परम पावन दलाई लामा बोले, अब मुझे आराम चाहिए

परम पावन दलाई लामा बोले, अब मुझे आराम चाहिए

दिल्ली/धर्मशाला. यूरोपीय देशों की 17 दिवसीय यात्रा करने के बाद परम पावन चौदहवें दलाई लामा हिमाचल लौटें हैं लेकिन उन्होंने अपने शुभचिंतकों से कहा है कि अब मैं थक गया हूं और अब मुझे आराम करना चाहिए. उनकी इस बात से उनने समर्थक भावुक हो गए हैं. दलाई लामा लगभग एक साल बाद इसी सितंबर में अपने किसी विदेशी दौरे पर गए थे.

उन्होंने यूरोप के चार देशों जर्मनी, स्वीडन, नीदरलैंड और स्विट्जरलैंड का दौरा किया. दलाई लामा ने हिमाचल पहुंचकर कहा, ”मैं थक गया हूं और लगता है कि अब इस बूढ़े इनसान को आराम करना चाहिए. धर्मगुरु महामहिम दलाई लामा के कथन से गहरे अर्थ निकाले जा रहे हैं. पूरी दुनिया में अध्यात्म, शांति और आजाद तिब्बत के आंदोलन की निशानी बन चुके दलाई लामा का आकर्षण पूरी दुनिया में हैं. भारत और खासकर हिमाचल के कांगड़ा जिले का धर्मशाला तो उनका घर ही है.

यूरोपीय यात्रा के दौरान स्विट्जरलैंड के ज़्यूरिख में छोटे तिब्बती बच्चों को अभिनंदन करते दलाई लामा

पूरी दुनिया में शांति के दूत हैं दलाई लामा

दलाई लामा वेबसाइट के अनुसार परम पावन चौदहवें दलाई लामा तेनज़िन ग्यात्सो २९ मई २०११ तक तिब्बत के राजकीय प्रमुख रहे औरउसके बाद उन्होंने अपनी सारी राजनीतिक शक्तियाँ तथा उत्तरदायित्व प्रजातांत्रिक तरीके से चुने हुए तिब्बती नेतृत्व को हस्तांतरित किए. अब वे केवल तिब्बत के सर्वोच्च आध्यात्मिक गुरु हैं. उनका जन्म 6 जुलाई 1934 को उत्तरी तिब्बत में आमदो के एक छोटे गाँव तकछेर में एक किसान परिवार में हुआ था. दो वर्ष की आयु में ल्हामो दोंडुब नाम का वह बालक तेरहवें दलाई लामा थुबतेन ग्यात्सो के अवतार के रूप में पहचाना गया. ऐसा विश्वास है कि दलाई लामा अवलोकितेश्वर या चेनेरेज़िग का रूप हैं जो कि करुणा के बोधिसत्त्व तथा तिब्बत के संरक्षक संत हैं. बोधिसत्त्व प्रबुद्ध सत्त्व हैं जिन्होंने अपना निर्वाण स्थगित कर मानवता की सेवा के लिए पुनः जन्म लेने का निश्चय लिया है.

दलाई लामा की मठीय शिक्षा छह वर्ष की आयु में प्रारंभ हुई. उनके पाठ्यक्रम में पाँच महाविद्या तथा पाँच लघु विद्या थे. महाविद्या थे प्रमाण विद्या, शिल्प विद्या, शब्द विद्या, चिकित्सा विद्या तथा आध्यात्मिक विद्या, जो अन्य पाँच वर्गों में विभक्त थाः प्रज्ञापारमिता, माध्यमिक, विनय, अभिधर्म और प्रमाण. पाँच लघु विद्या थे काव्य, नाटक, ज्योतिष, छन्द तथा अभिधान. सन् 1949 में 23 वर्ष की आयु में वे ल्हासा के जोखंग मंदिर में मोनलम (प्रार्थना) उत्सव के समय अपनी अंतिम परीक्षा में बैठे. उन्होंने अपनी परीक्षा में बड़े ही सम्मान के साथ सफलता प्राप्त की और उन्हें गेशे ल्हारम्पा की उपाधि जो कि उच्चतम उपाधि है और बौद्ध दर्शन में डॉक्टर के समकक्ष है, से सम्मानित किया गया.

हिमाचल के धर्मशाला से चलती है निर्वासित तिब्बती सरकार

चीन की ओर से 1949 में तिब्बत पर आक्रमण के बाद 1950 में दलाई लामा से पूरी राजनैतिक सत्ता संभालने का आग्रह किया गया. 1954 में वे माओ च़े तुंग और अन्य चीनी नेताओं जिनमें देंग ज़ियोपिंग और चाउ एन लाइ भी शामिल थे, के साथ शांति वार्ता के लिए बीजिंग गए. पर अंततः 1959 में चीनी सेना द्वारा ल्हासा के तिब्बती राष्ट्रीय संघर्ष को बड़ी क्रूरता से कुचले जाने के कारण परम पावन को शरण लेने के लिए बाध्य होना पड़ा. तबसे वे उत्तरी भारत के धर्मशाला में निवास करते हैं जो कि निर्वासित तिब्बती राजनैतिक प्रशासन का केन्द्र है. चीनी आक्रमण के बाद दलाई लामा ने तिब्बत के प्रश्न पर संयुक्त राष्ट्र संघ से अपील की है. संयुक्त राष्ट्र संघ ने तिब्बत पर 1959, 1969 और 1965 में तीन प्रस्ताव पारित किए.

