परंपरा, संस्कृति और जायके का अनूठा संगम है हिमाचली धाम

हिमाचली धाम परंपरा, संस्कृति और जायके का अनूठा संगम है हिमाचली धाम

नई दिल्ली. हिमाचल प्रदेश में खाना पकाने और खिलाने की अनूठी परंपरा है जो सदियों से चली आ रही है और इसमें कोई बदलाव नहीं हुआ है. यह है कुछ खास अवसरों और महोत्सवों के दौरान बनने वाले खाने, जिन्हें हिमाचली धाम कहा जाता है. धाम में जो व्यंजन होते हैं उसको देखते ही मुंह में पानी आ जाता है.

धाम को बनाने वाले कुछ परंपरागत लोग होते हैं, जिन्हें हिमाचल की स्थानीय भाषा में बोटी कहा जाता है. धाम को तैयार करने के लिए तैयारी रात से ही शुरू कर दी जाती है. हिमाचली धाम में तांबे के बर्तनो का प्रयोग किया जाता है. धाम खाने के लिए लोग ज़मीन पर बैठते हैं और भोजन पारंपरिक तरीके से पत्तों की थाली मैं परोसा जाता है जिन्हे पतलू कहते हैं.

हिमाचली धाम हिमाचल प्रदेश के हर क्षेत्र में अलग-अलग तरह की होती है. हिमाचली धाम में अक्सर खुशबूदार चावल, कई प्रकार की दालें, मदरा, खट्टा, मीठा भात परोसा जाता है. हिमाचली धाम हिमाचल प्रदेश मैं बहुत प्रचलित है और मुख्यतः शादी व्याह और धार्मिक दिनों में काफी बनाया जाती है.

हिमाचली धाम में विशेष महोत्सव मैं खास व्यंजन पकाये जाते हैं. हिमाचली धाम अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग बनाई जाती है. कांगड़ा की धाम को सबसे बेहतर धाम में गिना जाता है. वहीं कुल्लू की धाम को पारंपरिक तौर पर सबसे पुरानी धाम में गिना जाता है. धाम का मुख्य आकर्षण है सभी मेहमानों को समान रूप से जमीन पर बिछी पंगत पर एक साथ बैठाकर खाना खिलाना. खाना आमतौर पर पत्तल पर ही परोसा जाता है. हिमाचली खाना बनाने, परोसने व खाने की सैकड़ों वर्ष पुरानी परंपरा है.

शिमला की धाम : हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला की धाम में मुख्यतः उड़द माह की दाल, चने की दाल, मदरा,स्पेशल सब्जी के रूप में दही में बनाए सफेद चने, आलू, जिमीकंद, पनीर, माहनी ,खट्टा में काला चना या पकौड़े, मीठे में बदाणा या छोटे गुलाब जामुन. मीठे के बाद और मिठाई भी परोसी जाती है. इस धाम का आनंद खुले आसमान के निचे लिया जाता है.

कांगड़ा की धाम : कांगड़ा की धाम की यह धाम भी बहुत लोकप्रिय है. हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा ज़िले की धाम को सबसे बेहतर धाम में गिना जाता है. कांगड़ा धाम में मुख्य रूप से चने की दाल, माह उड़द ,साबुत, मदरा ,दही चना, खट्टा, चने अमचूर, पनीर मटर, राजमा, सब्जी में जिमीकंद, कचालू, अरबी, मीठे में ज्यादातर बेसन की रेडीमेड बूंदी, बदाणा या रंगीन चावल भी परोसे जाते हैं. कांगड़ा धाम में चावल के साथ पूरी भी परोसी जाती है.

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चंबा की धाम : चंबा की धाम में मुख्यतः ये व्यंजन पकते है, यहां चावल, मूंग साबुत, मदरा, माह, कढ़ी, मीठे चावल, खट्टा और मोटी सेवेइयां खाने का हिस्सा हैं. चंबा धाम में मदरा खाना बनाने वाली टीम का मुखिया डालता है.

बिलासपुर की धाम : जिला बिलासपुर क्षेत्र की धाम में उड़द की धुली दाल, उड़द, काले चने खट्टे, तरी वाले फ्राई आलू या पालक में बने कचालू, रौंगी ,लोबिया, मीठा बदाणा या कद्दू या घिया के मीठे का नियमित प्रचलन है. कुछ जगहों र खाने में सादे चावल की जगह बासमती, मटर पनीर व सलाद भी खिलाना शुरू किया गया है.

