पर बड़ा फलदार पेड़ लगाओ जिससे मोटी रकम घर में आये. ग्रामीण क्षेत्रों में जहां महुआ का पेड़ बचा है,वहां उसका जतन भी नहीं हो रहा है. संजय तिवारी ने  बताया कि आजकल गांव में महुआ चुनने वाले लोग नहीं मिलते ,जिससे यह पेड़ों से गिरकर खराब हो जाता है और भेड़ बकरियां इसे चर जाती हैं. वहीं दूसरी ओर जो महुआ बीनकर बाजार में जाते हैं  वह  शराब माफिया तक पहुंच जाते हैं.

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बगहा के होमियोपैथिक चिकित्सक डॉ. अजय कुमार ने बताया कि भारत में परंपरागत तौर पर महुआ, इसके फूल और पत्तियों का कई बीमारियों की रोकथाम और इलाज में उपयोग किया जाता रहा है. इसके फूल का उपयोग ब्रोंकाइटिस, मुंह के छाले और अन्य कई बीमारियों के इलाज में उपयोग किया जाता रहा है. महुआ के पेड़ की छाल का उपयोग मधुमेह, गठिया, रक्तस्राव, अल्सर, टांसिलाइटिस, गले में सूजन के इलाज में किया जाता है. इस तरह से महुआ पेड़ की सभी चीजों का उपयोग किसी न किसी बीमारी के ईलाज में किया जाता है. बहरहाल महुआ के गुम हो रहे पेड़ों पर सरकारों का ध्यान अति आवश्यक है,नहीं तो डायनासोर की तरह यह भी कहीं गायब नहीं हो जाय.