पेसा के जरिए मजबूत हो रही ग्राम सभा

इन राज्यों में नहीं है पंचायती राज व्यवस्था
प्रतीक चित्र

नई दिल्ली. पेसा एक्ट-1996 एक सरल लेकिन व्यापक और शक्तिशाली कानून है, जो अनुसूचित क्षेत्रों के गांवों को अपने क्षेत्र के संसाधनों और गतिविधियों पर अधिक नियंत्रण देने की शक्ति देता है. यह एक्ट ग्राम सभा को महत्वपूर्ण भूमिका प्रदान करता है और लोगों की परम्पराओं और रीति-रिवाजों, उनकी सांस्कृतिक पहचान, सामुदायिक संसाधनों का प्रबंधन और विवादों का निपटारा पारम्परिक रीति से करने के लिये सशक्त बनाता है.

पेसा अधिनियम अंतर्गत ग्रामसभा को जो अधिकार सौंपे गये हैं उनमें सामाजिक और आर्थिक विकास के कार्यक्रम और परियोजनाओं का अनुमोदन, विभिन्न योजनाओं के हितग्राहियों का चयन, निधियों के उपयोग का प्रमाणन करना, सामाजिक अंकेक्षण शामिल है.

पेसा एक्ट में विकास परियोजनाओं के लिये अनुसूचित क्षेत्रों में भूमि-अर्जन के पूर्व परामर्श तथा प्रभावित और विस्थापित व्यक्तियों के पुनर्वास के संबंध में परामर्श देना, गौण खनिजों के खनन पट्टों के संबंध में परामर्श, मद्य निषेध या किसी मादक द्रव्य के विक्रय और उपभोग को विनियमित या निर्बन्धित करना, गौण (लघु वनोपज का स्वामित्व) और अनुसूचित-जनजाति के किसी व्यक्ति अधिक्रमित भूमि या नियम विपरीत बेची गई भूमि वापस कराने का अधिकार पेसा एक्ट के तहत अनुसूचित क्षेत्र की ग्रामसभा को सौंपा गया है.

ग्रामसभा को ग्राम बाजारों का प्रबंधन, अनुसूचित-जनजातियों को धन उधार देने पर नियंत्रण, सभी सामाजिक सेक्टर की संस्थाओं और कार्यकर्ताओं पर नियंत्रण तथा स्थानीय योजनाओं और जन-जातीय उपयोजनाओं के स्रोतों पर नियंत्रण का अधिकार भी पेसा एक्ट में दिया गया है.

देश में पंचायती राज व्यवस्था के संबंध में संवैधानिक प्रावधान-

24 अप्रैल, 1993 से प्रभावी, संविधान (तिहत्तरवां संशोधन) अधिनियम, 1992, जो भारत के संविधान के नौंवे भाग में शामिल किया गया है, पंचायतों को ग्रामीण भारत के लिए स्थानीय स्व-शासन की संस्थाओं के रूप में एक संवैधानिक दर्जा देता है. संविधान का अनुच्छेद 243ड (1), अनुच्छेद 244 के खंड (1) और (2) में निर्दिष्ट अनुसूचित क्षेत्रों और जनजातीय क्षेत्रों में संविधान के नौवें भाग के प्रावधानों को लागू करने से छूट देता है. हालांकि, अनुच्छेद 243 ड (4) (ख) संसद को कानून बनाने और नौवें भाग के प्रावधानों को अनुच्छेद (1) में निर्दिष्ट अनुसूचित क्षेत्रों और जनजातीय क्षेत्रों में विस्तारित करने की शक्ति प्रदान करता है, बशर्ते कि ऐसे अपवादों और संशोधनों को ऐसे कानूनों में निर्दिष्ट किया गया हो और इस तरह का कोई भी कानून अनुच्छेद 368 के प्रयोजन के लिए संविधान का संशोधन नहीं माना जाएगा.

पांचवीं अनुसूची के क्षेत्र-

संविधान की पांचवीं अनुसूची किसी भी राज्‍य- असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम के अलावा अन्य राज्य में रहने वाले अनुसूचित जनजाति के रूप में भी प्रशासन और अनुसूचित क्षेत्रों के नियंत्रण के साथ संबंधित है. संविधान की पांचवीं अनुसूची अनुसूचित क्षेत्रों तथा असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम के अलावा अन्य किसी भी राज्य में रहने वाली अनुसूचित जनजातियों के प्रशासन और नियंत्रण से संबंधित है.

“पंचायतों के प्रावधान (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) अधिनियम, 1996” (पेसा), कुछ संशोधनों और अपवादों को छोड़कर संविधान के नौवें भाग को, संविधान के अनुच्छेद 244(1) के अंतर्गत अधिसूचित पांचवीं अनुसूची क्षेत्रों के लिए विस्तारित करता है। वर्तमान में, 10 राज्यों अर्थात् आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा, राजस्थान और तेलंगाना में पांचवीं अनुसूची क्षेत्र मौजूद हैं.

गांव और ग्राम सभा की परिभाषा-

पेसा अधिनियम के अंतर्गत, {अनुच्छेद 4 (ख)}, आमतौर पर एक बस्ती या बस्तियों के समूह या एक पुरवा या पुरवों के समूह को मिलाकर एक गांव का गठन होता है, जिसमें एक समुदाय के लोग रहते हैं और अपनी परंपराओं और रीति-रिवाजों के अनुसार अपने मामलों के प्रबंधन करते हैं. पेसा अधिनियम, {अनुच्छेद 4 (ग)} के अंतर्गत उन सभी व्यक्तियों को लेकर हर गांव में एक ग्राम सभा होगी, जिनके नाम ग्राम स्तर पर पंचायत के लिए मतदाता सूची में शामिल किए गए हैं.