सुनामी में घास : प्रबंधन बनाम प्रशासन

आइए सत्ता पक्ष की चुनावी सफलता को प्रशासन (सुशासन) की कसौटी से भी देखें

भाजपा की इस सुनामी में कई समीकरण और छोटे-मोटे प्रबंधन के बांस टूटकर गिर गए

नई दिल्ली. भाजपा की इस सुनामी में कई समीकरण और छोटे-मोटे प्रबंधन के बांस टूटकर गिर गए हैं लेकिन कठिन मुद्दों की कुछ बेहया घास अभी भी जमी हुई है. ये घास केवल सुशासन से ही हटाई जा सकती हैं.

2014 में नरेंद्र मोदी ने चुनाव लड़ने के लिए विकास और भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाया था और गुजरात मॉडल को सामने रखा था. मतदाताओं ने इसपर भरोसा भी किया और भाजपा ने अपने बलबूते स्पष्ट बहुमत के साथ सरकार बनाई थी. मुझे बेहद खुशी हुई थी जब मोदी जी ने अपने एक चुनावी भाषण में तब ‘डेमोग्राफिक डिविडेंड’ की चर्चा की थी. इसका अर्थ यह है कि भारत के पास एक सुअवसर है जो उसकी जनसँख्या के युवा प्रतिशत से उभर आया है. भारत की जनसंख्या में सर्वाधिक प्रतिशत युवाओं का है तो उत्पादक आयु वर्ग की संख्या सर्वाधिक हुई और निर्भर आयु वर्ग कम हुआ. यह स्थिति हमेशा नहीं रहने वाली. यदि इस युवा जनसँख्या को प्रभावी मानव संसाधन में बदल दिया जाय तो भारत विश्व के अग्रणी देशों में तुरत ही आ सकता है. नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के साथ ही यह आशा बलवती हुई कि अब नयी सरकार मानव संसाधन निर्मित करने के दो बड़े घटकों यथा-शिक्षा (कौशल) व स्वास्थ्य पर सर्वाधिक ध्यान देगी. 2014 से 2019 तक यदि आंकडें देखें तो मोदी सरकार ने शिक्षा मद में लगातार बजट अलोकेशन कम किया है. यह 6.15 % से घटकर 3.48 % प्रतिशत रह गयी. प्राथमिक शिक्षा और उच्च शिक्षा में कोई नया विजन नदारद रहा. नियुक्तियां ठिठकी ही रहीं.

आयुष्मान भारत नाम से एक महत्वाकांक्षी योजना

स्वास्थ्य सेवा में मनमोहन और मोदी दोनों ही सरकारों का काम उल्लेखनीय नहीं है. स्वास्थ्य मद में दोनों के खर्च लगातार सिकुड़े हैं. मोदी सरकार ने 2025 तक स्वास्थ्य मद में जीडीपी का महज 2.5% खर्च करने का लक्ष्य रखा है. मोदी सरकार ने अपने कार्यकाल के आखिरी महीनों में (सितम्बर 2018) आयुष्मान भारत नाम से एक महत्वाकांक्षी योजना जरुर शुरू की लेकिन पुरे भारत में महज 18000 प्राइवेट अस्पतालों को ही इसमें जोड़ा जा सका. ऐसी कोई भी योजना तब तक नहीं सफल हो सकती जबतक एक जमीनी सार्वजनिक स्वास्थ्य संरक्षा व्यवस्था न निर्मित की जाये. जन औषधि केंद्र व स्टेंट व घुटना प्रत्यारोपण सामग्रियों को सस्ता कर एक राहत देने की कोशिश अवश्य की गयी. यदि स्वास्थ्य व शिक्षा पर ध्यान न दिया जाये तो भारत अपने डेमोग्राफिक डिविडेंड का लाभ नहीं ले सकेगा और यही युवा जनसँख्या कुछ समय बाद इसी अर्थव्यवस्था पर उचित शिक्षा व स्वास्थ्य के अभाव में उलटे एक बोझ बनेगी, इसप्रकार एक ऐतिहासिक अवसर जाता रहेगा. इसे वैश्विक स्तर भी महसूस किया गया जब अक्टूबर, 2018 में विश्व बैंक द्वारा पहली बार जारी किये ह्यूमन कैपिटल इंडेक्स में भारत का स्थान पाकिस्तान, नेपाल, श्रीलंका, बांग्लादेश आदि के साथ 115वें स्थान पर रहा.

