साक्षात्कार : कांगड़ा चित्रकला को दोबारा लोकप्रिय बनाने वाले चित्रकार धनीराम खुशदिल

भारतीय चित्रकला के इतिहास में ‘कांगड़ा चित्रकला’ का नाम सबसे पहले आता है. विश्व के मानचित्र पर कांगड़ा चित्रकला ने ही पहचान दिलाई है. पहाड़ी सियासतों में फली-फूली यह कला जहां अपनी सुंदरता के लिए जानी जाती है, वहीं कला रेखा-सौंदर्य, भाप प्रदर्शन व इसमें प्रयुक्त सामग्री के लिए भी अपना खास महत्व रखती है. इस कला के अतीत में झांके तो यह पता चलता है कि महाराजा संसार चंद के समय में यह कला खूब पनपी.

कला प्रेमी महाराज संसार चंद के शासन काल को इस कला का स्वार्णिम युग माना जाता है. कला प्रेमी संसार चंद के पतन के साथ ही इस कला का अस्त हो गया. पिछले तीन दशक पहले हम इस कला में झांके तो पता चलता है कि इस कला के चित्रकार समूचे हिमाचल में मात्र दो-तीन ही थे, जो इस कला को बचाए हुए थे. परंतु हिमाचल भाषा एवं संस्कृति विभाग अकादमी के गुरु-शिष्य प्रयासों ने इसे संजीवनी दी. वह पुन: इस चित्रकला को जीवित रखने के साथ-साथ नवोदित चित्रकार भी तैयार किया, जिसमें धनी राम खुश दिल का नाम सर्वोपरि आता है. धनी राम ने चार वर्ष का परीक्षण परंपरागत प्रसिद्ध पहाड़ी चित्रकार स्वर्गीय दुनी लाल रैना से प्राप्त किया और उसके बाद में लघु चित्रकार के विश्व प्रसिद्ध चित्रकार पद्म विजय शर्मा से शिक्षा प्राप्त की.

सवाल : पहाड़ी चित्रकला क्या है?
जवाब : जम्मू से घढवाल तक पनपी पहाड़ी क्षेत्रों की लोक चित्रकला व मुगलशैली का मिश्रण की पहाड़ी चित्रकला है, जो बाद में कांगड़ा, गुलेर, वसहोली चंबा आदि के नामों से जानी जाती है.

सवाल : इस कला की मुख्य विशेषताएं क्या-क्या हैं?
जवाब : कांगड़ा चित्रकला विश्व की लघु चित्र शैलियों में अपना विशेष स्थान रखती है. अजंता-एलोरा की गुफाओं में बने चित्रों के बाद भाप प्रदर्शन व नारी सौंदर्य के लिए कांगड़ा चित्रकला का नाम आता है.

सवाल : किस प्रकार की सामग्री प्रयोग में लाई जाती हैं?
जवाब : रंगों के लिए प्राकृतिक रंग जैसे लाल रंग के लिए संगफर, पीले रंग के लिए वर की हरताल, नीले रंग के लिए पत्थर नील व काले रंग के लिए सरसों का दीप जलाकर उससे बने काजल इत्यादि का प्रयोग किया जाता है. कुछ रंग वनस्पति से भी बनाए जाते हैं. सोने-चांदी के वर्क भी काम में लाए जाते हैं.

सवाल : क्या इस कला से आपको पुरस्कार भी प्राप्त हुए हैं व कहां-कहां प्रदर्शनी लगाए गए हैं?
जवाब : मुझे स्टेट अवार्ड हिमाचल एक्सीलैंसी अवार्ड और चार नैशनल लेवल पुरस्कार मिले हैं. इसके अतिरिक्त मघ्य प्रदेश सरकार की ओर से कालीदास सम्मान, अंतरराष्ट्रीय गीता महोत्सव हरियाणा सरकार की ओर से भी श्रेष्ठ पुरस्कार मिला. हिमाचल प्रदेश के साथ भारत के महानगरों दिल्ली, जयपुर, मुंबई, केरल, तमिलनाडु, भोपाल में भी वर्कशॉप पर प्रदर्शनियां लगाईं हैं. एनआरआई की सहायता से लॉस एंजल्स अमेरिका, जर्मनी और सिंगापुर में भी पहाड़ी चित्रकला का प्रदर्शन कर चुका हूं.

सवाल : सरकार का कला के प्रति रवैया क्या है?
जवाब : विश्व प्रसिद्ध पहाड़ी चित्रकला अपने सौंदर्य के लिए समूचे विश्व में प्रसिद्ध है. राज आश्रय में फली-फूली यह कला राजाओं के पतन के साथ-साथ विलुप्त होती चली गई. सरकार की ओर से इन बहुमुल्यों कलाओं को पढ़ाया तो जाता है, परंतु सिखाया नहीं जाता है. हां हिमाचल प्रदेश सरकार की ओर से पिछले दो-तीन वर्षों में हिमाचल प्रदेश शिमला यूनिवर्सिटी का दो साल का पहाड़ी चित्रकला का कोर्स शुरू हुआ है.

सवाल : अपनी कामयाबी का श्रेय आप किसे देना चाहेंगे?
जवाब : मैं कोई परंपरागत चित्रकार नहीं हूं, मेरे पिता दीवारों पर साधारण से चित्र बनाया करते थे, उन्हीं से प्रेरणा लेकर अपने परम आदरणीय गुरुजनों चंदु लाल रैना, पद्मश्री विजय शर्मा के मार्गदर्शन में यह कामयाबी मिली है.

सवाल : भविष्य में इस कला के प्रति क्या-क्या योजनाएं हैं?
जवाब : बहुत ही जल्दी गांव ढुगियारी में पहाड़ी चित्रकला गैलरी की शुरुआत करने वाला हूं. जिसमें विभिन्न शैलियों पर शोध, कार्यशालाएं, नि:शुल्क प्रशिक्षण का काम किया जाएगा.