पेपर बैग और राखी बनाना सीख रही हैं रांची की महिलाएं

रांची. झारखंड खादी बोर्ड ग्रामीण महिलाओं को प्रशिक्षित कर रोजगार से जोड़ने के लिए लगातार प्रयासरत है और इसी कड़ी में आने वाले भाई-बहन के त्योहार रक्षाबंधन को देखते हुए रेशम के धागों से राखी बनाने का प्रशिक्षण दिया जा रहा है. साथ ही बैन हुई प्लास्टिक बैग को ध्यान में रखते हुए पेपर बैग बनाने का भी प्रशिक्षण दिया जा रहा है. जिससे ग्रामीण महिलाएं रोजगार से जुड़ रही हैं.

झारखंड खादी बोर्ड में महिलाओं को रोजगार से जोड़ने के लिए सिलाई-कढ़ाई से लेकर झारक्राफ्ट के कई सामान बनाने का प्रशिक्षण दिया जाता रहा है. ऐसे में रक्षाबंधन को ध्यान में रखते हुए खादी बोर्ड रेशम के धागों से खादी की राखियां बनाने का भी प्रशिक्षण महिलाओं को दे रहा है. सैकड़ों महिलाएं खादी की राखियां बनाने में जी-तोड़ मेहनत कर रही हैं. साथ ही प्लास्टिक बैग पर लगे बैन के बाद महिलाओं को पेपर के बैग बनाने का भी प्रशिक्षण दिया जा रहा है.

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खादी बोर्ड में प्रशिक्षण ले रही महिलाओं और छात्राओं में खासा उत्साह देखा जा रहा है. खादी की राखियां बना रही विनीता ने बताया कि खादी बोर्ड की तरफ से ये एक अच्छी पहल है. जिसके तहत महिलाओं को प्रशिक्षण दिया जा रहा है और उनके द्वारा बनाई गई राखियों को बाजार में अच्छा रिस्पांस भी मिल रहा है. जिससे महिलाओं को रोजगार भी मुहैया हो पा रहा है. वहीं, पेपर बैग बना रही महिलाओं में भी आत्मविश्वास बढ़ा है. पेपर बैग बना रही एक महिला ने बताया कि प्लास्टिक बैन होने के बाद पेपर बैग की डिमांड भी बढ़ी है. वैसे तो लोग पेपर को रद्दी में फेंक दिया करते हैं, लेकिन अब पेपर का उपयोग बैग बनाने में किया जा रहा है, जो वातावरण को सुरक्षित रखने के लिए भी बेहतर कदम है.

स्वदेशी को भी बढ़ावा

झारखंड खादी बोर्ड के अध्यक्ष संजय सेठ के नेतृत्व में खादी को बढ़ावा देने के लिए ग्रामीण इलाकों में भी महिलाओं को प्रशिक्षण दिया जा रहा है. साथ ही शहरी क्षेत्र में खादी के उत्पादों को मार्केट तक पहुंचाने में विशेष ध्यान दिया जाता है. खादी बोर्ड के अधिकारी कंवलजीत सिंह शंटी ने बताया कि केंद्र और राज्य सरकार की खादी से जुड़ी योजनाओं को अमलीजामा पहनाने के लिए झारखंड खादी बोर्ड के अध्यक्ष संजय सेठ के नेतृत्व में बेहतर प्रयास किए जा रहे हैं. जिसके तहत ग्रामीण इलाकों की महिलाओं को स्वरोजगार से जोड़ने के लिए प्रशिक्षित किया जा रहा है. जिसका लाभ ग्रामीण महिलाओं को मिलता दिख रहा है. उन्होंने बताया कि खादी के कपड़ों को बनाने में बचे हुए कपड़े और धागे से राखियां बनाई जा रही है जो स्वदेशी को भी बढ़ावा देता है. इसके साथ ही लोगों में स्वदेशी राखियों को लेने की रूचि भी देखी जा रही है.