भारत अपनी प्रकृति में सेकुलर है

पुरे कार्यकाल में इतिहास का जिक्र बार-बार किया गया. भारत का जब विभाजन हुआ तो वह एक लोकतान्त्रिक देश नहीं था और न ही विभाजन के प्रश्न पर कोई रेफेरेंडम ही हुआ था. विभाजन के बाद जो संविधान आया उसमें देश की एक ऐसी पहचान को अपनाया गया जिसमें भाषा, जाति और धर्म के आधार पर कोई विभेद नहीं किया गया. 1951 में पाकिस्तान की जनगणना के मुताबिक वहाँ हिन्दू आबादी 1.3 % थी और हालिया जनगणना (2001) में यह बेहद मामूली बढ़त (0.3%) के साथ 1.6 % हो गयी. इधर भारत में 1951 की जनगणना के अनुसार मुस्लिम आबादी 9.8% थी, जो 2001 में बढ़कर 14.2 % हो गयी. भारत और पाकिस्तान के राजनीतिक प्रकृति का अंतर सुस्पष्ट है और जिसपर हमें गर्व भी है. भारत अपनी प्रकृति में सेकुलर है यह आंकड़े भी पुष्ट करते हैं. लेकिन इन आंकड़ों को तोड़मरोड़ कर एक धार्मिक असुरक्षा का माहौल बनाया गया और सांप्रदायिक तुष्टीकरण का लाभ सभी दलों ने लेने की कोशिश की. एक जिम्मेदार सरकार को इस स्थिति को रोकने का इंतजाम करना था.

तेल के दामों को बाजार के नियंत्रण में छोड़ दिया

मोदी सरकार के पूर्व अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री मनमोहन की लगातार दो कार्यकाल की सरकार थी. मनमोहन सरकार के मंत्रियों में एक दंभ दिखने लगा था और अक्सर उनकी आलोचना उस समय ऑक्सब्रिज कुनबा कहकर की जाती थी. मोदी सरकार के अर्थवयवस्था का जायजा यदि लिया जाय तो यह कहना होगा कि मोदी सरकार ने फिस्कल घाटे को कम किया, ऋण को नियंत्रित किया, इन्फ्लेशन पर लगाम लगाई. लेकिन इसमें दो तथ्य बेहद महत्वपूर्ण भी जोड़े जाने चाहिए जिससे पुरी बात स्पष्ट हो. इसी समय में अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में तेल के दाम बेहद निचले स्तर पर थे और लगातार अच्छे मानसून से फसल उत्पादन भी बढ़िया हुआ. 30 डॉलर प्रति बैरल पर कीमत आने के बाद भी सरकार ने देश में तेल की कीमतें घटाईं नहीं, बल्कि तेल के दामों को बाजार के नियंत्रण में छोड़ दिया गया.

