यहां दहशत का नाम हाथी है

यहां दहशत का नाम हाथी है

रांची. झारखंड के हजारीबाग जिले के चलकुशा थाना क्षेत्र में मंगलवार को हाथियों का उत्पात देखने को मिला. यहां जनसोती में 18 हाथियों के झुंड ने दो लोगों को कुचलकर मार डाला और कई घरों को भी ध्वस्त कर दिया. हाथियों के इस हमले में मारे गए लोगों की पहचान पियारचन्द पासवान (55) और बसंत सिंह (56) के रूप में की गई. झारखंड में जंगली हाथियों के उत्पात की ऐसी घटनाएं हर रोज होती हैं.

स्थिति यह है कि झारखंड गठन के बाद अब तक हाथियों ने 1232 लोगों की जान ले ली. वन विभाग के आंकड़ों के अनुसार प्रति वर्ष औसतन 70 लोग हाथियों के गुस्से का शिकार हो रहे हैं. झारखंड में हाथियों के कहर से आजिज आकर झारखंड की रघुवर दास सरकार ने हाथियों द्वारा मारे जाने पर मृतक के परिजनों को 4 लाख रुपए के मुआवजे का प्रावधान भी किया है.

झारखंड में हाथियों के आतंक से गांव और किसान सबसे ज्यादा परेशान हैं. एक तरफ जहां भूख शांत करने जंगल से भटके गजराज जहां किसानों की फसल चट कर जा रहे हैं, वहीं गांव के लोगों के आशियाने को भी तहस-नहस कर रहे हैं. झारखंड वन विभाग के मुताबिक हाथियों के हमले के पीछे की मुख्य वजह हाथियों के लिए जंगलों में खाने-पीने की कमी है. जंगल कम होने से हाथी गांवों की ओर रूख कर रहे हैं. हाथियों को बांस और खैर आदि के पत्ते और टहनियां ज्यादा पसंद हैं. जंगलों मे अब ऐसे पेड़ कम ही बचे हैं. इसके अलावा लगातार बढ़ती गर्मी के कारण जलस्रोत सूख रहे हैं. इस वजह से जंगल में पहले आसानी से उपलब्ध पानी भी अब हमेशा उपलब्ध नहीं हो पाता. इस कारण हाथी आबादी की तरफ आ रहे हैं और ग्रामीणों को देखकर हिंसक हो जाते हैं.

पर्यावरणविद नीतीश प्रियदर्शी कहते हैं कि मानव-हाथी भिड़ंत का मुख्य कारण जंगलों का कम होना है. सौ साल पहले जहां घने जंगल ते, वहां अब घर बनने लगे हैं. पेड़ों की कटाई हो रही है और जगलों पर कब्जा करने की कोशिश. ऐसे में हाथियों को आबादी में आने से कोई नहीं रोक सकेगा.

उन्होंने बताया कि कुछ हाथियों को शराब की गंध भी भाती है. जैसे ही हड़िया (आदिवासियों द्वारा बनायी जाने वाली शराब) की गंध उनके नथुने में जाती है, वे खुद को नहीं रोक पाते और अगर हाथियों ने भूले से भी शराब पी ली तो उनके द्वारा पहुंचायी जाने वाली क्षति का आप पूर्वानुमान नही कर सकते. हाथियों का झुंड गांवों में भोजन तलाशने आता है. इस कारण पहले तो वे खेतों मे खड़ी फसल उखाड़ते हैं फिर घरों को तोड़कर अनाज खोजते हैं.

हाथियों से डर से पेड़ों पर भी रहने का मजबूर हैं यहां के लोग:

झारखंड की राजधानी रांची के पास हाथियों के उत्पात से कई परिवार पेड़ों पर रहने को भी मजबूर हैं. रांची-जमशेदपुर राष्ट्रीय राजमार्ग से यात्रा करने वाले लोगों के बीच भी हाथियों के झुंड ने डर पैदा किय हुआ है. हाथियों से डर का आलम यह है कि यह राजमार्ग आए दिन उस सयम वीरान हो जाता है जब हाथियों का झुड यहां से गुजरता है. रांची से 45 किलोमीटर दूर बुंडु गांव के लोहराटोला में रहने वाले कुछ परिवारों ने पेड़ों पर ही अपना ठिकाना बना लिया है. वे खुद को हाथियों से बचाने के लिए पेड़ों पर ही सोते हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि लोगों ने हाथियों के आने-जाने के रास्ते में घर बना लिया है इसी वजह से यह टकराव हो रहा है.

चल रही है हाथी परियोजना:

झारखंड में हाथियों के संरक्षण और उनके उचित प्रवास के लिए केंद्र सरकार के सहयोग से हाथी परियोजना चलाई जा रही है. इस परियोजना के तहत 15 जनवरी 2018 तक महज 10.655 लाख रुपये ही खर्च किए गए हैं. वन विभाग की खुद की रिपोर्ट इसकी पुष्टि कर रही है. वहीं, दिसंबर तक इसी विभाग के द्वारा हाथियों से हो रही क्षति के मुआवजे के मद में 6.99 करोड़ रुपये खर्च किए गए हैं. स्पष्ट है कि हाथियों के संरक्षण और उनके उचित प्रवास के 70 गुना राशि मुआवजे के मद में व्यय की गई है. यहां यह भी बता दें कि हाथी परियोजना के लिए इस वित्तीय वर्ष 2.60 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है.

झारखंड का राजकीय पशु है हाथी, लेकिन घट रही है संख्या:

झारखंड के राजकीय पशु हाथी की संख्या लगातार कम हो रही है. पिछले पांच साल में 133 हाथी कम हुए हैं. हाथियों की नवीनतम गिनती के बाद इसका खुलासा किया गया है. सिर्फ रांची, दुमका और हजारीबाग प्रमंडल में ही इनकी संख्या बढ़ी है. इसके अलावा पूरे राज्य में हाथियों की संख्या घटी है. साल 2017 में हुई गणना में राज्य में 555 में हाथी पाए गए, जबकि 2012 में हुई, गिनती के समय इनकी संख्या 688 थी. राज्य में हाथियों की संख्या लगातार कम हो रही है. वर्ष 2002 में हुए गिनती के समय इनकी कुल संख्या 772 थी. 2007 में गिनती के बाद संख्या घट कर 624 रह गई थी.

भारत में हाथी को ‘राष्ट्रीय धरोहर पशु’ का दर्जा है:

एक तरफ जहां हाथी और मनुष्यों में टकराव बढ़ रह है वहीं दूसरी तरफ हाथियों की संख्या भी घट रही है. ऐसे में हाथियों पर बनाई गई विशेष समिति की सिफारिश पर भारत सरकार ने 24 अक्टूबर 2010 को हाथी को राष्ट्रीय धरोहर घोषित किया था. समिति का मानना है कि हाथियों को विशेष दर्जा दिए जाने से उसके संरक्षण में मदद मिलेगी साथ ही इससे भारतीय परंपरा और संस्कृति में हाथियों को दिए गए विशेष स्थान को भी मान्यता मिलेगी. भारी निर्माण और शहरीकरण के कारण हाथियों के प्राकृतिक वास तेज़ी के साथ खत्म हो होते जा रहे हैं. ऐसे में हाथी अब जंगल से गांवों और शहरों की ओर रूख कर रहे हैं.