यूरोपीय यात्रा के दौरान ज़्यूरिख में प्रवचन देते दलाई लामा

तिब्बती प्रशासनिक व्यवस्था को बनाया जनतांत्रिक

1963 में दलाई लामा ने तिब्बत के प्रजातंत्रीय संविधान का एक प्रारूप प्रस्तुत किया जिसके बाद तिब्बती प्रशासनिक व्यवस्था को प्रजातांत्रिक बनाने के लिए कई संशोधन हुए. इस सुधार के फलस्वरूप जो नया प्रजातंत्रीय संविधान घोषित हुआ वह शरणार्थी तिब्बतियों के संविधान के नाम से जाना जाता है. इस संविधान में अभिव्यक्ति, विश्वास, सभा और घूमने फिरने की स्वतंत्रता प्रतिष्ठापित है. इसमें जो शरणार्थी के रूप में रह रहे हैं उनके प्रति भी तिब्बती प्रशासन के प्रकार्यों के लिए दिशा निर्देश दिए गए हैं.

1992 में दलाई लामा ने भविष्य के स्वतंत्र तिब्बत के संविधान के दिशा निर्देश प्रकाशित किए. उन्होंने घोषणा की कि जब तिब्बत स्वतंत्र होगा तो तात्कालिक कार्य एक अंतरिम सरकार की स्थापना करना होगा जिसका पहला कार्य एक संवैधानिक सभा का चुनाव होगा जो तिब्बत की प्रजातंत्र संविधान की रूप रेखा बनाकर उसे स्वीकार करेगी. उस दिन दलाई लामा अपने सभी ऐतिहासिक और राजनैतिक सत्ता अंतरिम राष्ट्रपति को सौंप देंगे और एक साधारण नागरिक की तरह जीवन व्यतीत करेंगे. दलाई लामा ने यह भी कहा कि तिब्बत जो कि उच़ंग, आमदो और खम तीन पारम्परिक प्रदेशों से बना है वह संघीय और प्रजातान्त्रिक होगा.

दलाई लामा ने जो सुधार सुझाए गए थे वह तिब्बती समुदाय के लिए एक सच्चे शरणार्थी प्रजातंत्रीय प्रशासन के रूप में साकार हुए. तिब्बती मंत्री परिषद् (कशाग) जिसकी नियुक्ति उस समय तक दलाई लामा किया करते थे, उसे शरणार्थी तिब्बती संसद के साथ भंग कर दिया गया. उसी वर्ष भारतीय उपमहाद्वीप और 33 से अधिक देशों के शरणार्थी तिब्बतियों ने विस्तृत ग्यारहवीं तिब्बती संसद के लिए एक व्यक्ति एक वोट के आधार पर 46 सदस्यों का चुनाव किया. संसद ने अपनी ओर से मंत्रिमंडल के नए सदस्यों का चुनाव किया. सितंबर 2001 में प्रजातंत्रीकरण की ओर एक बड़ा कदम उठाया गया, जब निर्वाचकों ने मंत्रिमंडल के सबसे वरिष्ठ कलोन ठिपा का सीधा चुनाव किया. इसके बाद कलोन ठिपा ने अपने मंत्रिमंडल की नियुक्ति की जिनके लिए तिब्बती संसद की स्वीकृति प्राप्त करना आवश्यक है. तिब्बत के लंबे इतिहास में, यह पहला अवसर था जब लोगों ने तिब्बत के राजनैतिक नेतृत्व को पहली बार चुना.

शांति का मिल चुका है नोबेल पुरस्कार

दलाई लामा शांति प्रिय व्यक्ति हैं. 1989 में तिब्बत को स्वतंत्र कराने में उनके अहिंसात्मक संघर्ष के लिए उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया. अत्यधिक आक्रात्मक स्थितियो में भी वे निरंतर अहिंसात्मक नीतियों का समर्थन करते रहे हैं. वे पहले नोबेल विजेता हुए हैं जिन्होंने वैश्विक पर्यावरण की समस्याओं के प्रति अपनी चिंता जताई. दलाई लामा शांति, अहिंसा, अंतर्धर्मीय समझ, सार्वभौमिक उत्तरदायित्व और करुणा के संदेश को देखते हुए दलाई लामा को 84 से भी अधिक सम्मान, सम्माननीय डॉक्टरेट, पुरस्कार इत्यादि मिल चुके हैं. दलाई लामा ने 72 से भी अधिक पुस्तकें लिखी हैं. परम पावन स्वयं को एक साधारण बौद्ध भिक्षु कहकर संबोधित करते हैं.