जीडीपी ग्रोथ

ग्रोथ रेट के आंकड़े मोदी सरकार में कार्यकाल के दुसरे वित्तीय वर्ष से ही 2011-12 को आधार वर्ष मानकर (पहले आधार वर्ष 2004-05 था) दिखाया जा रहा था. लेकिन तीन स्तर पर बदलाव किये गए और उन आधारों पर मनमोहन सिंह के कार्यकाल और मोदी कार्यकाल के आंकड़ों की तुलना प्रदर्शित की गयी, इसमें मोदी सरकार के लिए ग्रोथ रेट जहाँ 7.5 % दिखाया गया वहीं, मनमोहन के लिए यह 6.7 % ही रहा. इस नए तरीके से मनमोहन काल में अर्जित डबल डिजिट ग्रोथ को भी सिंगल डिजिट (10.3% से 8.5 %) का बना दिया गया. इन आंकड़ों को यूँ दिखाने के लिए तीन बदलाव किये गए- पहला आधार वर्ष बदला गया, डेटा के स्रोत आधारों को बदला गया और तीसरा जीडीपी गणना की पद्धति बदली गयी जिसमें अर्थव्यवस्था के प्राथमिक सेक्टर और द्वितीयक सेक्टर के आंकड़ो को अधिक वरीयता दी गयी और तृतीयक सेक्टर के आंकड़ों को कम महत्त्व दिया गया (जबकि तृतीयक सेक्टर यानि सेवा क्षेत्र का योग सर्वाधिक 54% है जबकि पहला और दूसरा सेक्टर क्रमशः 17% व 29% ही योग देते हैं). मनमोहन सिंह के एक बयान के मुताबिक UPA की ग्रोथ रेट तक पहुंचने के लिए सरकार को 10.6 % की रेट को बनाना होगा, जाहिर है जो संभव नहीं हो सका. 1% वार्षिक भी यदि जीडीपी ग्रोथ में कमी आती है तो यह तकरीबन 1.5 लाख करोड़ रूपये का नुकसान राष्ट्र को पहुँचाता है, इससे होने वाले मानवीय असर की कल्पना की जा सकती है. पिछले पांच सालों में अप्रत्यक्ष कर की संख्या बढ़ी है जबकि सब जानते हैं कि एक बेहतरीन अर्थव्यवस्था में प्रत्यक्ष कर अधिक होते हैं और अप्रत्यक्ष कर कम रखे जाते हैं. मनरेगा में लगातार फंड घटाए गए. ग्यारह करोड़ से अधिक सीनियर सिटिजन के लिए कोई खास इंतजाम नहीं किया गया.

500 और 1000 के नोट्स

एक बड़ी उपलब्धि जीएसटी का लागु करवाना जरुर रहा पर यहां भी यह नोट करने वाली बात है कि यह आइडिया UPA सरकार का रहा और विपक्ष की भाजपा ने सरकार का तब साथ नहीं दिया था. लेकिन इसबार सरकार के प्रयास अहम् तो रहे ही, विपक्ष ने भी सहकारी संघवाद को चरितार्थ किया. मोदी सरकार का एक बड़ा फैसला नोटबंदी रहा. एक आरटीआई से आरबीआई के एक मीटिंग के मिनट्स निकाले गए और पता चला कि तत्कालीन गवर्नर उर्जित पटेल सहित पूरा आरबीआई बोर्ड इस नोटबंदी के खिलाफ था. रघुराम राजन भी इसके खिलाफ थे, 500 और 1000 के नोट्स मिलकर कुल करेंसी का 86% बनाते थे, यह जाहिर था कि इसपर अचानक रोक एक बड़ा संकट ला सकता था. लेकिन नोटबंदी की गयी . बार-बार नियम बदले गए, लोग लम्बी कतारों में खड़े रहे, बार-बार सरकार बताती रही कि यह काला धन के खिलाफ है तो कभी यह फेक करेंसी के खिलाफ है तो कभी कहा कि इससे कश्मीर में आतंकियों की कमर टूट जायेगी (पुलवामा फिर भी हुआ), यह देश को कैशलेस इकॉनमी की ओर ले जायेगा, आदि-आदि. जिस देश के लोगों का अभी इसी सरकार ने जनधन से अकाउंट खुलवाया हो, वह कैसे तुरंत ही कैशलेस इकॉनमी की तरफ बढ़ जायेगा. इसका तर्क उससमय भोथरा हो गया जब सरकार ने दो बड़ी करेंसी का नोट हटाकर एक बहुत बड़ी करेंसी (2000 रूपये) निर्गत कर दी. नोटबंदी ने इनफॉर्मल इकॉनमी को चोट तो पहुंचाई ही, कितने नोट जमा हुए और कितने नए छापे गए, यह भी एक रहस्य ही रहा. जीएसटी और नोटबंदी का असर पड़ना ही था और यह पड़ा भी. फिर सरकार ने आरबीआई गवर्नर उर्जित पटेल पर इंटरेस्ट रेट कम करने का दबाव बनाया और उर्जित ने इस्तीफ़ा देना ज्यादा उचित समझा. नोटबंदी, जनधन योजना आदि से बैंकिंग सेक्टर के कर्मचारियों पर अतिरिक्त दबाव भी पड़ा लेकिन मोदी सरकार ने भी बैंक बोर्ड ब्यूरो द्वारा सुझाये सुधारों को लागु करने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई. ध्यातव्य है कि जनधन, आधार और मोबाइल (JAM ट्रिनिटी ) की योजना पहले मनमोहन सिंह के कार्यकाल में सोची गयी और शुरू की गयी और उस समय विपक्ष में बैठी भाजपा ने आधार का पुरजोर विरोध किया था. सत्ता में आने पर यही आधार, इतना अधिक अनिवार्य बनाया गया कि कई बार सुप्रीम कोर्ट की शरण लेनी पड़ी.

