मानवता के लिए संकट उत्पन्न करता बढ़ता कार्बन उत्सर्जन

मानवता के लिए संकट उत्पन्न करता बढ़ता कार्बन उत्सर्जन

नई दिल्ली. पिछले दिनों सितंबर महीने में अमेरिका के सैन फ्रांसिस्को में तीन दिवसीय वैश्विक जलवायु कार्रवाई शिखर सम्मेलन (जीसीएएस) 2018 का आयोजन किया गया. इसमें दुनिया भर से हिस्सा ले रहे राजनेता, विशेषज्ञ, सिविल सोसाइटी के सदस्यों ने इस बात पर चिंता व्यक्त की अगर समय रहते कार्बन उत्सर्जन में कमी नहीं हुई तो मानवता के लिए बड़ा संकट उत्पन्न हो जाएगा.

हालांकि इस अवसर पर संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण प्रमुख एरिक सोलहेम ने प्लास्टिक प्रदूषण के खिलाफ भारत की कार्रवाई की प्रशंसा भी की. इसके पहले जर्मनी के बॉन शहर में पिछले नवंबर महीने में हुए 23वें जलवायु सम्मेलन इस बात पर चिंता व्यक्त की की गई गई कि वर्ष 2020 तक दक्षिण एशिया के देशों खासकर भारत में औसत तापमान में वृद्धि होने फसलों के साथ पशुओं के चरागाह पर भी असर पड़ेगा.

ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन के पूरी दुनिया में जागरुकता फैलाने के लिए काम करने वाली वैश्विक कार्बन परियोजना यानि ग्लोबल कार्बन प्रोजेक्ट ने भी अपनी सालान रिपोर्ट में इस बात का खुलासा किया है कि ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन तेजी से बढ़ रहा है. पिछले साल मानवीय क्रियाओं के चलते ही कार्बन डाय ऑक्साइड का उत्सर्जन लगभग 41 अरब मीट्रिक टन रह है. इस रिपोर्ट में बताया गया है कि चीन के साथ भारत में भी कार्बन उत्सर्जन में वृद्धि हुई है. जिसके नतीजे में इन देशों में ग्लोबल वार्मिंग का खतरा बढ़ा है.

आधुनिक संयंत्र लगाकर कार्बन उत्सर्जन को कम करेगा डालमिया सीमेंट ग्रुप

सितंबर महीने में अमेरिका के सैन फ्रांसिस्को में हुए तीन दिवसीय वैश्विक जलवायु कार्रवाई शिखर सम्मेलन (जीसीएएस) 2018 में भारत की भारत की डालमिया सीमेंट कंपनी ने इस बात का वादा किया कि वह 130 से अधिक नई कॉरपोरेट कंपनियों के साथ मिलकर साइंड बेस्ड कार्बन उत्सर्जन कम करने वाले संयंत्र लगाएगी. डालमिया सीमेंट ग्रुप के सीईओ मेहन्द्र सिंघी ने बताया, ” हमारी कंपनी कार्बन उत्सर्जन को कम करने के लिए साइंड बेस्ड टारगेट इनीशिएटिव यानि सीबीटीआई के साथ मिलकर काम कर रही है.”

कार्बन प्रकटीकरण परियोजना (सीडीपी) द्वारा प्रस्तुत की गई एक रिपोर्ट ‘बिल्डिंग प्रेशर’ के अनुसार पेरिस जलवायु समझौते के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए सीमेंट कंपनियों को अपने कार्बन उत्सर्जन के स्तर में दोगुने से भी अधिक की कमी करनी होगी. वैश्विक कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन में सीमेंट क्षेत्र का योगदान लगभग 6 प्रतिशत है. सीमेंट, दूसरा सबसे प्रदूषित औद्योगिक उत्पाद है जिसका मुख्यतया अवसंरचना निर्माण में प्रयोग किया जाता है. सीमेंट दुनिया में पानी के बाद सबसे अधिक खपत वाला उत्पाद है. एक रिपोर्ट के अनुसार विश्व की प्रमुख 13 सीमेंट उत्पादन कंपनियों का कुल वैश्विक सीमेंट उत्पादन में हिस्सा लगभग 16 प्रतिशत है और इनका कुल बाज़ार पूंजीकरण 150 बिलियन डॉलर है.

