जन आंदोलन सत्याग्रह: किसानों का दर्द देखना हो तो आइए दिल्ली के रामलीला मैदान, ग्राउंड रिपोर्ट

अन्ना हज़ारे एक बार फिर अपनी मांगों को लेकर दिल्ली के रामलीला मैदान में भूख हड़ताल पर बैठ गए हैं. अन्ना किसान, चुनाव सुधार, लोकायुक्त नियुक्ति जैसी मांगों को लेकर अनशन पर हैं. तीन दिनों से अनशन पर बैठे अन्ना से अभी तक सरकार की ओर से किसी ने भी मुलाकात नहीं की है. इस अनशन में अन्ना को सबसे ज़्यादा साथ किसानों से मिल रहा है.

आंदोलन को लेकर सोशल मीडिया पर तमाम तरह की बयानबाजी चल रही है. इन सब के बीच मैं रामलीला मैदान गया और यह जानने की कोशिश करने लगा कि आखिर वाकई में किसानों का क्या कहना है. किसानों ने जो बातें कहीं मुझे लगता है कि सबको ज़रूर पढ़नी चाहिए.

किसानों का दर्द

देश के अलग-अलग राज्यों से आए किसानों के दर्द को यहां आसानी से महसूस किया जा सकता है. कोई किसान मुआवज़े को लेकर दुखी था, तो कोई पानी की किल्लत से जूझ रहे गांव का दर्द लेकर आया था. एक चादर, पानी की बोतल और बैग में रखे कुछ कपड़े लेकर ये किसान इस आस में डटे हैं कि उनके गांव में उनकी आवाज़ नहीं सुनी जाती, लेकिन दिल्ली आकर उनकी आवाज़ ज़रूर सुनी जाएगी. सरकार उनके लिए कुछ न कुछ ज़रूर करेगी.

यह किसान कभी देशभक्ति गीत सुनकर अपने सारे दर्द को भुलाकर हाथों में तिरंगा लिए झूमते हुए दिखते हैं, तो कभी गीत बंद हो जाने के बाद फिर से चेहरे पर शिकन लिए वापस बैठ जाते हैं.

कभी गुस्सा कभी छलका दर्द

महाराष्ट्र से आए कुछ किसान से जब मैंने बात कि तो उनका दर्द छलक पड़ा. एक समय वह सरकार को चेतावनी देते हुए कहते हैं कि सरकार इस ग़लतफ़हमी में हैं कि वह पूर्ण बहुमत में है. हम अगर सरकार बनाना जानते हैं तो सरकार गिराना भी. वह मोदी सरकार के वादों की फ़ेहरिस्त भी गिनाने लगते हैं. लेकिन अगले ही पल उनकी आंख आंसुओं से भर जाती है और गला रुंध जाता है. रुंधे हुए गले से वह अपने हालात बताने की कोशिश करते हैं. वह बताते हैं कि उनके पास पर्याप्त पानी नहीं है जिससे वह खेती कर सकें. कर्ज सिर पर लदा हुआ है, खाने को लाले हैं.

इन सब के बीच महाराष्ट्र से आए एक किसान प्रकाश वागले बताते हैं कि उन्हें किसी भी पार्टी से कोई मतलब नहीं. वह बस इतना चाहते हैं कि सरकार कोई भी हो बस उनकी मांगे सुन ली जाएं. उन्हें बाक़ी सुख-सुविधाओं से कोई मतलब नहीं बस उन्हें ठीक से दो वक्त की रोटी, इस क़र्ज़ और परेशानी से छुटकारा मिल जाए.

इन किसानों को अन्ना से एक आस जगी है. जितने भी किसानों से बात की गई उनका कहना है कि अन्ना ने हमारे दर्द को समझा है. वह आखिरी सांस तक इस आंदोलन में उनका साथ देंगे. यहां उत्तर प्रदेश और पंजाब के अलावा और कई राज्यों से भी किसान डटे हैं.

मीडिया से भी है नाराज़गी    

बात करते-करते अचानक वह मीडिया को लेकर भी सवाल करते हैं. उन्होंने मुझसे ही सवाल कर दिया कि आप बताइए कि क्या वाकई में मीडिया हमारे मुद्दों को ठीक ढंग से उठा रहा है. आखिर हमारी आवाज़ को क्यों नहीं गांव- गांव तक पहुंचाया जा रहा. उन्होंने आरोप लगाया कि मीडिया भी सरकार के दबाव में काम कर रही है.

लेकिन जब हमारी ओर से यह कहा गया कि हम आपकी ही आवाज़ को लोगों तक पहुंचाने आएं हैं तो फिर उनका गुस्सा एक दर्द में बदल गया. भावनात्मक होकर वह हाथ जोड़कर रोने लगे और कहा कि आप ही हमारी आवाज़ बन सकते हैं. हमारे दर्द को आप ही सरकार और देश वासियों तक पहुंचा सकते हैं.

