नई दिल्ली. बिहार में वोटर लिस्ट रिवीजन को लेकर सियासी घमासान तेज हो गया है। विपक्षी दलों ने चुनाव आयोग (Election Commission) पर बिना किसी राजनीतिक परामर्श के जल्दबाजी में पूरे देश में वोटर लिस्ट अपडेट की प्रक्रिया शुरू करने का आरोप लगाया है। कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, वामपंथी दलों और समाजवादी पार्टी सहित कई नेताओं ने EC से सवाल किया है कि सुप्रीम कोर्ट में SIR से जुड़े केस का नतीजा आए बिना इतने बड़े कदम की क्या ज़रूरत थी।
कोर्ट ने EC को फिलहाल SIR पर रोक लगाने से इनकार किया
गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने बीते सप्ताह SIR यानी Standardization of Identification Records को लेकर दायर याचिकाओं पर सुनवाई की। कोर्ट ने EC को फिलहाल SIR पर रोक लगाने से इनकार किया, लेकिन यह सुझाव दिया कि मतदाता सूची को अपडेट करते समय Voter ID और Ration Card जैसे दस्तावेजों पर भी विचार किया जाए। कोर्ट ने चुनाव आयोग से 21 जुलाई तक जवाबी हलफनामा मांगा है और अगली सुनवाई 28 जुलाई को होनी है।
इससे एक दिन पहले ही EC ने सभी राज्यों के मुख्य निर्वाचन अधिकारियों को पत्र जारी कर SIR के तहत मतदाता सूची पुनरीक्षण की प्रक्रिया शुरू करने को कहा। विपक्ष का तर्क है कि जब सुप्रीम कोर्ट में मामला लंबित है, तो आयोग को देशव्यापी स्तर पर इस तरह की कवायद शुरू नहीं करनी चाहिए थी।
कांग्रेस नेता अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि यह पूरा मामला अभी सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है, ऐसे में चुनाव आयोग की तरफ से बयान देना “निरर्थक” है। वहीं आरजेडी सांसद मनोज झा ने कहा कि बिहार में बिना राजनीतिक दलों की सलाह के प्रक्रिया शुरू करना और उसकी समयसीमा तय करना लोकतांत्रिक भावना के खिलाफ है।
पिछले दरवाजे से NRC लागू करने की साजिश : अली खान
सपा सांसद जावेद अली खान ने EC और बीजेपी दोनों पर निशाना साधते हुए कहा कि यह “मनमानी” है और सुप्रीम कोर्ट के आदेश से पहले कोई कार्रवाई नहीं होनी चाहिए थी। टीएमसी की सागरिका घोष ने इसे “पिछले दरवाजे से NRC लागू करने की साजिश” बताया और पूछा कि क्या EC नागरिक रजिस्टर तैयार करने की दिशा में काम कर रहा है, जो उसका अधिकार क्षेत्र नहीं है।
CPI महासचिव डी. राजा और CPIM सांसद जॉन ब्रिटास ने EC से यह स्पष्ट करने की मांग की कि पूरे देश में इतनी तेजी से प्रक्रिया शुरू करने की आखिर वजह क्या है, खासकर तब जब सुप्रीम कोर्ट इस पर सुनवाई कर रहा है। उनका कहना है कि चुनाव आयोग को चाहिए था कि वह राजनीतिक दलों को विश्वास में लेता और कोर्ट के अंतिम आदेश का इंतज़ार करता।
विपक्ष का एक सुर में आरोप है कि यह पूरी प्रक्रिया गरीब और कमजोर वर्गों को टारगेट करती है, और दस्तावेज़ों के आधार पर बड़े पैमाने पर वोटरों के नाम हटाने का खतरा बन सकता है।
