कभी दोस्त तो कभी दुश्मन कुछ ऐसा रिश्ता है वीरभद्र और सुखराम का

कभी दोस्त तो कभी दुश्मन कुछ ऐसा रिश्ता है वीरभद्र और सुखराम का-Panchayat Times
साभार इंटरनेट

शिमला. हिमाचल की राजनीति के दो दिग्गज नेताओं वीरभद्र सिंह और पं. सुखराम के बीच सियासी दोस्ती-दुश्मनी का रिश्ता रहा है, जो कभी भी स्थाई नहीं रहा है.कभी एक पार्टी में रहते हुए एक दूसरे के खिलाफ शब्द बाण छोड़ते रहे, तो कभी एक दूसरे की मदद के लिए भी आगे आते रहे हैं.

लगभग सवा वर्ष पहले एक दूसरे के खिलाफ शब्दों के तीर छोड़ने वाले पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह और पूर्व केंद्रीय मंत्री पंडित सुखराम अब फिर से गले मिल लिए हैं. पंडित सुखराम और आश्रय शर्मा के कांग्रेस में शामिल होने के बाद शुक्रवार को पहली बार दिल्ली में दोनों नेताओं की मुलाकात हुई. पंडित सुखराम व आश्रय शर्मा दोनों दिल्ली में वीरभद्र सिंह के घर पर मिलने के लिए पहुंचे. इस दौरान दोनों नेताओं के बीच आधे घंटे तक चर्चा हुई. कांग्रेस के इन दोनों दिग्गजों का मंडी संसदीय क्षेत्र में खासा प्रभाव रहा है.

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कांग्रेस का गढ़ रही मंडी संसदीय सीट पर जहां वीरभद्र सिंह पर तीन बार विजयी होकर केंद्र में मंत्री बनें हैं. वहीं पर पं. सुखराम भी तीन बार जीत दर्ज कर केंद्र में मंत्री पद हासिल करने में कामयाब रहे हैं. यह भी संयोग रहा है कि दोनों ही नेताओं को मंडी संसदीय सीट पर अपने राजनीतिक जीवन की पहली हार झेलनी पड़ी है.

कौल सिंह ने वीरभद्र और सुखराम के लिए कही ये बड़ी बात

वीरभद्र सिंह जहां 1977 में जनता पार्टी के उम्मीदवार गंगा सिंह ठाकुर के हाथों पराजित हुए, वहीं पं. सुखराम को 1989 में भाजपा के महेश्वर सिंह ने पराजित कर कांग्रेस के मजबूत गढ़ में भाजपा का भगवा परचम फहराने में कामयाबी हासिल की थी. कांग्रेस पार्टी में रहते हुए भी वीरभद्र और पं. सुखराम के बीच वर्चस्व की जंग रही है. दोनों के बीच मुख्यमंत्री के पद को लेकर टकराव रहा है. जिसमें वीरभद्र सिंह ने बाजी मारी. इसके बावजूद पं. सुखराम ने केंद्र में संचार मंत्री के रूप में अपना दबदबा कायम किया.

1993 में पं. सुखराम मुख्यमंत्री पद के प्रबल दावेदार

1993 में पं. सुखराम मुख्यमंत्री पद के प्रबल दावेदार थे. उनके साथ केंद्रीय नेतृत्व भी था. मगर इस बार भी वीरभद्र सिंह ने बाजी पलट दी थी.इन दोनों दिग्गजों के बीच सियासी टकराव का फायदा कांग्रेस पार्टी को भी होता रहा है.दोनों ही अपने-अपने प्रभाव के चलते कांग्रेस की जीत में मददगार साबित होते और कांग्रेस प्रदेश की सत्ता पर काबिज होती रही. 1996 में पं. सुखराम के घर छापेमारी के बाद कांग्रेस से बाहर होना पड़ा. 1997 में पं. सुखराम ने क्षेत्रीय दल हिमाचल विकास पार्टी का गठन कर 1998 में मात्र पांच सीटों के दम पर प्रदेश के इतिहास में पहली बार भाजपा-हिविंका गठबंधन की सरकार बना डाली और वीरभद्र सिंह के हाथ से सत्ता छीन ली.

2004 में लोकसभा चुनाव से पूर्व पं. सुखराम ने अपनी पार्टी का विलय कांग्रेस में कर दिया. इस बार रानी प्रतिभा सिंह मंडी संसदीय क्षेत्र से कांग्रेस की उम्मीदवार थी. पं. सुखराम के कांग्रेस में वापसी से कांग्रेस का यह गढ़ मजबूत हो गया और प्रतिभा सिंह ने महेश्वर सिंह को हराकर अपनी हार का बदला ले लिया. मगर जीत के एकदम बाद ही प्रतिभा सिंह ने अपनी जीत में पं. सुखराम के योगदान को नकार दिया. जिससे एक बार फिर दोनों सियासी परिवारों के बीच तनातनी का दौर शुरू हो गया.

आया राम गया राम

लगभग सवा वर्ष पहले कांग्रेस के मंच से वीरभद्र सिंह ने पं. सुखराम पर निशाना साधते हुए आया राम गया राम की बात कही तो पं. सुखराम के बेटे अनिल शर्मा समेत पूरे परिवार को कांग्रेस में घुटन महसूस होने लगी. विधानसभा चुनाव के दौरान अनिल शर्मा भाजपा में शामिल हो गए. जिसके सूत्रधार दोनों दादा पोता पं. सुखराम और आश्रय शर्मा रहे. मगर आश्रय को भाजपा का टिकट न मिलने पर पं. सुखराम अपने पोते के साथ कांग्रेस में आ गए हैं.

वहीं एक दूसरे के खिलाफ शब्दों के तीर छोड़ने वाले पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह और पूर्व केंद्रीय मंत्री पंडित सुखराम अब फिर से गले मिल लिए हैं. पंडित सुखराम और आश्रय शर्मा के कांग्रेस में शामिल होने के बाद शुक्रवार को पहली बार दिल्ली में दोनों नेताओं की मुलाकात हुई. पंडित सुखराम व आश्रय शर्मा दोनों दिल्ली में वीरभद्र सिंह के घर पर मिलने के लिए पहुंचे. इस दौरान दोनों नेताओं के बीच आधे घंटे तक चर्चा हुई. वीरभद्र सिंह ने इस अवसर पर पंडित सुखराम का कांग्रेस में आने का स्वागत किया. अब दोनों नेताओं की दिल्ली में मुलाकात कांग्रेस के लिए सकारात्मक संकेत माने जा रहे हैं.