गरीब महिला के रसोई में सिलेंडर

उज्ज्वला योजना और गिव अप योजना खासी सफल और चर्चित रही. यहाँ यह कहना जरुरी है कि राहुल गाँधी UPA-II के समय फिस्कल डीफिसिट को कम करने की गरज से ही साल में केवल 9 सिलेंडरों पर सब्सिडी रखना चाहते थे और बाकी तीन सिलेंडर रेफीलिंग कॉस्ट को बाजार आधारित रखना चाहते थे. उस वक्त में भाजपा के राजनाथ सिंह बेहद कड़े विरोध में संसद की कार्यवाही ही नहीं चलने दे रहे थे. मोदी सरकार ने स्वयं से सब्सिडी इन सिलेंडरों पर छोड़ने की बात कही और इसे राष्ट्रीय अभिमान से जोड़ दिया और यह भी कि इससे किसी गरीब महिला के रसोई में सिलेंडर पहुंचेगा. यहां यह समझना जरुरी है कि यह काम सरकार का ही है कि गरीब के घर में सब्सीडाइज्ड सिलेंडर पहुंचे पर इसे गिव अप अभियान से होशियारी से जोड़ दिया गया . एक पार्टी जो तीन सिलेंडर पर भी सब्सिडी छोड़ने के खिलाफ थी, उसकी सरकार ने गिव अप अभियान में बारहो सिलेंडर पर सब्सिडी हटा ली.

18000 गांवो में बिजली

इन्फ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्र में यकीनन मोदी सरकार ने उल्लेखनीय काम किया है. राष्ट्रीय राजमार्ग, भारतमाला एवं सागरमाला प्रोजेक्ट, क्षेत्रीय हवाई मार्ग संपर्क, कोयला व उर्जा क्षेत्र के काम और विद्युतीकरण की उपलब्धियाँ तो हैं ही . लेकिन विद्युतीकरण में मोदी सरकार ने काफी बढ़ा-चढ़ा करके श्रेय लिया. भारत में छह लाख गाँव हैं तकरीबन, जिसमें से पिछले पाँच सालों में 18000 गांवो में बिजली पहुँचाई गयी है. इसी तरह स्वच्छ भारत अभियान, मोदी सरकार का संभवतः सबसे सफल अभियान रहा है . इसमें जागरूकता तो दिखी ही, शौचालयों का निर्माण भी हुआ.

रोजगार का डेटा उपलब्ध नहीं

बेरोजगारी के मोर्चे पर मोदी सरकार के पास कहने को यकीनन कुछ ठोस नहीं है . सरकारी आँकड़े निकाले नहीं गए और आरटीआई से भी कुछ निकालना संभव नहीं रहा. आंकड़ों के अभाव में भी फ़िलहाल यूपीएससी के भर्तियों से एक ट्रेंड समझा जा सकता है. 2015 में जहाँ 1164 भर्तियाँ प्रकाशित की गयीं थीं, वहीं 2016 में 1079, 2017 में 980, 2018 में दशक की न्यूनतम 780 भर्तियाँ ही निर्गत की गयीं, जबकि मिनिस्टर ऑफ़ स्टेट फॉर पर्सनेल जितेन्द्र सिंह ने लोकसभा को अपने एक लिखित जवाब में तकरीबन 1500 आईएएस ऑफिसर्स की कमी की बात स्वीकारी थी. UPA-II के पांच सालों में यही भर्तियाँ बढ़कर 1364 तक पहुँच गयीं थीं. मुद्रा योजना में छोटे और लघु व्यवसायों के लिए वित्त की व्यवस्था की गयी लेकिन इस मद में दिए जाने वाले औसत मात्रा के लोन काफी छोटे हैं जो पर्याप्त नहीं है फिर चूँकि रोजगार का डेटा उपलब्ध नहीं है तो कुछ कहना भी सम्भव नहीं है.

