हिमाचल में जानलेवा जापानी बुखार की दस्तक

हिमाचल में जानलेवा जापानी बुखार की दस्तक

नई दिल्ली. उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल में पिछले चार दशक से मासूम बच्चों के जान का दुश्मन बनी जापानी इंसेफेलाइटिस नामक बीमारी ने हिमाचल में भी दस्तक दे दी है. पिछले चार दशक में जापानी इंसेफेलाइटिस नामक बीमारी से देशभर में लगभग 10 हजार मासूम बच्चों की मौत हो चुकी है. ऐसे में हिमाचल में इस बीमारी के कारण दहशत फैल गई है. सोलन जिले के तीन बच्चों में जापानी इंसेफेलाइटिस की चपेट में आने की पुष्टि हुई है.

रविवार को पुणे की लैब से शिमला पहुंची रिपोर्ट में कहा गया है कि आईजीएमसी में उपचाराधीन आठ में से तीन बच्चों में दिमागी बुखार के लक्षण पाए गए हैं. यह बीमारी दो से 12 साल के बीच की आयु सीमा के बच्चों पर हमला कर रही है. आईजीएमसी में इस बीमारी से पीडि़त छह साल का बच्चा वेंटीलेटर पर है, इसके अलावा दो साल के एक और बच्चे में इस बीमारी के लक्षण पाए जाने की पुष्टि हुई है. धर्मपुर इलाके की एक तीन वर्षीय बच्ची इस बीमारी की चपेट में है.

जापानी इंसेफेलाइटिस से पीड़ित बच्चे का फाइल फोटो

माना जाता था कि जापानी इंसेफेलाइटिस नामक बीमारी सेृ अब तक हिमाचल और जम्मू-कश्मीर दो ही राज्य सुरक्षित थे लेकिन अब यह बीमारी इस राज्य में भी पांव पसार रही है. 20 मई, 2018 के बाद आईजीएमसी में बुखार से पीड़ित धर्मपुर क्षेत्र के बच्चे उपचार के लिए लाए गए थे. कई दिनों तक ठीक न होने के कारण स्वाइन फ्लू और निपाह वायरस की जांच के लिए ब्लड के नमूने पुणे भेजे गए थे. इस दौरान उपचाराधीन सभी सैंपल नेगेटिव आए थे. हालांकि बाद में एक बच्चे में दिमागी बुखार के लक्षण पाए जाने की पुष्टि हुई थी. इस आधार पर आईजीएमसी प्रबंधन ने अन्य सात बच्चों के सैंपल दोबारा आईसीएमआर राष्ट्रीय विषाणु विज्ञान संस्थान पुणे में भेजे.

रविवार को पहुंची ताजा रिपोर्ट में कहा गया है कि दो और बच्चों में जापानी इंसेफेलाइटिस के लक्षण हैं. हालांकि राज्य सरकार ने पहले ही सतर्कता बरतते हुए वायरस प्रभावित क्षेत्र में बीमारी को रोकने के लिए कई टीमें तैनात कर दी हैं. इसके लिए दिल्ली से दो अलग-अलग टीमें धर्मपुर में तैनात हैं.

जेई पर नियंत्रण के लिए साल 2006 में पहली बार चला था टीकाकरण कार्यक्रम :

जापानी इंसेफेलाइटिस ने देश में साल 1950 में पहली बार दस्तक दी थी लेकिन इसको लेकर केन्द्र और राज्य सरकारों ने साल 2006 में इसकी गंभीरता को समझते हुए टीकाकरण अभियान शुरू किया. भारत में पहली बीमारी 1950 के दशक के मध्य में तमिलनाडु के वेल्लोर में इस बीमारी को रिपोर्ट किया गया. इसके अगले दशक में क्रिश्चिन मेडिकल कालेज वेल्लोर ने इंसेफेलाइटिस के 52 मामलों की पुष्टि की. इसके बाद वहां पर इस बीमारी के रोकथाम के लिए काफी काम किया गया.

जापानी इंसेफेलाइटिस के अधिकतर मामले उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश, पश्‍चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु, कर्नाटक, केरल, बिहार, गोवा और हरियाणा में पाए गए हैं. जापानी इंसेफेलाइटिस का कोई विशेष उपचार नहीं है. राज्‍य सरकारों और केंद्र सरकार की तरफ से इस महामारी को रोकने के लिए कई प्रयास किए गए जिसमें चुनिंदा क्षेत्रों में टीकाकरण भी शामिल है.

