हर साल 45 हजार भारतीय मां प्रसव के दौरान मर जाती हैं

भारत में हर साल डिलिवरी के समय 45 हजार महिलाएं दम तोड़ देती हैं.
प्रतीक चित्र

नई दिल्ली. जब पूरी दुनिया मदर्स डे मना रही थी उसी समय अकेले भारत में प्रसव के दरम्यान 100 से अधिक माताओं की मौत हो गई. उचित देख-रेख और चिकित्सकीय सुविधाएं से उनकी जान बचाई जा सकती थी. भारत में हर साल डिलिवरी के समय 45 हजार महिलाएं दम तोड़ देती हैं. दुनियाभर में प्रसव के दरम्यान होने वाली मौतों में अकेले भारत का योगदान 17 फीसदी है. विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) के मुताबिक भारत में प्रसव के समय आई दिक्कतों की वजह से हर घंटे पांच औरतों की मौत हो जाती है. इसकी सबसे बड़ी वजह अत्यधिक रक्तस्त्राव का होना है.

• विश्वभर में हर रोज 800 औरतें जच्चगी के दरम्यान मर जाती हैं.
• भारत में प्रसव के दौरान हुई गड़बड़ी की वजह से 45,000 महिलाओं की मौत हो जाती हैं.

आंकड़ों के मुताबिक असम, बिहार, मध्यप्रदेश, ओडिसा, राजस्थान और उत्तर प्रदेश में प्रसव के समय आई दिक्कतों की वजह से मरने वाले की संख्या सबसे अधिक है. प्रसव के दौरान हुई मौत की सबसे बड़ी वजह कुपोषण है. मानव फाउंडेशन के प्रमोद तिवारी कहते हैं, “गर्भधारण के छह माह के बाद कुपोषण की शुरुआत होती है जब बच्चे को अतिरिक्त पोषण की जरूरत होती है. उचित आहार नहीं मिल पाने की सूरत में मां का वजन कम होने लगता है और होने वाले बच्चे में निमोनिया और डायरिया जैसे इंफेक्शन के खतरे बढ़ जाते हैं.”

ये भी पढ़ें- विश्व स्वास्थ्य दिवस : हर साल चार करोड़ भारतीयों को गरीब बना देती है बीमारी

योजनाएं तो कई

गर्भवती महिलाओं और नवजात बच्चों के लिए सरकार की ओर से मुख्य रूप से तीन कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं; जननी सुरक्षा योजना(जेएसवाई), जननी सुरक्षा कार्यक्रम(जेएसएसके) और समेकित बाल विकास सेवाएं(आईसीडीएस). इन योजनाओं का लक्ष्य सुरक्षित प्रसव के साथ-साथ प्रसव पूर्व और उसके बाद जच्चे-बच्चे को मुफ्त चिकित्सकीय सेवा, पोषण और देखरेख प्रदान करना है. जननी सुरक्षा योजना के अंतर्गत माता और उसके बच्चे को मुफ्त चिकित्सकीय सुविधाएं और प्रोत्साहन राशि देने का प्रावधान है.

अपर्याप्त डॉक्टर और स्वास्थ्य कर्मी

सरकार की ओर से चलाई जा रही योजनाओं की वजह से मातृत्व मृत्यु दर (मैटेरनल मोर्टिलिटी रेट) में कमी आई है. 2013 में यह घटकर 167 हो गया है. हालांकि सबसे गरीब लोगों में सामान्य की तुलना ढ़ाई गुणा अधिक मौतें होती हैं.
तमाम प्रयासों के बावजूद स्थिति कई कमजोर देशों से भी नीचे हैं. सरकार की योजनाओं का पूरा लाभ लाभार्थियों तक नहीं पहुंच पाता है. भ्रष्टाचार और जानकारी का अभाव, अस्पतालों में आवश्यक सुविधाओं की कमी अपर्याप्त डॉक्टर और स्वास्थ्य कर्मी इसकी प्रमुख वजह हैं.