मोदी की विदेश यात्राएं

नरेंद मोदी ने अपने पांच वर्ष के कार्यकाल में कुल 94 देशों की यात्राएँ की थीं, जबकि मनमोहन ने दस वर्षों में कुल 95 देशों की यात्राएँ की थीं. खर्चों की बात यदि न भी करें तो भी एक विषय यहाँ प्रासंगिक है . मनमोहन के दुसरे कार्यकाल में ऍफ़डीआई में 20.02 % का उछाल आया था वहीं मोदी के कार्यकाल में 3.08 % की गिरावट देखी गयी. पारदर्शिता की बात भी यहीं कर लें अगर तो मनमोहन के साथ विदेश जाने वाले व्यवसायियों के नाम सार्वजनिक तौर पर जाने जा सकते थे, लेकिन आरटीआई द्वारा मोदी की विदेश यात्राओं में साथ जाने वाले व्यवसायियों के नाम जानने पर पाबंदी थी.

पुलिस रिफार्म ठन्डे बस्ते में

मोदी सरकार ने एक परसेप्शन बेहद ही बेहतरीन ढंग से गढ़ा और वह था सुरक्षा की दृष्टि से मजबूत सरकार. घर में घुसकर मारने वाली सरकार, फैसले लेने वाली सरकार. फिर भी पुलवामा में चालीस जवान मारे गए जबकि सुचना थी और जवानों को हवाई मार्ग से नहीं ले जाया गया . वह एक सुरक्षा चूक ही थी कि उस मार्ग पर कैसे भी स्कोर्पियो पहुंच सकी. इसका जवाब बालाकोट ओपरेशन से किया गया, जिसकी सफलता आजतक संदिग्ध बताई जाती है. उम्मीद थी कि जिसतरह उरी सर्जिकल स्ट्राइक के फोटो व विडिओ जारी किये गए, चुनाव के समय ही सही, बालाकोट के भी जारी किये जायेंगे, क्लाउड थ्योरी जरुर प्रचारित हुई. अभी पता चला कि अपना विमान ही क्षतिग्रस्त हुआ और जवान मारा गया. बालाकोट के बाद कैप्टन अभिनन्दन पकड़ लिए गए और अंततः सरकार के प्रयासों से उनकी वापसी हुई. अगर यह तुलना करें कि मोदी सरकार रक्षा क्षेत्र को बजट दृष्टिकोण से कितना महत्त्व देती है तो यह काफी हाशिये पर है. यह हाल तो खैर मनमोहन सिंह का भी रहा लेकिन कम से कम वह सरकार रक्षा मद को खर्च करने के मामले में मोदी सरकार से बेहतर दिखती है. उम्मीद थी लेकिन मोदी सरकार ने कोई रक्षा सुधार भी प्रारंभ नहीं किया. पुलिस रिफार्म भी ठन्डे बस्ते में रहा.

कश्मीर फिर से अशांत

कश्मीर मुद्दे पर भी एक पड़ताल जरूरी है. मनमोहन सिंह की सरकार ने एक अपेक्षाकृत शांत कश्मीर मोदी सरकार को सौपा था. उम्मीद थी कि स्पष्ट बहुमत की मोदी सरकार कश्मीर मुद्दे को एक निर्णायक मोड़ पर पहुंचाएगी लेकिन सरकार की नीति में एकतरफा सिक्योरिटी फोर्स अप्रोच ही दिखा और आज कश्मीर फिर से अशांत हो उठा है. युद्ध और सुरक्षा दबाव अकेले इसका समाधान नहीं कर सकती. भारत, पाकिस्तान को पहले ही कितनी बार युद्ध में हरा चुका है और मोदी सरकार भी कश्मीर में एकतरफा नीति का परिणाम सकारात्मक नहीं है यह देख चुकी है.

