निर्भया मामले में बार-बार आरोपियों को फांसी की सजा टलने पर लोगों ने दी अपनी प्रतिक्रिया

निर्भया मामले में बार-बार आरोपियों को फांसी की सजा टलने पर लोगों ने दी अपनी प्रतिक्रिया-Panchayat Times

नई दिल्ली. निर्भया के दोषियों की बार-बार फांसी की सजा टलने को लेकर दोषियों का मनोबल बढ़ रहा है, जो ठीक नहीं है. यह हम नहीं कह रहे बल्कि यह सवाल आजकल हर आम और खास इस बारे में बात कर रहे है.

इसी को लेकर हमने एक पोल रखा था. पोल में हमने अपने पाठकों से पूछा था कि निर्भया गैंगरेप मामले में आरोपियों की बार-बार फांसी टलने के फैसले को क्या आप सही मानते हैं?

इस पोल में भाग लेने वाले पाठकों में से 82 प्रतिशत लोग यह मानते हैं कि यह फैसला गलत है जबकि18 प्रतिशत लोग इस फैसले का समर्थन करते हैं.

दिल्ली उच्च न्यायालय ने बिते रविवार को केंद्र की उस याचिका पर फैसला सुरक्षित रख दिया. जिसमें उसने निर्भया गैंगरेप और हत्या मामले के चार दोषियों की फांसी की सजा की तामील पर रोक को चुनौती दी है. न्यायाधीश सुरेश कैत ने कहा कि अदालत सभी पक्षों द्वारा अपनी दलीलें पूरी किए जाने के बाद आदेश पारित करेगी. सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट से कहा कि निर्भया सामूहिक बलात्कार एवं हत्या मामले के दोषी कानून के तहत मिली सजा के अमल में विलंब करने की सुनियोजित चाल चल रहे हैं.

दिल्ली उच्च न्यायालय में निर्भया केस के दोषियों की फांसी टलने के खिलाफ दाखिल याचिका पर रविवार को सुनवाई हुई. केंद्र सरकार ने निर्भया मामले के सभी दोषियों की फांसी टालने के आदेश को चुनौती दी थी. सरकार ने निचली अदालत के फैसले के खिलाफ दिल्ली उच्च न्यायालय में याचिका दाखिल की थी. इस याचिका पर दिल्ली उच्च न्यायालय ने चारो दोषियों को नोटिस जारी किया था. दिल्ली उच्च न्यायालय ने निर्भया के चारों दोषियों, तिहाड़ जेल के डीजी और तिहाड़ जेल के अधीक्षक को नोटिस जारी करके जवाब मांगा था. पटियाला हाउस कोर्ट ने शुक्रवार को चारों दोषियों की फांसी को टाल दिया था.

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने उच्च न्यायालय को एक चार्ट बनाकर दिया. उसमें बताया गया कि किसने कब-कब याचिका दाखिल की और कानून का किस तरह दुरुपयोग किया गया. उन्होंने कहा कि साल-साल भर बाद याचिकाएं दाखिल की गई थीं. राष्ट्रपति द्वारा दया याचिका खारिज होने के बाद भी सुप्रीम कोर्ट पहुंचे. हर मौके पर देर की गई. उन्होंने बताया कि पवन की तरफ से ना क्यूरेटिव पिटीशन दाखिल की गई और ना ही दया याचिका. इन्हें यह लग रहा है कि अगर ये याचिका दाखिल नहीं करेंगे तो फांसी से बचे रहेंगे.

फिर टली निर्भया के दोषियों की फांसी, पटियाला हाउस कोर्ट ने अगले आदेश तक लगाई रोक
न्यायाधीश ने तुषार मेहता से पूछा कि हमे बताईए कि सभी दोषी अलग-अलग दया याचिका लगा रहे हैं. दो की खारिज हो गई है और 2 की राष्ट्रपति के पास लंबित हैं, तो क्या किया जाएगा? इस पर तुषार मेहता ने कहा कि दो को फांसी दी जा सकती है. ऐसा नहीं है कि चारों को एक साथ दी जाएगी. पवन की तरफ से ना क्यूरेटिव पिटीशन दाखिल की गई और ना ही दया याचिका, इन्हें यह लग रहा है कि अगर ये याचिका दाखिल नहीं करेंगे तो फांसी से बचे रहेंगे. पवन ने 2018 में ख़ुद को नाबालिग बताया, कोर्ट ने भी याचिका को खारिज़ कर दिया. सुप्रीम कोर्ट में एसएलपी लगाई गई, वो भी खारिज़ हो गई, तो उसके खिलाफ भी पुनर्विचार याचिका दाखिल की गई, उसे भी कोर्ट ने खारिज कर दिया.