जलवायु परिवर्तन के कारण पिघल रहे ग्लेशियर, फट रहे बादल

इसी महीने 4 अक्टूबर को हिमाचल प्रदेश के सोलन जिले में राष्ट्रीय स्तर पर सतत पर्वत विकास शिखर सम्मेलन का आयोजन किया गया. जिसमें देशभर के 11 राज्यों से आए विशेषज्ञों ने भाग लिया. तीन दिनों तक चले इस सम्मेलन में जलवायु परिवर्तन के कारण पहाड़ी राज्यों पर होने वाले असर के बारे में चिंतन किया गया. इस सम्मेलन में विशेषज्ञों ने बताया कि जलवायु परिवर्तन का हिमाचल में असर दिखना आरम्भ हो चुका है. जिसकी वजह से जहां एक ओर अधिक बारिश होने से जानमाल का नुकसान हो रहा है, वहीं बादल फटने और समय से पहले ही बर्फ होने जैसी घटनाएं भी घट रही हैं.

हाल ही में आईपीसीसी द्वारा जारी एक रिपोर्ट के अनुसार धरती के तापमान में पिछले 20 वर्षों में 0.2 डिग्री की बढ़ोतरी हुई है. जलवायु में होने वाले परिवर्तन से अनेक प्राकृतिक प्रकोप सूखा, बाढ़, तूफान इत्यादि में भी वृद्धि होने की संभावना बढ़ गई है. अनेक हिमखंड लुप्त होने की कागार पर हैं. हिमालय क्षेत्र में पड़ने वाला गंगोत्री हिमखंड लगभग 30 मीटर प्रतिवर्ष की दर से कम हो रहा है. हिमाचल में विद्यमान हिमखंडों का विस्तार भी वर्ष 1962 की तुलना में 21 प्रतिशत घट चुका है. इस रिपोर्ट में बताया गया है कि हिमालय के अधिकतर ग्लेशियर सिकुड़ रहे हैं और इन्हें बचाना होगा.

हिमाचल प्रदेश के सेब उत्पादन पर भी पड़ रहा असर

जलवायु परिवर्तन का असर हिमाचल प्रदेश के सेब उत्पादन पर भी पड़ रहा है. सेब उत्पादक किसान अब कम ठंडी जलवायु में उगाए जाने वाले कीवी एवं अनार जैसे फल एवं सब्जियां उगाने के लिए मजबूर हो रहे हैं. जलवायु परिवर्तन के कारण कम होते सेब उत्पादन को देखते हुए किसान यह कदम उठा रहे हैं. निचले एवं मध्यम ऊंचाई (1200-1800 मीटर) वाले पहाड़ी क्षेत्रों, जैसे कुल्लू, शिमला और मंडी जैसे जिलों में यह चलन कुछ ज्यादा ही देखने को मिल रहा है.

समुद्र तल से 1,500-2,500 मीटर की ऊंचाई पर हिमालय श्रृंखला के सेब उत्पादन वाले क्षेत्रों में बेहतर गुणवत्ता के सेब की पैदावार के लिए 1,000-1,600 घंटों की ठंडक होनी चाहिए लेकिन इन इलाकों में बढ़ते तापमान और अनियमित बर्फबारी के कारण सेब उत्पादक क्षेत्र अब ऊंचाई वाले क्षेत्रों की ओर खिसक रहा है. सर्दियों में तापमान बढ़ने से सेब के उत्पादन के लिए आवश्यक ठंडक की अवधि कम हो रही है.

कुल्लू क्षेत्र में ठंडक के घंटों में 6.385 यूनिट प्रतिवर्ष की दर से गिरावट हो रही है.इस तरह पिछले 30 वर्षों के दौरान ठंडक वाले कुल 740.8 घंटे कम हुए हैं. इसका सीधा असर सेब के आकार, उत्पादन और गुणवत्ता पर पड़ता है. वाईएस परमार बागवानी व वानिकी विश्वविद्यालय से जुड़े वैज्ञानिक प्रो. एसके भारद्वाज ने बताया कि ठंड के मौसम में अनियमित जलवायु दशाओं का असर पुष्पण एवं फलों के विकास पर पड़ता है जिसके कारण सेब का उत्पादन कम हो रहा है. प्रो. भारद्वाज के मुताबिक पिछले 20 वर्षों के दौरान यहां सेब की उत्पादकता में कुल 9.405 टन प्रति हैक्टेयर की कमी आई है.