29 मई 2010 को दलाई लामा ने राजनीति से लिया सन्यास

14 मार्च 2010 को दलाई लामा ने तिब्बती जनप्रतिनिधि सभा (निर्वासन में तिब्बती संसद) के संसद को पत्र लिख कर तिब्बतियों के निर्वासन के चार्टर के अनुसार अपने तात्कालिक अधिकार से उन्हें मुक्त करने का अनुरोध किया, क्योंकि तकनीकी रूप से वे अभी भी राज्य प्रमुख थे. उन्होंने घोषणा की कि वह उन परम्पराओं को समाप्त कर रहे थे जिसके अनुसार दलाई लामा ने तिब्बत में आध्यात्मिक और राजनैतिक अधिकार का प्रयोग किया था.

उन्होंने स्पष्ट किया कि उनका उद्देश्य था कि वे मात्र आध्यात्मिक विषयों से संबंध रखते हुए पहले चार दलाई लामा की स्थिति को पुनः प्रारंभ करें. उन्होंने पुष्टि की कि लोकतांत्रिक ढंग से निर्वाचित नेतृत्व तिब्बती राजनीतिक मामलों के प्रति सम्पूर्ण औपचारिक उत्तरदायित्व ग्रहण करेगा. अब से गदेन फोडंग, दलाई लामा का आधिकारिक कार्यालय और आवास, उस कार्य को पूरा करेगा.

29 मई 2010 को दलाई लामा ने औपचारिक रूप से दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर किए और अपना राजनैतिक उत्तरदायित्व लोकतांत्रिक तरीके से चुने गए नेता को सौंपा. ऐसा करते हुए उन्होंने दलाई लामा की 368 वर्षीय परम्परा, जो तिब्बत के आध्यात्मिक और राजनौतिक प्रमुख दोनों के रूप में कार्य कर रही थी, को औपचारिक रूप से समाप्त किया.

पन्द्रहवें दलाई लामा की पहचान के लिए दिया है यह निर्देश

1969 में ही परम पावन ने स्पष्ट किया था कि दलाई लामा के पुनर्जन्म को मान्यता दी जाए अथवा नहीं वह तिब्बती, मंगोलियाई और हिमालयी क्षेत्रों के लोगों के निर्णय पर निर्भर था. परन्तु स्पष्ट दिशा निर्देशों के अभाव में, एक स्पष्ट खतरा था कि यदि संबद्धित जनता भावी दलाई लामा को पहचानने के लिए तीव्र इच्छा प्रकट करे तो निहित स्वार्थ राजनीतिक स्थिति का लाभ उठा लेंगे. इसलिए 24 सितंबर 2011 को अगले दलाई लामा की मान्यता के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश प्रकाशित किए गए जिससे किसी तरह के संदेह अथवा धोखे के लिए कोई स्थान न रह जाए.

दलाई लामा ने घोषणा की कि जब वह नब्बे साल के होंगे तो वे वह तिब्बत बौद्ध परम्परा के शीर्ष लामा, तिब्बती जनता और तिब्बती बौद्ध धर्म में रुचि रखने वाले अन्य संबंधित लोगों के साथ परामर्श करेंगे और यह मूल्यांकन करेंगे कि दलाई लामा की संस्था उनके बाद जारी रहे अथवा नहीं. उनके कथन में इस पर भी चिन्तन किया गया कि किन विभिन्न तरीकों से उनके उत्तराधिकारी की पहचान हो सकेगी.

यदि ऐसा निर्णय लिया गया कि एक पन्द्रहवें दलाई लामा को मान्यता दी जानी चाहिए तो ऐसा करने का उत्तरदायित्व प्रमुख रूप से दलाई लामा के गदेन फोडंग ट्रस्ट के संबंधित अधिकारियों पर होगा. उन्हें तिब्बती बौद्ध परम्पराओं के विभिन्न प्रमुख और विश्वसनीय वचन-बद्ध धर्म संरक्षक से परामर्श करना चाहिए, जो दलाई लामा की वंशावली से अविभाज्य रूप से जुड़े हुए हैं. उन्हें इन संबंधित दलों से सलाह और दिशा-निर्देश प्राप्त करना चाहिए और उनके निर्देशानुसार खोज और मान्यता की प्रक्रियाओं को पूरा करना चाहिए. दलाई लामा ने कहा है कि वह इस बारे में स्पष्ट लिखित निर्देश छोड़ जाएंगे.

उन्होंने आगे चेतावनी दी कि ऐसे वैध उपायों द्वारा मान्यता प्राप्त पुनर्जन्म के अतिरिक्त, पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना के एजेंटों सहित राजनैतिक उद्देश्य के लिए किसी के भी द्वारा निर्वाचित किसी उम्मीदवार को कोई मान्यता या स्वीकृति नहीं दी जानी चाहिए.