भाजपा को राज्य सभा में भी बहुमत मिलने की उम्मीद

मोदी सरकार में लोकतांत्रिक एवं सांविधानिक संस्थाएं भी दबाव में रहीं. सुप्रीम कोर्ट के जजों ने पहली बार प्रेस कांफ्रेंस की और अपना विरोध मुख्य न्यायाधीश के प्रति जताया. इस विरोध के पीछे जो केस था वह जज लोया केस था. जज लोया सोहराबुद्दीन फेक एनकाउंटर केस को देख रहे थे, जब वे मृत पाए गए थे. सबरीमाला मंदिर केस में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट ही निर्देश दिया था कि किसी भी उम्र की महिला मंदिर में प्रवेश कर सकती है लेकिन फिर भी भाजपा केरल में इस भावना के विरुद्ध लामबंद रही. विश्वविद्यालयों पर वैचारिक आक्रमण किए गए, उनकी स्वायत्तता को परे करते हुए एच आर डी मिनिस्ट्री की तरफ से गाईडलाइन आयी कि अब पीएचडी केवल ‘नेशनल रिलेवेंट टॉपिक’ पर ही करवायी जाय. संसद के कई बिल जैसे आधार बिल और इलेक्टोरल बॉन्ड बिल को मनी बिल व फाइनेंस बिल बताकर लोकसभा से ही पास कराया गया और उसे राज्य सभा तक पहुँचने ही नहीं दिया गया क्योंकि वहाँ भाजपा का बहुमत नहीं था. सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप हुआ तो ओर्डिनेंस रूट अपनाया गया. इस नए बहुमत के साथ अगले साल अप्रैल तक संभवतः भाजपा को राज्य सभा में भी बहुमत मिलने की उम्मीद है, आप कल्पना करिए फिर कितनी गुंजायश बचेगी बहस की.

काला धन, सफेद किया जा सकता है

सबसे इंट्रेस्टिंग रहा इलेक्टोरल बॉन्ड का मामला. इसमें राजनीतिक दलों को कितना भी चंदा दिया जा सकता है और उसपर कंपनी को टैक्स में 80 GGB के तहत 100% छूट भी मिलेगी और दान दाताओं को अपना नाम भी सार्वजानिक नहीं करना होगा. आरटीआई यहाँ भी बेबस रही. पूरी दुनिया में ऐसा उदाहरण नहीं मिलता. इसपर टिप्पणी करते हुए सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश गोगोई ने कहा था कि इससे तो काला धन, सफेद किया जा सकता है. अब नोटबंदी के उद्देश्य का, क्या? एफसीआरए ऐक्ट को संशोधित किया गया, जिससे भाजपा, काँग्रेस और लेफ्ट पार्टियाँ किसी भी विदेशी स्रोत से धन ले सकती हैं और उनपर कभी कोई जाँच नहीं बिठाई जा सकती. इस संशोधन को 1976 से ही प्रभावी कर दिया गया क्योंकि दिल्ली हाईकोर्ट 1976 से ऐसे ही मामलों पर एक जाँच बिठाने वाली थी.

भारत-अमरीका न्यूक्लियर संधि

इन पांच सालों में जुबानी जो गलत बातें कही गयीं उन्हें जाने भी दें तो भी फेक न्यूज, फेक तथ्यों के आधार पर ट्वीट, लव जिहाद, घर वापसी, नेशनलीज्म को देशभक्ति का पर्याय बना देना, सड़कों और शहरों का नामकरण जिसमें कि अँग्रेजों के द्वारा दिये गये नाम स्वीकार किए गए लेकिन मुस्लिम नाम खासकर बदले गए, ट्रॉल की परंपरा, माॅब लींन्चिंग, आदि पर सख्त कदम नहीं लिए गए. संविधान के प्रीएंबल के कुछ शब्द जैसे सेकुलरिज्म बिल्कुल ही अप्रासंगिक करने की कोशिशें हुईं. जेट एयरवेज और बीएसएनएल के लोगों की नौकिरयां और उनकी उदास आँखें लंबे वक्त तक याद रहेंगी. जियो यूनिवर्सिटी का बिना अस्तित्व में आए ही इंस्टीट्यूट ऑफ एमीनेंस बन जाना रहस्य रहेगा. विदेश नीति की बात करें तो क्षेत्र में कोई नई पहल मुकाम तक नहीं पहुंची और सार्क ठिठका पड़ा रहा. वैश्विक राजनीति में कोई एक उपलब्धि नहीं है जिसे भारत-अमरीका न्यूक्लियर संधि के समकक्ष रखा जाए.

