ग्लोबल वार्मिंग की चपेट में हिमाचल प्रदेश, इस साल हुई है भारी तबाही

ग्लोबल वार्मिंग की चपेट में हिमाचल प्रदेश, इस साल हुई है भारी तबाही

नई दिल्ली. इस साल हिमाचल में बरसात ने कहर बरसाया है. प्रदेश में भारी बरसात से हां दर्जनों लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी हैं वहीं सड़कों, पुलों, पेयजल योजनाओं, मकानों, स्कूल भवनों, पेड़ पौधों और फसलों को भी भारी नुकसान हुआ है. सरकार की तरफ से जारी की गई सूचना के अनुसार हिमाचल को इस सीजन में भारी वर्षा, बाढ़ और बादल फटने की घटनाओं से 1217.29 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है. इस प्राकृतिक त्रासदी के लिए पर्यावरणविदों ने हिमाचल प्रदेश में चल रही जल-विघुत परियोजनाओं और जगह-जगह कार्बन उगल रही सीमेंट फैक्ट्रियों को जिम्मेदार बताया है.

पर्यावरणविदों ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि हिमाचल प्रदेश में बड़ी संख्या में चल रहे सीमेंट प्लांट के कारण यहां का तापमान बढ़ रहा है. जिसमें नतीजे में मौसम परिवर्तन के साथ प्रदेश में बर्फबारी का पैटर्न भी बदल गया है. यहां पर पहले दिसंबर से फरवरी तक सर्दियों को पीक सीजन रहता था लेकिन इसमें बदलाव दर्ज किया गया है. अब प्रदेश में बर्फ दिसंबर में नहीं मार्च में होती है. सर्दी के मौसम में भी 3.8 प्रतिशत तक की गिरावट दर्ज की गई है. वर्ष 2010 से वर्ष 2016 तक के मुकाबले पिछले वर्ष सर्दियों के मौसम में ठंड ने लोगों को कम ही अपना एहसास दिलाया है. ठंड में 3.8 प्रतिशत की कम दर्ज हुई है.

नदियों पर मंडरा रहा संकट

वैज्ञानिकों का दावा इस बात की तस्दीक कर रहा है कि ग्लोबल वार्मिंग हिमालयी क्षेत्र के ग्लेशियरों को अपनी जद में ले रहा है. हाल ही में ग्लेशियर मैपिंग के दौरान चौंकाने वाले तथ्य सामने आये हैं. हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियर पिघलने का सिलसिला जारी है. अगर इसपर समय रहते ध्यान नहीं दिया गया तो उसके परिणाम आगे चलकर घातक होने वाले हैं, जो यहाँ की प्रमुख नदियों का वजूद कभी भी समाप्त कर सकता हैं.

जानकारी के अनुसार प्रदेश के चेनाब, पार्वती, बास्पा पर आधारित ग्लेशियरों की मैंपिग के दौरान कुछ ऐसे आश्चर्यजनक पहलू सामने आये हैं. जिसमें वर्ष 1962 तक इन तीनों बेसिन पर ग्लेशियरों का आकार 2077 वर्ग किलोमीटर तक का था जो अब घटकर 1628 वर्ग किलोमीटर रह गया है. सीधे तौर पर कहें, तो ग्लेशियर के आकार में 21 फीसदी की कमी आई है.

अध्ययन में यह बात भी भयावह है कि सतलुज बेसिन पर तीन ग्लेशियर काफी ज्यादा खिसके हैं. यह बेसिन बिजली परियोजना के चलाने में अपनी अहम भूमिका निभाते चले आ रहे हैं. अध्ययन में पता चला है कि चेनाब में 6, ब्यास में 5 और रावी में 2 ग्लेशियर अपनी जगह से छिटक गए हैं. दूसरी तरफ छोटा शिगरी ग्लेशियर ने भी अपना मूल स्थान खो दिया है.

