जलियांवाला बाग नरसंहार : ब्रिटिश इतिहास की शर्मनाक घटना

जलियांवाला बाग जलियांवाला बाग नरसंहार : ब्रिटिश इतिहास की शर्मनाक घटना

नई दिल्ली. आज ही के दिन 99 साल पहले जब अमृतसर में बैसाखी पर्व के दिन लोग खुशियां मना रहे थे उसी समय अंग्रेजों के कहर से एक ऐसी घटना घटी जो आज भी लोगों का रूह कंपा देती है. 1919 में अमृतसर में हुए इस नरसंहार को इतिहास में जलियांवाला बाग नरसंहार के रूप में जाना जाता है. यह भारत के इतिहास में सबसे खौफनाक घटनाओं में से एक है. यह अमानवीय घटना जनरल रेजिनाल्ड डायर के कारण हुई थी. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जलियांवाला बाग नरसंहार के शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की है. इस अवसर पर उन्होंने कहा, “ जलियांवाला बाग नरसंहार के बहादुर शहीदों को श्रद्धांजलि. इन शहीदों के अदम्य साहस और त्याग को हमेशा याद रखा जाएगा. इन्होंने हमारी आजादी के लिए अपनी जिंदगी कुर्बान कर दी थी. ”

यह घटना 13 अप्रैल रविवार के दिन हुई थी जब पूरा पंजाब बैसाखी का जश्न मना रहा था. बैसाखी एक त्योहार है जो कि 1699 में सिखों के दसवें गुरु, गुरु गोबिंद सिंह द्वारा खालसा पंथ की स्थापना करने के उपलक्ष में मनाया जाता है. फिर भी इस विशेष अवसर पर एक ब्रिटिश अधिकारी के आदेश के कारण न केवल पंजाब में बल्कि पूरे देश में दमनकारी विचारधारा की प्रक्रिया के कारण जीवन अस्त-व्यस्त हो गया था.

अमृतसर स्थित जलियांवाला बाग स्मारक का दौरा करते हुए 1997 में महारानी एलिज़ाबेथ ने इस स्मारक पर मृतकों को श्रद्धांजलि दी थी. वहीं 2013 में ब्रिटिश प्रधानमंत्री डेविड कैमरॉन भी इस स्मारक पर आए थे. विजिटर्स बुक में उन्होंनें लिखा कि “ब्रिटिश इतिहास की यह एक शर्मनाक घटना थी. ”

बैसाखी के दिन 13 अप्रैल 1919 को अमृतसर के जलियांवाला बाग में एक सभा रखी गई, जिसमें कुछ नेता भाषण देने वाले थे. शहर में कर्फ्यू लगा हुआ था, फिर भी इसमें सैंकड़ों लोग ऐसे भी थे, जो बैसाखी के मौके पर परिवार के साथ मेला देखने और शहर घूमने आए थे और सभा की खबर सुन कर वहां जा पहुंचे थे. जब नेता बाग में पड़ी रोड़ियों के ढेर पर खड़े हो कर भाषण दे रहे थे, तभी ब्रिगेडियर जनरल रेजीनॉल्ड डायर 90 ब्रिटिश सैनिकों को लेकर वहां पहुंच गया. उन सब के हाथों में भरी हुई राइफलें थीं. नेताओं ने सैनिकों को देखा, तो उन्होंने वहां मौजूद लोगों से शांत बैठे रहने के लिए कहा.

सैनिकों ने बाग को घेर कर बिना कोई चेतावनी दिए निहत्थे लोगों पर गोलियां चलानी शुरु कर दीं. 10 मिनट में कुल 1650 राउंड गोलियां चलाई गईं. जलियांवाला बाग उस समय मकानों के पीछे पड़ा एक खाली मैदान था. वहां तक जाने या बाहर निकलने के लिए केवल एक संकरा रास्ता था और चारों ओर मकान थे. भागने का कोई रास्ता नहीं था. कुछ लोग जान बचाने के लिए मैदान में मौजूद एकमात्र कुएं में कूद गए, पर देखते ही देखते वह कुआं भी लाशों से पट गया.

आज भी मौजूद है शहीदी कुआं :

जलियांवाला बाग में लगी पट्टिका पर लिखा है कि 120 शव तो सिर्फ कुए से ही मिले. शहर में क‌र्फ्यू लगा था जिससे घायलों को इलाज के लिए भी कहीं ले जाया नहीं जा सका. लोगों ने तड़प-तड़प कर वहीं दम तोड़ दिया. अमृतसर के डिप्टी कमिश्नर कार्यालय में 484 शहीदों की सूची है, जबकि जलियांवाला बाग में कुल 388 शहीदों की सूची है.

ब्रिटिश राज के अभिलेख इस घटना में 200 लोगों के घायल होने और 379 लोगों के शहीद होने की बात स्वीकार करते है जिनमें से 337 पुरुष, 41 नाबालिग लड़के और एक 6-सप्ताह का बच्चा था. अनाधिकारिक आंकड़ों के अनुसार 1000 से अधिक लोग मारे गए और 2000 से अधिक घायल हुए.

