किसानों के आए अच्छे दिन, अब बिना पैसे के कर सकते हैं खेती

किसानों के आए अच्छे दिन, अब बिना पैसे के कर सकते हैं खेती -Panchayat Times
साभार इंटरनेट

शिमला. मोदी 2.0 सरकार ने हाल ही में बजट पेश किया था 2019-20 का, उसमें कई अहम बदलाव भी हुए.इसके साथ ही ट्रेडिशन से हटकर कुछ प्रस्ताव भी लाए गए हैं. उन्हीं में से एक प्रस्ताव है ब्लू इकनोमी और दूसरा जीरो बजट खेती का,तो अब आप सोच रहे होंगे क्या होती है जीरो बजट खेती, इस लेख में हम आपको बताएंगें क्या होती है जीरो बजट खेती.

जीरो बजट प्राकृतिक खेती देसी गाय के गोबर एवं गौमूत्र पर आधारित है. एक देसी गाय के गोबर एवं गौमूत्र से एक किसान तीस एकड़ जमीन पर जीरो बजट खेती कर सकता है. देसी प्रजाति के गौवंश के गोबर एवं मूत्र से जीवामृत घनजीवामृत और जामन बीजामृत बनाया जाता है. इनका खेत में उपयोग करने से मिट्टी में पोषक तत्वों की वृद्धि के साथ-साथ जैविक गतिविधियों का विस्तार होता है. जीवामृत का महीने में एक और दो बार खेत में छिड़काव किया जा सकता है. जबकि बीजामृत का इस्तेमाल बीजों को उपचारित करने में किया जाता है.

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इस विधि से खेती करने वाले किसान को बाजार से किसी प्रकार की खाद और कीटनाशक रसायन खरीदने की जरूरत नहीं पड़ती है. फसलों की सिंचाई के लिए पानी एवं बिजली भी मौजूदा खेती-बाड़ी की तुलना में दस प्रतिशत ही खर्च होती है.

ऐसे करें खेती

गाय से प्राप्त सप्ताह भर के गोबर एवं गौमूत्र से निर्मित घोल का खेत में छिड़काव खाद का काम करता है और भूमि की उर्वरकता खराब भी नहीं होता है. इसके इस्तेमाल से एक ओर जहां गुणवत्तापूर्ण उपज होती है, वहीं दूसरी ओर उत्पादन लागत लगभग शून्य रहती है.

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प्राकृतिक खेती के सूत्रधार महाराष्ट्र के सुभाष पालेकर की मानें तो जैविक खेती के नाम पर जो लिखा और कहा जा रहा है, वह सही नहीं है. जैविक खेती रासायनिक खेती से भी खतरनाक है और विषैली और खर्चीली साबित हो रही है. उनका कहना है कि वैश्विक तापमान वृद्धि में रासायनिक खेती और जैविक खेती एक महत्वपूर्ण यौगिक है. वर्मीकम्पोस्ट का जिक्र करते हुए वह कहते हैं. यह विदेशों से आयातित विधि है और इसकी ओर सबसे पहले रासायनिक खेती करने वाले ही आकर्षित हुए हैं, क्योंकि वह यूरिया से जमीन के प्राकृतिक उपजाऊपन पर पड़ने वाले प्रभाव से वाकिफ हो चुके हैं.

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पर्यावरण पर असर

कृषि वैज्ञानिकों एवं इसके जानकारों के अनुसार फसल की बुवाई से पहले वर्मीकम्पोस्ट और गोबर खाद खेत में डाली जाती है और इसमें निहित 46 प्रतिशत उड़नशील कार्बन हमारे देश में पड़ने वाली 36 से 48 डिग्री सेल्सियस तापमान के दौरान खाद से मुक्त हो वायुमंडल में निकल जाता है. इसके अलावा नायट्रस, ऑक्साइड और मिथेन भी निकल जाती है और वायुमंडल में हरितगृह निर्माण में सहायक बनती है. हमारे देश में दिसम्बर से फरवरी केवल तीन महीने ही ऐसे है, जब तापमान उक्त खाद के उपयोग के लिये अनुकूल रहता है.

जीरो बजट खेती और जैविक खेती में अंतर 

जीरो बजट प्राकृतिक खेती जैविक खेती से भिन्न है और  ग्लोबल वार्मिंग और वायुमंडल में आने वाले बदलाव का मुकाबला एवं उसे रोकने में सक्षम है. इस तकनीक का इस्तेमाल करने वाला किसान कर्ज के झंझट से भी मुक्त रहता है. प्राप्त जानकारी के अनुसार अब तक देश में करीब 40 लाख किसान इस विधि से जुड़े हुए हैं.

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हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल आचार्य देवव्रत भी हिमाचल के किसानों को जीरो बजट खेती के लिए प्रोत्साहित किया है. राज्यपाल आचार्य देवव्रत ने कृषि गतिविधियों से जुड़े लोगों का शून्य लागत प्राकृतिक खेती के घटक तैयार करने के तौर-तरीकों को समझने की अपील की है ताकि इसे व्यवहारिक रूप दिया जा सके और अधिक से अधिक लोग इसे अपनाने को आगे आएं.