जलवायु परिवर्तन के कारण जहां दुनिया भर के ग्लेशियरों का पिघलना जारी है,हिमाचल के ग्लेशियर भी इससे अछूते नहीं हैं क्योंकि ग्लोबल वार्मिंग की वजह से तापमान में लगातार बढ़ोतरी हो रही है, जिस कारण जहां तापमान तप रहा है, वहीं इसका सीधा असर ग्लेशियरों पर पड़ रहा है. दुनिया के सभी शोधकर्ताओं से पता चला है कि हिमालय में स्थित सभी ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं जिसका खुलासा लाहौल-स्पीति के वयोवृद्ध साहित्यकार छेरिंग दोरजे ने अपने एक शोध में भी किया है.

ग्लोबल वार्मिंग के कारण दुनिया भर में पर्यावरण को नुक्सान पहुंच रहा है. ग्लोबल वार्मिंग से पिघल रहे ग्लेशियरों की वजह से आने वाले दिनों में पानी की कमी होगी जिसके कारण ग्लेशियर वाले स्थान रेगिस्तान में बदलने शुरू हो जाएंगे. लाहौल-स्पीति के 75 वर्षीय छेरिंग दोरजे ग्लेशियरों पर बनने वाली झीलों पर शोध कर रहे हैं. अभी तक हुए शोध से यह पता चला है कि ये ग्लेशियरों के पिघलने के लिए 5वां पीरियड चला हुआ है, जिसके कारण ग्लेशियर पिघल रहे हैं.

हिमाचल के कुल्लू व लाहौल-स्पीति जिला में करीब 180 छोटे-बड़े ग्लेशियर हैं. इनमें से 80 ग्लेशियरों पर छोटी झीलें बन गई हैं. धरती, वायु व जल का जब तापमान बढ़ जाए तो कार्बन डाईआक्साइड की मात्रा बढ़ जाती है. जो ग्लेशियर को पिछला देती है. ग्लोबल वार्मिंग का मुख्य कारण वाहनों की अधिक आवाजाही से बढ़ता प्रदूषण व कारखानों से निकलने वाले धुएं से पर्यावरण का दूषित होना है. इससे ग्लेशियर प्रभावित होते हैं. ग्लोबल वार्मिंग से जब ग्लेशियर पीछे की ओर हटने लगता है तो झील बनने लगती है. लोगों को आशंका रहती है कि ये झीलें कभी भी टूट कर आबादी वाले क्षेत्र में कहर बरपा सकती हैं. इस बार मानसून में हिमाचल में यही हुआ है.

हिमाचल में भारी बर्फबारी से जीवन अस्त-व्यस्त

घट रही है स्नो लाइन

ग्लोबल वार्मिंग के कारण यहां पर स्नो लाइन की बढ़ोतरी लगातार कम होती जा रही है. एक साल की अवधि के अंदर प्रदेश के स्नो लाइन में पिछले छह साल के मुकाबले 35 फीसदी की कमी आई है. हिमाचल विज्ञान, प्रौद्योगिकी एवं पर्यावरण परिषद ने वर्ष 2017-18 में प्रदेश में हिम आवरण का मूल्यांकन किया. इसमें चौंकाने वाले तथ्य सामने आए है. प्रदेश में वर्ष 2010 से लेकर 2016 की अवधि के दौरान किए गए मूल्यांकन की तुलना में वर्ष 2017-18 में स्नो लाइन तेजी से घटी है.

यह मूल्यांकन चिनाब, रवि, सतलुज और ब्यास बेसिन में किया गया. इसमें पिछले वर्ष की सर्दियों के दौरान स्नो लाइन के तहत कुल क्षेत्र में कमी दर्ज की गई है. प्रदेश में तेजी से घटते स्नो लाइन के कारण पानी और सिंचाई की योजनाओं पर खतरा मंडराने लग पड़ा है. इन नदियों पर बने पावर प्रोजेक्टों पर भी संकट पैदा हो गया है.