मौसम और बंदर बन रहे हिमाचल के दुश्मन

मौसम और बंदर बन रहे हिमाचल के दुश्मन

नई दिल्ली. जिस मौसम की बदौलत हिमाचल देश-विदेश के सैलानियों की पसंदीदा जगह बना और यहां के सेब ने अपनी जगह बनाई, वही मौसम अब हिमाचल का दुश्मन बन रहा है. हिमाचल में बेमौसम बारिश, घटती बर्फबारी और बढ़ते तापमान से जहां सेब के बागानों पर असर पड़ रहा, वहीं बंदरों के आतंक से यहां की बागवानी और कृषि पर संकट मंडारने लगा है. हिमाचल के किसान और बागवान दोतरफा मार झेल रहे हैं. आहिस्ता-आहिस्ता बढ़ती हुई ग्लोबल वार्मिंग ने हिमाचल की जलवायु बदलना शुरू कर दी है.

हिमाचल का मुख्य व्यवसाय कृषि और बागवानी है. यहां के लगभग 9.14 लाख लोग किसान हैं. राज्य में कृषि भूमि केवल 10.4 प्रतिशत है इस पर भी 80 प्रतिशत भूमि वर्षाजल पर निर्भर है. जलवायु और परिस्थितियां यहां काफी अनुकूल रही हैं, इसलिए फल का उत्पादन करने वाले बागवानों को काफी मदद मिलती रही है. अब तक सेब, नाशपाती, आड़ू, खुबानी, नींबू,आम, लीची, अमरूद और झरबेरी का उत्पादन लगभग एक बड़े फल उद्योग में विकसित हो गया है.

कृषि और बागवानी यहां की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. यही नहीं, इससे 69 प्रतिशत कामकाजी आबादी को सीधे रोजगार मिलता है. सिर्फ सेब की बागवानी से ही 1.7 लाख परिवारों की आजीविका चलती है. ट्रांसपोर्टर, कार्टन निर्माता, कोल्डस्टोरेज, थोक मूल्य फल विक्रेता और फल प्रसंस्करण इकाइयों से जुड़े हजारों लोगों की रोजीरोटी इससे चलती है.

2030 तक प्रदेश में सेब का उत्पादन 4 फीसदी घट जाएगा : 

मौसम में हो रहे बदलाव और जलवायु परिवर्तन से से सबसे ज्यादा खतरा सेब पर है. माना जा रहा है कि अधिक गर्मी से सेब के पौधे तेजी से सूख जाएंगे. फलों का स्वाद भी खट्टा या फीका हो जाएगा. अगर ऐसा हुआ तो 4.500 करोड़ की सेब बागवानी प्रभावित होगी. वैसे भी अनुमान लगाया जा रहा है कि मौसम के बदलाव के चलते प्रदेश में 2030 तक सेब का उत्पादन चार फीसदी घट जाएगा.

दिसंबर और जनवरी में बर्फबारी न होने से सेब के लिए जो भी चिलिंग ऑवर्स हैं वे पूरे नहीं हो पा रहे हैं. इससे निचली सेब बेल्ट के बागबानों की फसल खराब हो सकती है. कम से कम अलग-अलग किस्मों के सेब के पेड़ों को 7 डिग्री सेल्सियस से भी कम तापमान में 800 से 1800 घंटे तक रहना जरूरी होता है. हिमाचल में सेब का सालाना करोबार लगभग 3200 करोड़ का होता है. ये सेब शिमला, सिरमौर, कुल्लू, किन्नौर, मंडी और चंबा जिले में होते हैं.

प्रदेश के 5000 से कम ऊंचाई वाले इलाकों में सेब लगने की संभावनाएं पहले ही लगभग खत्म हो गई है. दूसरी तरफ अच्छी फ्लावरिंग के लिए मौसम साफ और तापमान 14 डिग्री से 24 डिग्री तक होना चाहिए, पर ओला वृष्टि और तेज हवाओं से फूल झड़ जाते हैं और ये दोनों ही परेशानियां नियमित हो गई हैं। इकोनॉमिक सर्वे की रिपोर्ट के अनुसार 2017-18 में प्रदेश में सेब का उत्पादन कम हुआ है. नतीजा यह हुआ है कि इस समय बागवान बढ़ते तापमान और अनियमित बर्फबारी के कारण सेब छोड़कर, कीवी, अनार और सब्जियां उगाने लगे हैं.

जंगली जानवरों से हर साल हो रहा 2000 करोड़ रुपए का नुकसान : 

हिमाचल में जंगली जानवरों के कारण प्रदेश में हर साल 2000 करोड़ रुपए का नुकसान हो रहा है. जिसमें 600 करोड़ रूपए से अधिक का नुकसान जंगली जानवरों द्वारा सीधे कृषि और बागवानी को पहुंचाया जा रहा है. काफी बागवान और किसान, खेती-बागवानी से तौबा कर चुके हैं और लगभग 75 हजार हेक्टेयर कृषिभूमि बंजर पड़ी हुई है. भले ही हिमाचल की 75 फीसदी आबादी खेती से जुड़ी है, पर आज यहां के किसान खेती से भाग रहे हैं.

बंदरों से खेती को हो रहा बड़ा नुकसान : 

हिमाचल के किसान और बागवान बंदरों के आतंक से भी पीड़ित हैं. मौजूदा हालात ये हैं कि इस समय हिमाचल की 2301 पंचायतें बंदरों से प्रभावित हैं. यहां पर बंदर मक्का, अदरक, आलू और मौसमी सब्जियों को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचा रहे हैं. आलू-प्याज, शलगम जैसी सब्जियां और अरबी भी खोद कर खा जा रहे हैं. इसके अलावा नीलगाय, सुअर और खरगोश भी फसलें तबाह कर रहे