हमीरपुर की धाम : हमीरपुर की धाम में मुख्य रूप से ज्यादातर दालें ही बनती हैं. इस धाम में दालें ज्यादा परोसी जाती हैं. यहां पर राजमा या आलू का मदरा, चने का खट्टा व कढ़ी प्रचलित है. मीठे में यहां पेठा ज्यादा पसंद किया जाता है मगर बदाणा व कद्दू का मीठा भी बनता है.

ऊना की धाम : यहां की धाम में चावल, दाल चना, राजमा, दाल माश खिलाए जाते हैं. यहां सलूणा ,कढ़ीनुमा खाद्य इसे बलदा भी कहते हैं खास लोकप्रिय है. हिमाचली इलाका ऊना कभी पंजाब से हिमाचल आया था तो यहां पंजाबी खाने-पीने का अधिक असर है. यहां पतलों के साथ दोने भी दिए जाते हैं विशेषकर शक्कर या बूरा परोसने के लिए.

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कुल्लू की धाम : कुल्लू की धाम को पारंपरिक तौर पर सबसे पुरानी धाम में गिना जाता है. यह धाम सबसे पुरानी धाम है जो आज भी प्रचलित है. जिला कुल्लू का खाना मंडीनुमा है. यहां मीठा ,बदाणा या कद्दू, आलू या कचालू खट्टे, दाल राजमा, उड़द या उड़द की धुली दाल, लोबिया, सेपू बड़ी, लंबे पकौड़ों वाली कढ़ी व आखिर में मीठे चावल खिलाए जाते हैं.

मंडी की धाम : मंडी जिसे छोटी काशी भी कहते हैं. मंडी क्षेत्र के खाने की खासियत है सेपू बड़ी जो बड़ी मेहनत से बनती है और यह बड़े चाव से खाई जाती है. मंडी धाम में मीठा ,मूंगदाल या कद्दू का छोटे गुलाब जामुन, मटर पनीर, राजमा, काले चने ,खट्टे, खट्टी रौंगी, लोबिया व आलू का मदरा ,दही लगा व झोल, पकौड़े, पतली कढ़ी खाया व खिलाया जाता है.

लाहौल-स्पीति की धाम : लाहौल-स्पीति की धाम में तीन बार मुख्य खाना दिया जाता है. चावल, दाल चना, राजमा, सफेद चना, गोभी आलू मटर की सब्जी, सादा रोटी या पूरी भटूरे और एक समय भेड़ का मीट या कभी फ्रायड मीट दिया जाता है. परोसने के लिए कांसे की थाली, शीशे या स्टील का गिलास व तरल खाद्य के लिए तीन तरह के प्याले इस्तेमाल होते हैं. नमकीन चाय, सादी चाय व सूप तीनों के लिए अलग से.

सोलन की धाम : सोलन ज़िले की धाम में मुख्य रूप से बाघल ,अर्की तक बिलासपुरी धाम का रिवाज है. सोलन धाम में हलवा-पूरी, पटांडे खूब खाए व खिलाए जाते हैं. सब्जियों में आलू-गोभी या मौसमी सब्जी होती है. मिक्स दाल और चावल आदि भी परोसे जाते हैं.

सिरमौर की धाम : जिला सिरमौर की धाम में ग्रामीण इलाकों में चावल, माह की दाल, पूड़े, जलेबी, हलवा या फिर शक्कर दी जाती है. पटांडे, अस्कलियां, सिडो सिरमौर के लोकप्रिय व्यंजन हैं. लड़के की शादी में बकरे का मीट भी लाजमी है.

किन्नौर की धाम : हिमाचल में सबसे अलग धाम किन्नौर की मानी जाती है क्योंकि यहां पर कई सालों से मांसाहारी भोजन भी धाम में परोसा जाता है. किन्नौर की दावत में शराब व मांस का होना हर उत्सव में लाजिमी है. किन्नौर की धाम में बकरा कटता ही है. खाने में चावल, पूरी, हलवा, सब्जी जो उपलब्ध हो बनाई जाती है.

बदल रही है धाम खाने की परंपरा :
किसी जमाने में बोटी पूरा अनुशासन बनाए रखते थे और खाना-पीना बांटने का सारा काम बोटी ही करते थे. एक पंगत से उठ कर दूसरी पंगत में बैठ नहीं सकते थे. खाने का सत्र पूरा होने से पहले उठ नहीं सकते थे. मगर जीवन की हड़बड़ाहट व अनुशासन की कमी ने बदलाव लाया है.