तुषार मेहता ने 31 जनवरी के पटियाला हाउस कोर्ट के आदेश को पढ़ा. उन्होंने कहा कि 7 साल से दोषी कानूनी प्रक्रिया से खेल रहे हैं. उन्होंने कहा कि एसएलपी के स्तर तक ही एक अपराध के एक से ज्यादा दोषियों को अलग-अलग फांसी नहीं दी जा सकती. दया याचिका का आधार अलग है.
अक्षय, विनय और पवन की तरफ से एडवोकेट एपी सिंह पैरवी कर रहे हैं. सिंह ने कोर्ट से एफीडेविट फाइल करने की इजाजत मांगी. एपी सिंह ने कोर्ट को बताया कि उनके तीनों मुवक्किलों ने कब कौन सी याचिका लगाई. एपी सिंह ने जेल मैनुअल का 838 रूल पढ़कर सुनाया. उन्होंने कहा कि अगर दोषियों की याचिका लंबित है तो फांसी नहीं दे सकते. अगर एक मामले में एक से ज्यादा दोषी हैं और किसी की भी याचिका लंबित है तो फांसी कैसे दी जा सकती है? दोषी को सभी याचिकाओं के खारिज़ होने पर भी फांसी से पहले समय दिया जाता है, ताकि वह परिजनों से मिल सके और जहनी तौर पर तैयार हो सके.


एपी सिंह ने कहा कि सिर्फ इस मामले में न्यायालय इतना जल्दी में क्यों है? जज ने कहा कि कल को तो आप ये भी कहोगे कि उच्च न्यायालय शनिवार और रविवार को क्यों खुला? एपी सिंह ने कहा कि एक निजी समाचार चैनल के पूर्व संपादक (अजीत अंजुम) ने खुलासा किया कि इस मामले में एक मात्र इकलौते चश्मदीद गवाह अविन्द्र प्रताप पांडे की गवाही भी संदिग्ध है.
केंद्र सरकर की तरफ से कोर्ट में बड़ी दलील दी गई जिसमें कहा गया कि लोग अपनी लड़कियों को सड़क पर घूमने को लेकर आश्वस्त नहीं हैं क्योंकि उन्हें डर है कि सड़कों पर दरिंदे घूम रहे हैं. दिल्ली उच्च न्यायालय ने फैसले सुरक्षित रखा
क्या है पूरा मामला

23 वर्षीय पैरामेडिकल छात्रा से 16 दिसम्बर 2012 की रात में दक्षिण दिल्ली में एक चलती बस में छह व्यक्तियों द्वारा सामूहिक बलात्कार और बर्बरता की गई थी. उसे बाद में बस से नीचे फेंक दिया गया. बाद में छात्रा को निर्भया नाम दिया गया था.


निर्भया ने 29 दिसम्बर 2012 को सिंगापुर के माउंट एलिजाबेथ अस्पताल में इलाज के दौरान दम तोड़ दिया था. मामले के छह आरोपियों में से एक राम सिंह ने तिहाड़ जेल में कथित रूप से आत्महत्या कर ली थी.


आरोपियों में एक किशोर भी शामिल था जिसे एक किशोर न्याय बोर्ड ने दोषी ठहराया था और उसे तीन वर्ष बाद सुधार गृह से रिहा कर दिया गया था. शीर्ष अदालत ने 2017 के अपने फैसले में दोषियों को दिल्ली उच्च न्यायालय और निचली अदालत द्वारा दी गई फांसी की सजा बरकरार रखी थी.