जानिए हरित क्रांति के बारे में जिससे कृषि क्षेत्र में आए बड़े बदलाव

जानिए हरित क्रांति के बारे में जिससे कृषि क्षेत्र में आए बड़े बदलाव - Panchayat Times

नई दिल्ली. आजादी के बाद भारत खाद्यान्नों और अन्य कृषि उत्पादों की भारी कमी से जूझ रहा था. 1947 में देश को आजादी मिलने से पहले बंगाल में भीषण अकाल (1943-45) पड़ा था, जिसमें 21 लाख से अधिक लोगों की मौत हुई थी. इसका मुख्य कारण कृषि को लेकर अग्रेंजी शासन की कमजोर नीतियां थीं. उस समय कृषि के लगभग 10% क्षेत्र में सिंचाई की सुविधा उपलब्ध थी. गेहूं और धान की औसत पैदावार 800 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर के आसपास थी. 

वर्ष 1947 में देश की जनसंख्या लगभग 30 करोड़ थी जो कि वर्तमान की जनसंख्या का लगभग एक-चौथाई है लेकिन खाद्यान्न उत्पादन कम होने के कारण उतने लोगों तक भी अनाज की आपूर्ति करना असंभव था.

रासायनिक उर्वरकों का उपयोग अधिकतर रोपण फसलों में किया जाता था. खाद्यान्न फसलों में किसान गोबर से बनी खाद का ही उपयोग करते थे. पहली दो पंचवर्षीय योजनाओं (1950-60) में सिंचित क्षेत्र के विस्तार व उर्वरकों का उत्पादन बढ़ाने पर जोर दिया गया लेकिन इन सबके बावजूद अनाज संकट का कोई स्थायी समाधान नहीं निकल सका. 

द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद वैश्विक स्तर पर अनाज व कृषि उत्पादन को बढ़ाने के लिये शोध किये जा रहे थे तथा अनेक वैज्ञानिकों द्वारा इस क्षेत्र में कार्य किया जा रहा था. इसमें प्रोफेसर नार्मन बोरलाग प्रमुख हैं जिन्होंने गेहूं की हाइब्रिड प्रजाति का विकास किया था, जबकि भारत में हरित क्रांति का जनक एम एस स्वामीनाथन को माना जाता है.

क्या है हरित क्रांति :

1960 के मध्य में जब पूरे देश में अकाल की स्थिति बनने लगी तो स्थिति और भी दयनीय हो गई. उन परिस्थितियों में भारत सरकार ने विदेशों से हाइब्रिड प्रजाति के बीज मंगाए. अपनी उच्च उत्पादकता के कारण इन बीजों को उच्च उत्पादकता किस्में (High Yielding Varieties- HYV) कहा जाता था. सर्वप्रथम HYV को वर्ष 1960-63 के दौरान देश के 7 राज्यों के 7 चयनित जिलों में प्रयोग किया गया और इसे गहन कृषि जिला कार्यक्रम (Intensive Agriculture district programme- IADP) नाम दिया गया. यह प्रयोग सफल रहा तथा वर्ष 1966-67 में भारत में हरित क्रांति को औपचारिक तौर पर अपनाया गया. 

मुख्य तौर पर हरित क्रांति देश में कृषि उत्पादन को बढ़ाने के लिये लागू की गई एक नीति थी. इसके तहत अनाज उगाने के लिये प्रयुक्त पारंपरिक बीजों के स्थान पर उन्नत किस्म के बीजों के प्रयोग को बढ़ावा दिया गया. पारंपरिक बीजों के स्थान पर HYVs के प्रयोग में सिंचाई के लिये अधिक पानी, उर्वरक, कीटनाशक की आवश्यकता होती थी. अतः सरकार ने इनकी आपूर्ति हेतु सिंचाई योजनाओं का विस्तार किया तथा उर्वरकों आदि पर सब्सिडी देना प्रारंभ किया. प्रारंभ में HYVs का प्रयोग गेहूँ, चावल, ज्वार, बाजरा और मक्का में ही किया गया और गैर खाद्यान्न फसलों को इसमें शामिल नहीं किया गया. परिणामस्वरूप भारत में अनाज उत्पादन में अत्यंत वृद्धि हुई.

हरित क्रांति के आर्थिक प्रभाव:

हरित क्रांति से देश में खाद्यान्न उत्पादन में काफी वृद्धि हुई और भारत अनाज उत्पादन के मामले में आत्मनिर्भर हो सका. वर्ष 1968 में गेहूं का उत्पादन 170 लाख टन हो गया जो कि उस समय का रिकॉर्ड था तथा उसके बाद के वर्षों में यह उत्पादन लगातार बढ़ता गया. हरित क्रांति के बाद कृषि में नवीन मशीनों जैसे- ट्रैक्टर, हार्वेस्टर, ट्यूबवेल, पंप आदि का प्रयोग किया जाने लगा. इस प्रकार तकनीकी के प्रयोग से कृषि का स्तर बढ़ा तथा कम समय और श्रम में अधिक उत्पादन संभव हुआ.

कृषि का मशीनीकरण

कृषि के मशीनीकरण के चलते कृषि के लिए प्रयोग होने वाली मशीनों के अलावा हाइब्रिड बीजों, कीटनाशकों, खरपतवारनाशी और रासायनिक उर्वरकों की मांग में तीव्र वृद्धि हुई. परिणामस्वरूप देश में इससे संबंधित उद्योगों का अत्यधिक विकास हुआ. हरित क्रांति के फलस्वरूप कृषि के विकास के लिये आवश्यक अवसंरचनाए जैसे- परिवहन सुविधा हेतु सड़कें, ट्यूबवेल द्वारा सिंचाई, ग्रामीण क्षेत्रों में विद्युत आपूर्ति, भंडारण केंद्रों और अनाज मंडियों का विकास होने लगा. विभिन्न फसलों के लिये न्यूनतम समर्थन मूल्य (Minimum Support Price- MSP) व अन्य सब्सिडी सेवाओं का प्रावधान भी इसी समय शुरू किया गया. इसी कदम के फलस्वरूप किसानों को उनकी फसलों का उचित मूल्य मिलना संभव हो सका. किसानों को दिये जाने वाले इस प्रोत्साहन मूल्य से वे नई कृषि तकनीकी अपनाने में सक्षम हुए.

किसानों को वित्तीय सहायता

किसानों को वित्तीय सहायता प्रदान करने लिये विभिन्न वाणिज्यिक, सहकारी बैंक तथा कोआपरेटिव सोसाइटी आदि के माध्यम से उन्हें कर्ज देने की सुविधाएं दी जाने लगी. इसी कारण किसान कृषि में लगने वाली लागत को आसानी से इन संस्थाओं से प्राप्त कर सके. हरित क्रांति तथा मशीनीकरण से उत्पादन में हुई बढ़ोतरी के कारण ग्रामीण क्षेत्रों में रोज़गार के नए अवसर विकसित हुए. हरित क्रांति की वजह से पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार तथा ओडिशा से लाखों की संख्या में मजदूर पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में रोजगार की तलाश में जाने लगे.