आधिकारिक रूप से मरने वालों की संख्या 379 बताई गई जबकि पंडित मदन मोहन मालवीय के अनुसार कम से कम 1300 लोग मारे गए. स्वामी श्रद्धानंद के अनुसार मरने वालों की संख्या 1500 से अधिक थी जबकि अमृतसर के तत्कालीन सिविल सर्जन डॉक्टर स्मिथ के अनुसार मरने वालों की संख्या 1800 से अधिक थी.

मुख्यालय वापस पहुंच कर ब्रिगेडियर जनरल रेजीनॉल्ड डायर ने अपने वरिष्ठ अधिकारियों को टेलीग्राम किया कि उस पर भारतीयों की एक फ़ौज ने हमला किया था जिससे बचने के लिए उसको गोलियां चलानी पड़ी. ब्रिटिश लेफ़्टिनेण्ट गवर्नर मायकल ओ डायर ने इसके उत्तर में ब्रिगेडियर जनरल रेजीनॉल्ड डायर को टेलीग्राम किया कि तुमने सही कदम उठाया. मैं तुम्हारे निर्णय को अनुमोदित करता हूं. फिर ब्रिटिश लेफ़्टिनेण्ट गवर्नर मायकल ओ डायर ने अमृतसर और अन्य क्षेत्रों में मार्शल लॉ लगाने की मांग की जिसे वायसरॉय लॉर्ड चेम्सफ़ोर्ड नें स्वीकृत कर दिया.

जांच के लिए बना था हंटर कमीशन :

इस हत्याकाण्ड की विश्वव्यापी निंदा हुई जिसके दबाव में भारत के लिए सेक्रेटरी ऑफ़ स्टेट एडविन मॉण्टेगू ने 1919 के अंत में इसकी जांच के लिए हंटर कमीशन नियुक्त किया. कमीशन के सामने ब्रिगेडियर जनरल रेजीनॉल्ड डायर ने स्वीकार किया कि वह गोली चला कर लोगों को मार देने का निर्णय पहले से ही ले कर वहां गया था और वह उन लोगों पर चलाने के लिए दो तोपें भी ले गया था जो कि उस संकरे रास्ते से नहीं जा पाई थीं. हंटर कमीशन की रिपोर्ट आने पर 1920 में ब्रिगेडियर जनरल रेजीनॉल्ड डायर को पदावनत कर के कर्नल बना दिया गया और अक्रिय सूचि में रख दिया गया. उसे भारत में पोस्ट न देने का निर्णय लिया गया और उसे स्वास्थ्य कारणों से ब्रिटेन वापस भेज दिया गया.

हाउस ऑफ़ कॉमन्स ने उसका निंदा प्रस्ताव पारित किया परंतु हाउस ऑफ़ लॉर्ड ने इस हत्याकाण्ड की प्रशंसा करते हुये उसका प्रशस्ति प्रस्ताव पारित किया. विश्वव्यापी निंदा के दबाव में बाद को ब्रिटिश सरकार ने उसका निंदा प्रस्ताव पारित किया और 1920 में ब्रिगेडियर जनरल रेजीनॉल्ड डायर को इस्तीफ़ा देना पड़ा. जब जलियांवाला बाग में यह हत्याकांड हो रहा था, उस समय उधमसिंह वहीं मौजूद थे और उन्हें भी गोली लगी थी. उन्होंने तय किया कि वह इसका बदला लेंगे. 13 मार्च 1940 को उन्होंने लंदन के कैक्सटन हॉल में इस घटना के समय ब्रिटिश लेफ़्टिनेण्ट गवर्नर माइकल ओ डायर को गोली चला के मार डाला.

विरोध में गुरुदेव रवीन्द्र नाथ टैगोर ने अपनी नाइटहुड को वापस कर दिया था :

गुरुदेव रवीन्द्र नाथ टैगोर ने इस हत्याकाण्ड के विरोध-स्वरूप अपनी नाइटहुड को वापस कर दिया. आजादी के लिए लोगों का हौसला ऐसी भयावह घटना के बाद भी पस्त नहीं हुआ. बल्कि सच तो यह है कि इस घटना के बाद आजादी हासिल करने की चाहत लोगों में और जोर से उफान मारने लगी. हालांकि उन दिनों संचार और आपसी संवाद के वर्तमान साधनों की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी, फिर भी यह खबर पूरे देश में आग की तरह फैल गई.

आजादी की चाह न केवल पंजाब, बल्कि पूरे देश के बच्चे-बच्चे के सिर चढ़ कर बोलने लगी. उस दौर के हजारों भारतीयों ने जलियांवाला बाग की मिट्टी को माथे से लगाकर देश को आजाद कराने का दृढ़ संकल्प लिया. इस घटना से पंजाब पूरी तरह से भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में सम्मिलित हो गया. इसके फलस्वरूप गांधी ने 1920 में असहयोग आंदोलन प्रारंभ किया.