ग्राम न्यायालयों की स्थापना से ग्रामीण क्षेत्र के लोगों को हुआ लाभ, लेकिन अब भी कई चुनौतियां

नई दिल्ली/रांची. आज भी भारत की कुल जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा देश के सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में रहता है. ग्रामीण क्षेत्रों में जनसंख्या के अनुपात में कानून संस्थाओं की कमी और ग्रामीण क्षेत्रों से इनकी दूरी देश के सभी नागरिकों तक कानून व्यवस्था की पहुंच के लिये एक बड़ी चुनौती है.

ज्ञात हो कि अभी देश भर के जिला न्यायालयों और उससे निचले स्तरों पर कार्यरत न्यायालयों में लंबित मामलों की संख्या लगभग 3.19 करोड़ थी. इनमें से लगभग 21 प्रतिशत केस 5 साल से भी अधिक समय से लंबित हैं. ग्राम न्यायालयों की स्थापना से न्याय तंत्र के इस भार में कुछ स्तर तक कमी लाने में सहायता मिलेगी.

ग्राम न्यायालयों की स्थापना के कुछ प्रमूख लाभ

ग्राम पंचायत स्तर पर न्यायालयों की तक पहुंच से लोगों के लिये समय और धन की बचत होगी. लंबित मामलों में एक बड़ी संख्या उन मामलों की भी है जिनका आपसी सुलह या मध्यस्थता से निस्तारण किया जा सकता है, ग्राम न्यायालयों के गठन से ऐसे मामलों में भारी कमी आएगी. न्याय प्रक्रिया में आसानी और इसके तीव्र निस्तारण से जनता में विधि व्यवस्था के प्रति विश्वास बढ़ेगा.

क्या है बड़ी चुनौतियां

शुरुआत में कुछ राज्यों में ग्राम न्यायालयों की स्थापना की गई लेकिन बाद में राज्यों ने इस संदर्भ में अनेक चुनौतियों का हवाला देकर योजना के प्रति कोई उत्साह नहीं दिखाया. ग्राम न्यायालयों की स्थापना में कुछ चुनौतियांं निम्नलिखित हैं –

मानव संसाधनों की कमी

अभी योजना की रूपरेखा में समिति ने ऐसे न्यायालयों की स्थापना के लिये 1 करोड़ रुपए की लागत का अनुमान लगाया था, गौरतलब है कि पिछले 10 वर्षों में यह लागत और बढ़ी है. इसे देखते हुए ज्यादातर राज्यों ने केंद्र सरकार की सहायता के बगैर ग्राम पंचायत स्तर पर ग्राम न्यायालयों के संचालन में असमर्थता जताई है.

संसाधनों का अभाव

देश के अनेक दूरस्थ क्षेत्रों के गांवों में महत्त्वपूर्ण संसाधनों, जैसे-24 घंटे बिजली, पक्की सड़क, बेहतर इंटरनेट का न होना भी इस योजना के कार्यान्वयन में एक बड़ी बाधा रही है.

सहयोग की कमी

इस योजना के क्रियान्वयन में एक बड़ी चुनौती विधि तंत्र से जुड़े अन्य विभागों के सहयोग में कमी रही है. जिला स्तर पर कार्यरत वकील, पुलिस और न्याय विभाग के अनेक शीर्ष अधिकारी नगरों या शहरों को छोड़कर गांवों में नहीं जाना चाहते, जिसके कारण योजना को समय-समय पर विभिन्न समूहों के प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष विरोध का सामना करना पड़ा है.

राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी

ग्राम न्यायालय के संचालन में अधिकांश बाधाएं मानव-निर्मित हैं और कुछ प्रयासों से इनका समाधान किया जा सकता है. लेकिन इस परियोजना को लागू करने के लिये शीर्ष राजनीतिक प्रतिनिधियों से अपेक्षित प्रयास में भारी कमी देखी गई है.

समाधान

ग्राम न्यायालय की स्थापना और संचालन के लिये राज्य तथा केंद्र सरकारों को मिलकर आर्थिक सहयोग करना चाहिये, जिससे देश की न्यायिक व्यवस्था का सुचारु रूप से संचालन हो सके. जिला स्तर पर एवं अन्य स्थानीय न्यायालयों में रिक्त पदों को भरकर न्याय तंत्र पर बढ़ रहे बोझ को कम किया जा सकता है. देश के सुदूर हिस्सों के गांवों तक विभिन्न महत्त्वपूर्ण सुविधाओं जैसे-सड़क, इंटरनेट, बिजली आदि की पहुंच को बेहतर बनाकर ग्राम न्यायालयों तक लोगों की पहुंच को बढ़ाया जा सकता है.

साथ ही सरकार द्वारा इस योजना से जुड़े अन्य हितधारकों जैसे-वकीलों, स्टांप पेपर विक्रेताओं आदि की जिम्मेदारी सुनिश्चित कर इस योजना के सफल क्रियान्वयन में तेजी लाई जा सकती है. इस योजना का सबसे महत्त्वपूर्ण अंग ग्रामीण क्षेत्रों में रह रहे नागरिक हैं, अतः उनके बीच ग्राम न्यायालयों और न्यायालय में उनके अधिकारों को लेकर जागरूकता बढ़ाकर इस योजना के उद्देश्यों को सफल बनाया जा सकता है.