जापानी इंसेफेलाइटिस की रोकथाम में टीकाकरण के महत्‍व को देखते हुए केंद्र सरकार ने वर्ष 2006 के दौरान पांच राज्‍यों (उत्तर प्रदेश, बिहार, असम, कर्नाटक तथा पश्‍चिम बंगाल) के 11 जिलों में एक से 15 वर्ष के आयु वर्ग के बच्‍चों के लिए एक टीकाकरण कार्यक्रम चलाया गया था. जिसमें एसए-14-14-2 टीके की एकल डोज का प्रयोग किया गया. वर्ष 2007 में इस कार्यक्रम का विस्‍तार 9 राज्‍यों के 27 जिलों में और 2008 में 9 राज्‍यों के 23 जिलों में किया गया.

जापानी इंसेफेलाइटिस यानि जेई को सबसे पहले 1871 में जापान में रिपोर्ट किया गया. शुरूआत में इसे जापानी बी इंसेफेलाइटिस कह गया लेकिन जापान ने इस बीमार के नियंत्रण पर काम करन शुरू किया और साल 1960 में इस बीमार पर काबू पा लिया. लेकिन इसके बाद यह बीमारी भारत, नेपाल, चीन, थाईलैंड, वियतनाम, इंडोनेशिया, सिंगापुर और मलेशिया जैसे देशों में 2 से लेकर 15 साल के बच्चों को अपने चपेटे में लिया.

देश में जापानी इंसेफेलाइटिस की बड़ी महामारी वर्ष 1973 में पश्चिम बंगाल के बांकुरा और बर्दवान जिलों में देखने को मिली. जहां पर बार-बार बारिश होने के बाद खासकर मानसून के बाद यह बीमारी फैली. इसके बाद यह बीमारी पश्चिम बंगाल, बिहार, असम, उत्ता प्रदेश के साथ ही दक्षिणी राज्यों तमिलनाडु, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में इसके छिटपुट मामले देखने को मिले. देश पश्चिमी तट गोवा में जेई का पहला मामला 1993 में देखा गया. साल 1990 में जेई का प्रकोप हरियाणा और उड़ीसा में देखा गया. जेई बीमारी केरल में 1996 में देखने को मिली.

साल 2001 तक महाराष्ट्र में जेई बीमारी ने दस्तक नहीं थी लेकिन वर्ष 2002 से लेकर 2003 के बीच महाराष्ट्र के भंडारा, गोंदिया, और नागपुर में देखने को मिला जहां पर 16 से लेकर 115 मौतें जेई की वजह से हुई थी. 2004 में भी इस प्रदेश में तीन लोगों की मौत जेई से हुई थी. इसके बाद यहां के गढ़चिरोली, परभनी, वर्धा, अमरावती, यवतमाल और नागपुर में भी जेई की बीमारी को रिपोर्ट किया गया.

विषाणुजन्य बीमारी जापानी इंसेफेलाइटिस :

जापानी इंसेफेलाइटिस एक विषाणुजन्य बीमारी है, जिससे होने वाली मौतों की दर अधिक है. यह बीमारी लंबे समय तक रहती है. यह रोग सूक्ष्‍म विषाणु के कारण होता है. ये विषाणु धान के खेतों और पानी वाले क्षेत्रों में अधिक होते हैं. इसे फैलाने वाले मच्‍छर मैदानों में रहते है, जिससे इस पर नियंत्रण पाना मुश्‍किल होता है. जापानी इंसेफेलाइटिस मच्छर जनित रोग है. यह मुख्य रूप से ग्रामीण कृषि क्षेत्रों की बीमारी है, यह बीमारी मच्छरों, सूअरों और अन्य जलाशयों के साथ घनिष्ठ संबंध में पैदा होती है.

गोरखपुर में राष्ट्रीय विषाणु विज्ञान संस्थान की मांग :

पिछले चार दशक से मासूम बच्चों के जान का दुश्मन बनी जापानी इंसेफेलाइटिस नामक बीमारी के कारणों को पता लगाने के लिए बाबा राघव दास मेडिकल कॉलेज गोरखपुर सहित देश के अलग-अलग जगहों पर राष्ट्रीय विषाणु विज्ञान संस्थान की मांग की जा रही है. देश में अभी पुणे में राष्ट्रीय विषाणु विज्ञान संस्थान है, जिसकी स्थापना साल 1952 में राकफेलर फाउंडेशन और भारतीय आयुर्विज्ञान अुनसंधान परिषद के संयुक्त प्रयास से किया गया था. पहले इसका नाम विषाणु अनुसंधान केन्द्र था. यह संस्थान इंफ्लूएंजा, जापानी इंसेफेलाइटिस, चंदीपुरा, रोटा और खसरा जैसी जानलेवा विषाणुओं के संक्रमण की रोकथाम पर काम कर रहा है.