भारत में हर साल डिलिवरी के समय 45 हजार महिलाएं दम तोड़ देती हैं.
प्रतीक चित्र

सुमन देवी नौ बच्चों की मां हैं और 11वीं बार गर्भ से हैं

स्क्रॉल में छपे एक लेख में उत्तर प्रदेश के सलारपुर गांव की सुमन देवी के हालात से गर्भवती महिलाओं की खराब हालात का अंदाजा लगया जा सकता है. लेख के मुताबिक, “सुमन देवी नौ बच्चों की मां हैं और 11वीं बार गर्भ से हैं. इतने सालों में वह कभी भी आशा से नहीं मिलीं हैं. उन्होंने कभी कोई सप्लिमेंट नहीं लिया. गर्भावस्था के दरम्यान किसी डॉक्टर से सलाह नहीं लीं. उन्हें उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से चलाई जा रही मुफ्त एंबुलेंस सुविधा की जानकारी नहीं है. न हीं उनके पास मोबाइल है जिससे वह 108 नंबर पर फोन कर सकें.”

हर एक लाख में 167 महिलाओं की मौत

सलारपुर उत्तर प्रदेश के बहरैइच जिले का एक गांव है. उत्तर प्रदेश का बहरैइच और बलरामपुर जिले में सबसे खराब मातृत्व और शिशु मृत्यु दर है. भारत में प्रति एक लाख जच्चगी के दरम्यान 167 महिलाओं की मौत हो जाती है. वहीं वार्षिक स्वास्थ्य सर्वे 2012 के मुताबिक देवी पटन मंडल (बहरैइच और बलरामपुर जिला इसी प्रमंडल के अंतर्गत आते हैं) में मातृत्व मृत्यु दर प्रति लाख 366 है.

भारत में हर साल डिलिवरी के समय 45 हजार महिलाएं दम तोड़ देती हैं.

42 फीसदी भारतीय माताओं का वजन कम

प्रिंस्टन यूनिवर्सिटी के डाइने कॉफे ने जनगणना के आंकड़ों के विश्लेषण से पाया कि 42 फीसदी भारतीय माताएं कम वजन की हैं. जबकि सब सहारा अफ्रीका में यह आंकड़ा 16.5 फीसदी है. विश्लेषण बताता है कि कुपोषित बच्चों के मामले में डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो, जिम्बांबे या सोमालिया जैसे देशों से भी भारत पीछे है.

स्त्रोत : http:/ /the-death-of-a-mother/

सरकारी अस्पतालों में सुविधाओं के लिए अलग से पैसे की मांग की जाती है. नर्स और सफाई कर्मी प्रसव के बाद अलग से ‘कमीशन’ की मांग करते हैं. झारखंड के गोड्डा जिले की सुरुजमिनि मरांडी आदिवासी समुदाय से आती है. वह जब भी चेकअप के लिए अस्पताल पहुंची. उन्हें टॉयलेट जाने के लिए पैसे भरने पड़े. जब यह ‘शुल्क’ देने के लिए उनके पास पैसे नहीं बचे तबह उन्हें खुले में शौच जाने के लिए मजबूर होना पड़ा. himalmag.com पर छपी रिपोर्ट के मुताबिक मरांडी ने प्राइवेट दुकानों से दवाईयां खरीदी क्योंकि अस्पताल में दवाओं का स्टॉक खत्म हो चुका था. आखिर में एएनएम ने प्रसव करवाया. जबकि नियम के मुताबिक अस्पतालों में डिलिवरी के लिए अस्पताल में दो डॉक्टर का होना अनिवार्य है. अस्पताल छोड़ते समय मरांडी को 400 रुपये अलग से देने पड़े.

ये भी पढ़ें- वर्ल्ड लाफ्टर डे: घाटे का सौदा नहीं है हंसना, बस वर्चुअल दुनिया से बाहर तो निकलिये

योजनाओं का लाभ लाभार्थी तक पहुंचाने के लिए सरकार को स्वास्थ्य क्षेत्र में इंफ्रास्ट्रक्चर निर्माण करने की जरूरत है. कमजोर माता और कुपोषित बच्चों की बदौलत महाशक्ति बनने का सपना देखना बेमानी होगा.