दुःख प्रकट करे या विकास का उलाहना दे

भाजपा अथवा किसी भी दल अथवा सांसद के सफलता की प्रशंसा का आधार क्या यह ही होना चाहिए कि उसने चुनाव को अन्य दलों के मुकाबले अधिक बेहतर ढंग से प्रबंधित किया? क्या चुनाव बेहतर प्रबंधन की परीक्षा है न कि बेहतर को चुनने की प्रक्रिया? यह कुछ वैसे बात हुई कि बेहतर नकल प्रबंधन करके यदि कोई विद्यार्थी मेरिट में आता हो तो वह उसके माता पिता को स्वीकार्य होने लगे, इससे कोई अंतर न पड़े कि विद्यार्थी ने कुछ सीखा अथवा नहीं. कितना विकास माननीय सांसद जी ने किया अथवा सरकार ने किया, यह प्रश्न गौड़ हो गया है, प्रश्न महत्वपूर्ण यह हो गया कि कौन नेता या कौन सा दल कितना बेहतर दाँव चलता है और चुनाव जीत जाता है! पिछली सरकार के चुनाव जीतने का अर्थ क्या यह है कि उसने जो प्रशासन के क्षेत्र में प्रदर्शन किया, उसकी समीक्षा नहीं होनी चाहिए या जीत का अर्थ उनके हर कदम का सही होना भी मान लिया जाय ? लगातार मोदी सरकार, चुनाव मोड में रही है, यह इस हद तक हुआ है कि पार्टी और सरकार का अंतर एक हद तक मिट गया है. अब चूँकि एक बार फिर मोदी सरकार प्रचंड बहुमत से आयी है तो ऊपर लिखे प्रशासन दृष्टिकोण की समीक्षा बेहद समीचीन है. यहाँ से भाजपा को चुनौती लेनी है और आगे बढ़ना है . पहली बार विकास का मुद्दा था तो दुसरी बार केवल अपने काम के आधार पर चुनाव लड़ने की बजाय भाजपा ने अधिकांशतः भावनात्मक मुद्दों पर चुनाव लड़ा है. यह बात नोट की जाय. जब मै प्रशासनिक उपलब्धियाँ खंगालता हूँ तो मै हद से हद यहां तक सोच पाता हूँ कि यदि काम को आधार बनाया जाये तो भाजपा की दिल्ली की राह दोबारा जरुर मुश्किल होती. लेकिन जाहिर है कि वोटर किसी भी सांसद और पार्टी का काम देखने की बजाय समीकरण और प्रबंधन में स्वयं को अधिक फिट पाता है. इसलिए ही तो सभी पार्टियों के कुछ अच्छे नेता जिनका अपने क्षेत्र में काम करने का रिकॉर्ड है, वे हार गए हैं और कई चेहरे जिनका राजनीति से अथवा किसी भी प्रकार के जमीनी संघर्ष से कोई सरोकार नहीं है, वे जीत गए हैं. कामकाज करना और जनता की आकांक्षाओं को पूरा करना इतना आसान नहीं है. पहचान के मुद्दे पर लोगों को बांट कर उन्हें स्वतंत्र वोटर से प्रतिबद्ध वोटबैंक बना देने से चुनाव आसान हो जाता है. जब किसी भी चुनाव में वोट देते समय एक वोटर यह नहीं देखता कि किसने कितना काम किया है या किसने कैसे काम करने का वादा किया है, बस किसी पहचान जैसे जाति, धर्म आदि या किसी जनहित के स्थान पर किसी भावनात्मक मुद्दे को आधार बनाकर अपना कीमती वोट दे देता है तो उसे यह भी अधिकार कहां रह जाता है कि वह अपने देश की दारुण हालत पर दुःख प्रकट करे या विकास का उलाहना दे. जनता ने तो अपना फैसला जरुर दिया है लेकिन इतना जरुर कहना होगा कि प्रबंधन ने प्रशासन पर बाजी मारी है. जीत की इस सुनामी में भी जायज मुद्दों की घास अभी बची हुई है जिनका यह सुनामी कुछ भी न कर सकी है.

पूरी आशा से यह फिर भी लिखना चाहता हूँ कि नई मोदी सरकार यह अवसर नहीं गंवायेगी और भारत को उसका वाजिब स्थान दिलायेगी.

श्रीश पाठक
(लेखक गलगोटिया यूनिवर्सिटी राजनीति विज्ञान विभाग के अध्यक्ष हैं)