हिमाचल और उत्तराखंड में बढ़ती लैंडस्लाइड और बादल फटने की घटनाओं के पीछे क्या है प्रमुख कारण? जानिए हिमालय में इस साल आई़ कुछ बड़ी आपदाओं के बारे में

हिमाचल और उत्तराखंड में बढ़ती लैंडस्लाइड और बादल फटने की घटनाओं के पिछे क्या है प्रमुख कारण? जानिए हिमालय में इस साल आई़ कुछ बड़ी आपदाओं के बारे में - Panchayat Times
Landslide in Himachal Pradesh on July 20

नई दिल्ली. हिमाचल प्रदेश के किन्नौर जिले में 25 जूलाई को बड़ी मात्रा में हुए भूस्खलन के कारण नौ पर्यटकों की दुखद मौत ने देश के हिमालयी राज्यों में बढ़ती भूस्खलन की घटनाओं कि ओर ध्यान आकर्षित किया है.

पिछले कुछ दिनों से लगातार हो रही बारिश के चलते हिमाचल के पहाड़ी ढलान अस्थिर हो गए और आसपास के रिहायशी क्षेत्रों में बाढ़ आ गई. अस्थिर ढलानों से नीचे खिसकती भारी चट्टानें स्थानीय निवासियों और पर्यटकों के लिये चिंता का कारण बन रही हैं.

हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र (Ecological System) प्राकृतिक कारणों, मानवजनित उत्सर्जन के चलते उत्पन्न जलवायु परिवर्तन (Climate Change) और आधुनिक समाज (Modern Society) के विकासात्मक प्रतिमानों (Modern Development Goals) के कारण होने वाले परिवर्तनों के प्रभावों और परिणामों के प्रति अतिसंवेदनशील है. 

पश्चिमी हिमालय में आपदाओं के कुछ बड़े उदाहरण

27 जुलाई को हिमाचल के लाहौल जिले में बादल फटने के बाद अचानक आई बाढ़ से अभी तक 9 लोगों की मौत की पुष्टी हो चूकी है जबकि कई अभी भी लापता है.

25 जूलाई को हिमाचल के किन्नौर जिले की सांगला घाटी में दक्षिण-पश्चिम मानसून की भारी बारिश के बाद लैंडस्लाइडस की कई घटनाओं के दौरान एक पर्यटक वाहन पर भारी पत्थर गिरने से नौ पर्यटकों की मौत हो गई और तीन अन्य घायल हो गए.

इससे पहले 12 जूलाई को हिमाचल के कांगड़ा जिले के धर्मशाला के भागसूनाग में बादल फटने के कारण अचानक आई बाढ़ में तीन लोगों की मौत हो गई वहीं कई इमारतें और वाहन बह गए थे.

उत्तराखंड भी प्राकृतिक आपदाओं की चपेट में रहा जहां फरवरी 2021 में चमोली जिले में अचानक आई भीषण बाढ़ में 80 से अधिक लोग मारे गए थे.

हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड जैसे हिमालयी राज्य अपनी पारिस्थितिकी के नुकसान के कारण अपरिवर्तनीय दौर में प्रवेश कर रहे हैं और यहां भूस्खलन की लगातार घटनाएं आम बनती जा रही हैं, जिससे बड़े स्तर पर जान माल का नुकसान हो रहा है.

हिमालयी पारिस्थितिकी के लिये खतरा

हिमालय में बढ़ी है प्राकृतिक आपदाएं:

हिमालयी भूस्खलन और भूकंप के लिये एक अतिसंवेदनशील क्षेत्र हैं. हिमालय का निर्माण भारतीय और यूरेशियाई प्लेटों के टकराने से हुआ है. भारतीय प्लेट के उत्तर दिशा की ओर गति के कारण चट्टानों पर लगातार दबाव बना रहता है, जिससे वे कमजोर हो जाती हैं और भूस्खलन एवं भूकंप की संभावना बढ़ जाती है.

वहीं खड़ी ढलानों, ऊबड़-खाबड़ जमीन, भूकंप की ज्यादा संभावना और अत्यधिक बारिश का मेल इस क्षेत्र को विश्व के सबसे अधिक आपदा वाले क्षेत्रों में से एक बनाता है.

क्या है कारण     

बहुत बड़े स्तर पर प्राकृतिक दोहन

राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर बड़े स्तर पर होने वाली सड़क विस्तार परियोजना (जैसे चार धाम राजमार्ग) से लेकर सोपानी पनबिजली परियोजनाओं (Hydroelectric Projects) के निर्माण तक और कस्बों के अनियोजित विस्तार से लेकर बे रोक टोक पर्यटन तक, भारतीय राज्यों ने क्षेत्र की संवेदनशील पारिस्थितिकी के संबंध में मौजूद चेतावनियों की अनदेखी की है. इस तरह कि असंवेदनशिलता ने प्रदूषण, वनों की कटाई और जल एवं अपशिष्ट प्रबंधन संकट को भी जन्म दिया है.

विकास गतिविधियों के खतरे

बड़ी पनबिजली परियोजनाएं (जो “हरित” ऊर्जा (Green Energy) का एक महत्त्वपूर्ण स्रोत हैं और जीवाश्म ईंधन (Biofuels) से प्राप्त ऊर्जा को स्वच्छ ऊर्जा से प्रतिस्थापित करती हैं) पारिस्थितिकी के कई पहलुओं पर प्रभाव ड़ालती हैं और इसे बादल फटने, अचानक बाढ़ आने, भूस्खलन और भूकंप जैसी घटनाओं के प्रभावों के प्रति संवेदनशील बनाती हैं. 

पहाड़ी क्षेत्रों में विकास का असंगत (Unviable) मॉडल आपदा को स्वयं आमंत्रित करना है, जहां जंगलों को काटना और नदियों पर बांध निर्माण के साथ जलविद्युत परियोजनाएं और बड़े पैमाने पर निर्माण गतिविधियों को आगे बढ़ाया जा रहा है. 

हिमालयी पारिस्थितिकी पर ग्लोबल वार्मिंग का भी प्रभाव

जलवायु-संवेदनशील योजना के प्रति पूर्ण उपेक्षा के भाव के कारण पारिस्थितिकी के लिये खतरा कई गुना बढ़ गया है. ग्लेशियर पिघल रहे हैं, जिसके चलते जलराशि में अचानक हो रही वृद्धि बाढ़ का कारण बन रही है और यह स्थानीय समाज को बड़े स्तर पर प्रभावित करती है.

जंगल में आग की बढ़ती घटनाओं के लिये भी हिमालयी क्षेत्र में होने वाले ग्लोबल वार्मिंग को प्रमुख कारण के रूप में देखा जा रहा है. वनों का कृषि भूमि में बदलाव और लकड़ी, चारा एवं ईंधन की लकड़ी के लिये वनों का दोहन इस क्षेत्र की जैव विविधता के समक्ष कुछ प्रमुख खतरे हैं.