जलवायु परिवर्तन से घट रहा चरागाह, पशुओं पर पड़ सकता है गंभीर असर

कार्बन उत्सर्जन के बढ़ते खतरे को लेकर वैज्ञानिकों ने इस बात की चिंता व्यक्त की है कि वर्ष 2020 तक दक्षिण एशिया के देशों खासकर भारत में औसत तापमान में वृद्धि होने फसलों के साथ पशुओं के चरागाह पर भी असर पड़ेगा. देश में चरागाह पर अध्ययन करने वाले भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान अंतगर्त आने वाले भारतीय चरागाह एवं चारा अनुसंधान संस्थान, झांसी के वैज्ञानिक रविन्द्र सिंह चौहान ने बताया ” देश में160 मिलियन टन दूध उत्पादन के लिए वर्ष 2020 तक 494 मिलियन टन सूखे चारे, 825 मि‍लियन टन हरे चारे और 54 मिलियन टन पशु खाद्य पदार्थों की जरूरत पड़ेगी, लेकिन देश में मात्र 4 प्रतिशत जमीन से ही चारा उगाया जा रहा है. ”
उन्होंने बताया कि देश में चरागाह दिनों-दिन कम होते जा रहे हैं. आज देश में 40 प्रतिशत चारे की है. अगर इसपर ध्यान नहीं दिया गया तो स्थिति विस्फोटक हो जाएगी.

जलवायु परिवर्तन से भारत की 275 मछली की प्रजातियों पर संकट

पिछले साल जर्मनी के बॉन शहर में नवंबर में हुए 23वें जलवायु सम्मेलन में जलवायु परिवर्तन के कारण जलकृषि पर पड़ने वाले प्रभाव की चर्चा की गई थी. इस सम्मेलन में इस बात पर चिंता व्यक्त की गई कि दुनिया भर के समुद्र फिलहाल जलवायु परिवर्तन से प्रभावित हैं और समुद्र पर सागरीय धाराओं, हवाओं और वर्षा पर असर पड़ने की आशंका है. जलवाय परिवर्तन के कारण भारत में पाई जाने वाली 70 वंशों की 275 प्रजातियों पर खतरा मंडरा रहा है.

गेहूं की पैदावार पर मंडरा रहा खतरा:

एक अनुमान के मुताबिक साल 2030 में भारत की जनसंख्या को खिलाने के लिए लगभग 100 मिलियन टन और विश्व जनसंख्या के लिए लगभग 817 मिलियन टन गेहूं की जरुरत पड़ेगी लेकिन इतना गेहूं पैदा नहीं हो पाएगा. रिपोर्ट के अनुसार गेहूं के लिए जो तापमान चाहिए अगर उसमें एक डिग्री सेल्सियस की वृद्धि होती है तो गेहूं का उत्पादन में पांच प्रतिशत का नुकसान हो सकता है.

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली की तरफ से कराए गए एक अध्ययन के अनुसार देश में अगर मार्च महीने में तापमान में एक डिग्री सेल्सियस की बढ़ोत्तरी से 4.5 करोड़ टन गेहूं उत्पादन में कमी हो जाएगी. भारतीय गेहूं और जौ अनुसंधान संस्थान, करनाल, हरियाणा के फसल सुधार विभाग के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. राजेन्द्र सिंह ने बताया ” एक अध्ययन में पाया गया है कि वायुमंडल में गैसों का उत्सर्जन बढ़ जाने से अवशोषित सूर्य की किरणें पूरी तरह वायुमंडल में परावर्तित नहीं होने वायुमंडल का तापमान बढ़ रहा है. ”

उन्होंने बताया कि जलवायु परिवर्तन पर अंतरराष्ट्रीय समिति आईपीसीसी ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि दक्षिण एशिया खासकर भारतीय भू-भाग में साल 2020 तक 0.5-1.2 डिग्री सेल्सियस, साल 2050 तक 0.88-3.16 डिग्री सेल्सियस और साल 2080 तक तापमान में 1.56-5.44 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि होनी की संभावना है.