भले ही इनमे मीडिया को लेकर शुरुआत में काफ़ी गुस्सा दिखा हो, लेकिन बाद में इनके अंदर मीडिया से बहुत आस दिखी. उन्होंने कहा कि अभी भी कुछ मीडिया संस्थान ऐसे हैं जो वाकई में हालात को संभाले हुए हैं. उनके अंदर मीडिया से इतनी आस जुड़ी थी कि वह चाहते ही नहीं थे कि हम वहां से हटें, वह लगातार अपने दुःख, दर्द और मांगों को हमसे साझा करते चले जा रहे थे.

कम भीड़ पर जवाब

अन्ना हज़ारे के इस आंदोलन में पिछली बार किए गए आंदोलन के मुकाबले काफ़ी कम संख्या में लोग जुड़े. यह सवाल पूछने पर अचानक वहां बैठे तीन चार किसान हरकत में आए और एक साथ जवाब देने की कोशिश करते दिखे. उनमें  से एक ने समझाना शुरू किया. इनके मुताबिक तीन ऐसी मुख्य वजहें हैं जिससे भीड़ कम दिखी.

राजनीति से दूर आंदोलन

इनके मुताबिक साल 2011 में सभी लोग जुड़े थे, लेकिन इस बार के आन्दोलन में पहले से ही लिखित में लिया जा रहा है कि आप किसी भी पार्टी के नेता, कार्यकर्ता या समर्थक नहीं होने चाहिए. किसी भी राजनीतिक पार्टी को मंच पर आने की इजाज़त नहीं है. उन्होंने कहा कि पिछले बार के आंदोलन में किस पार्टी को फ़ायदा हुआ, किसने पार्टी बनाई यह तो आप सब जानते ही हैं. यही वजह है कि इस बार वो ही लोग आंदोलन से जुड़े हैं जो वाकई में सूरत बदलने को लेकर गंभीर हैं.

सरकार ने रोका

किसानों का आरोप है कि जिस ट्रेनों से किसान आ रहे हैं उस ट्रेन को ही सरकार की ओर से रद्द कर दिया गया. इनका कहना है कि सरकार पूरी तरह से लगी हुई है कि ज़्यादा से ज़्यादा किसानों को दिल्ली न पहुंचने दिया जाए.

पैसे की किल्लत

ज्यादा संख्या में किसानों के आंदोलन से न जुड़ पाने की वजह वह पैसों की तंगी भी बता रहे हैं. उनके मुताबिक बहुत से ऐसे किसान है जो किराया न होने की वजह से नहीं आ सके. जो आएं हैं उन्हें आपस में चंदा लगाकर टिकट का किराया दिलाया गया.

जो जहां है वहीं से कर रहा प्रदर्शन

ज़्यादातर किसान ऐसे हैं जो पैसे न होने की वजह से नहीं आ सके हैं. ऐसे में वो अपने-अपने गांवों में ही धरने पर बैठ गए हैं. प्रकाश को ऐसा लगा कि उनकी बातें झूठ न लगें तो उन्होंने कागज़ निकालकर दिखाना शुरू किया. कागज़ में कुछ मराठी भाषा में लिखा था, लेकिन वह बताते हैं कि यह किसानों की ओर से पुलिस को लिखित में आंदोलन करने के लिए लिखे हुए इजाज़त पत्र की कॉपी है. इसमें बकायदा लोगों के हस्ताक्षर भी हैं.

महिलाओं में भी दिखा जोश  

तिरंगा रंग की साड़ियों में लिपटी महिलाएं भी रामलीला मैदान में दम भर रहीं थीं. उत्तर प्रदेश के उन्नाव ज़िले से आया यह महिला संगठन भी किसानों के मुद्दे को ज़ोर-शोर से उठा रहा था. हालांकि इस संगठन की दो या तीन
महिलाएं ही मीडिया से बात कर रहीं थी. बाक़ी महिलाओं से जब मैंने बात करने की कोशिश की तो उन्होंने उन तीन महिलाओं की ओर इशारा कर दिया जो शायद उस संगठन का नेतृत्व कर रहीं थीं.

सांप्रदायिकता है बड़ी परेशानी

जैसे ही रामलीला मैदान में मैं दाख़िल हुआ तो सबसे पहले मुझे देशभक्ति गीत पर थिरकते कुछ लोग दिखे. लेकिन इनमे सबसे ख़ास बात यह थी कि अलग-अलग धर्म के लोग एक हाथ में तिरंगा और एक हाथ आपस में गले में डालकर सबकुछ भुलाकर झूम रहे थे.

इसमें से ही एक से बात करने पर कहा गया कि आज जाति-धर्म में उलझाकर असली मुद्दों से भटकाया जा रहा है. चुनाव आने वाले हैं अब तो और भी ऐसे मुद्दे उछाले जाएंगे. लेकिन हम अब इन मुद्दों को हावी नहीं होने देंगे.