बाबा भलकू की देन है कालका-शिमला रेलवे लाइन

बाबा भलकू बाबा भलकू की देन है कालका-शिमला रेलवे लाइन

शिमला. यूनेस्को की विश्व धरोहर की सूची में शामिल कालका-शिमला रेलवे लाइन के निर्माण की कहानी बेहद रोचक है. 112 वर्ष पुरानी इस रेलवे लाइन को ब्रिटिश इंजीनियरों के बजाय एक अनपढ़ पहाड़ी नौजवान ” बाबा भलकू ” के इंजीनियरिंग कौशल से तैयार किया गया. हिमाचल के दौरे पर गए राष्ट्रपति राम नाथ कोविन्द ने सोमवार को डॉक्टर वाई. एस. परमार यूनिवर्सिटी ऑफ हार्टिकल्चर एंड फोरेस्ट्री के 9वें दीक्षांत समारोह को संबोधित करते हुए बाबा भलकू को याद किया.

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उन्होंने कहा कि सभी जानते हैं कि शिमला में ‘बाबा भलकू रेल म्यूजियम’ की स्थापना की गई है. यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल 112 वर्ष पुरानी कालका-शिमला रेलवे लाइन को बिछाने में ब्रिटिश इंजीनियरों को सफलता नहीं मिल पा रही थी. यहाँ की दुर्गम पहाड़ियों में बाबा भलकू ने रेल ट्रैक का रास्ता सुझाया. ब्रिटिश इंजीनियरों ने भी उनके सुझावों को सम्मानपूर्वक स्वीकार किया. यह आधुनिक शिक्षा और स्थानीय जानकारी के प्रभावी संगम का भी अच्छा उदाहरण है.

चमत्कारी इंजीनियरिंग कौशल के धनी थे बाबा भलकू 

रेल विभाग के अनुसार अत्यंत दुर्गम पहाड़ी क्षेत्र में जब ब्रिटिश इंजीनियर रेलवे लाइन बिछाने में विफल हो गये तब एक स्थानीय युवक बाबा भलकू ने अपने चमत्कारी इंजीनियरिंग कौशल के बूते इस रेलवे लाइन के लिए रास्ता बनाया. ब्रिटिश रेलवे कंपनी के मुख्य इंजीनियर एच. एस हेरिंगटन के लाइन बिछाने की विफलता के बाद भलकू ने 96.57 किलोमीटर लंबे इस रेलवे ट्रैक का खाका तैयार किया. ऐसा कहा जाता है कि बहुमुखी प्रतिमा के धनी भलकू ने इंडो-तिब्बत सड़क संपर्क के लिए भी रास्ता बताया. चायल से करीब आधे घंटे की दूरी पर भलकू का गांव है और वह घर भी है जिसमें वह रहते थे. सौ से ज्यादा साल पुराना यह घर लकड़ी का बना है और अभी तक यह वैसा ही खड़ा है जो उनके इंजीनियरिंग कौशल का एक अद्भुत नमूना है.

बाबा की याद में शिमला में ”बाबा भलकू रेल संग्रहालय ”

भलकू के बारे में एक अनोखी बात यह कही जाती है कि वे जीव-जंतुओं से बहुत प्रेम करते थे और यहां तक के अपने बालों के जुओं को भी शक्कर खिलाते थे. कहा जाता है कि वह जगन्नाथ यात्रा पर गए थे और फिर वहां से कभी लौटे नहीं. इस रेलवे लाइन के निर्माण में भलकू के योगदान को ध्यान में रखते हुये शिमला में ”बाबा भलकू रेल संग्रहालय ” बनाया गया है. संग्रहालय में एक ब्रिटिश अधिकारी का प्रमाण पत्र भी है जिसमें बाबा भलकू के योगदान का जिक्र किया गया है.

नौ नवंबर 1903 को शुरु की गई कालका-शिमला रेल लाइन को मूल रूप से 107 सुरंगों के बीच से निकाला गया था, लेकिन अब यह रेलवे लाइन 102 सुरंगों से होकर गुजरती है. कालका-शिमला टॉय ट्रेन 869 पुलों और 919 तीखे मोड़ों से होकर गुजरती है. इसका सबसे कम 48 डिग्री का तीखा मोड़ इंजीनियरिंग कौशल की मिसाल है. मनमोहक वादियों से गुजरती देश की सबसे संकरी रेल लाइन बेजोड़ इंजीनियरिंग का जीता जागता उदाहरण है.

इस रेलवे लाइन पर सबसे बड़ी सुरंग बड़ोग में है जो एक किलोमीटर लंबी है. बड़ोग सुरंग को कर्नल एस. बड़ोग के नाम पर रखा गया है जिन पर सुरंग के गलत अलाइनमेंट की वजह से हुए नुकसान के लिए ब्रिटिश सरकार ने एक रुपए का जुर्माना लगाया था. इससे आहत होकर उन्होंने इस सुरंग में आत्महत्या कर ली थी. उनकी याद में इस सुरंग का नाम बड़ोग रख दिया गया. कर्नल बड़ोग की मौत के बाद इंजीनियर हेरिंगटन को इसके निर्माण का काम सौंपा गया. उन्होंने इसके निर्माण में बाबा भलकू की सहायता ली. ऐसा कहा जाता है कि बाबा भलकू ने जो रास्ता बताया उसी पर यह सुरंग बनकर तैयार हुई.

द ग्रेटेस्ट नैरो गेज इंजीनियरिंग ऑफ इंडिया’

इस क्षेत्र पर रेल लाइन बिछाने का कार्य बेहद चुनौतीपूर्ण था. चट्टानों के गिरने वाले क्षेत्रों के किनारे निर्माण करने का सवाल ही नहीं था, इसलिए पहाड़ियों की तलहटी में खोदकर रास्ता बनाना एकमात्र विकल्प था. गहरी घाटियों की कम चौड़ाई पर कार्य करने की समस्या से निपटने के लिए उन घाटियों की ऊंचाई को काटकर तथा समतल बनाकर बुद्धिमानी से पुलों का निर्माण किया गया. ‘गिनीज बुक ऑफ रेल फैक्ट्स एंड फीट’ ने इसे ‘द ग्रेटेस्ट नैरो गेज इंजीनियरिंग ऑफ इंडिया’ बताया है. इस रेलवे लाइन को रिकॉर्ड चार वर्ष में पूरा किया गया. यूनेस्को ने 2008 में इसे विश्व धरोहर घोषित किया था.