जानिए भारत-चीन के बीच सैन्य वापसी समझौते के क्या है मायने, 20 फरवरी को डेपसांग, गोगरा-हॉट स्प्रिंग्स और डेमचोक के लिए होगी बातचीत

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नई दिल्ली. 11 फरवरी को संसद में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने बयान देते हुए बताया था कि भारत और चीन पैंगोंग त्सो झील के निकट करीब 10 महीने से जारी तनाव के दौरान तैनात की गई अपनी-अपनी सेनाओं को वापस बुलाने के लिये सहमत हो गए हैं. अब इन स्थानों से दोनों देशों ने अपनी अपनी सेना पीछे हटा ली है.

दोनों पक्षों ने सीमा बलों, बख्तरबंद सैन्य संसाधनों को हटाया पीछे

राजनाथ सिंह ने बयान में बताया था कि दोनों पक्षों ने सीमा बलों, बख्तरबंद सैन्य संसाधनों की वापसी के लिये सहमति के साथ इस क्षेत्र में एक बफर जोन के निर्माण का प्रस्ताव रखा है जो विवादित झील में दोनों देशों द्वारा गश्त पर अस्थायी रोक लगाएगा.

इसके बदले चीन ने भारत से कैलाश पर्वतमाला में अपने कब्ज़े वाली ऊंचाई पर स्थित क्षेत्रों को खाली करने की मांग की है.

सैनिकों की यह वापसी प्रक्रिया वास्तविक नियंत्रण रेखा (Line of Actual Control) पर शांति बहाली की दिशा में एक सकारात्मक शुरुआत है. हालांकि इस क्षेत्र में स्थायी शांति स्थापित करने के लिये कई अन्य महत्त्वपूर्ण मुद्दों को हल करने की आवश्यकता है.

सैन्य वापसी लेकिन सीमित क्षेत्र में

हाल ही में हुई सैन्य वापसी लद्दाख में LAC पर दो स्थानों (पैंगोंग झील का उत्तरी तट और पैंगोंग के दक्षिण में कैलाश पर्वतमाला) तक ही सीमित है. जबकि लद्दाख सीमा पर तीन अन्य विवादित क्षेत्र (डेपसांग, गोगरा-हॉट स्प्रिंग्स और डेमचोक) हैं जहां चीनी सेना (Peoples Liberation Army) ने नियंत्रण रेखा का उल्लंघन किया था.

डेपसांग, गोगरा-हॉट स्प्रिंग्स और डेमचोक के लिए कल बातचीत

हालांकि आज यानि 19 फरवरी को पूरी हुई इस सैन्य वापसी के बाद इन तीन स्थानों के मुद्दे को हल करने के लिए कल यानि 20 फरवरी को चीनी साइड मोल्डो में सेना के शीर्ष अधिकारियों के बीच बातचीत होगी.

डेपसांग मैदान (Depsang Plains)

दरसुब-श्योक-दौलत बेग ओल्डी (DSDBO) रोड, डीबीओ हवाई पट्टी और काराकोरम दर्रे से निकटता के कारण डेपसांग का मैदान चीन के साथ तनाव के मद्देनजर भारत के लिए खासा रणनीतिक महत्त्व रखता है.

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Soldiers destroy the structure built during India-China border Standoff

इसके अलावा दौलत बेग ओल्डी रोड सियाचिन ग्लेशियर पर भारत के नियंत्रण (Control) के लिये भी बहुत जरुरी है. सियाचिन ग्लेशियर भारतीय भू-भाग (Land) पर एकमात्र क्षेत्र है जहां चीन और पाकिस्तान भारत के खिलाफ सैन्य गठजोड़ कर सकते हैं.

ऐसे में डेपसांग पठार की वर्तमान स्थिति गंभीर चिंता का विषय है, जहां चीन ने सामरिक (Strategic) बढ़त प्राप्त कर ली है और वह दौलत बेग ओल्डी (डीबीओ) तथा उस क्षेत्र में हवाई संसाधनों तक भारत की पहुंच को प्रभावित कर सकता है.

बफर जोन के निर्माण को लेकर आशंकाएं

ऐसी आशंकाएं हैं कि भारत और चीन के बीच प्रस्तावित बफर जोन का अधिकांश हिस्सा LAC पर भारतीय सीमा की तरफ होगा, जो वर्तमान में भारत के नियंत्रण वाले क्षेत्र को एक तटस्थ क्षेत्र में परिवर्तित कर देगा.

यह बफर जोन अगर सफल भी हो जाता है तो द्विपक्षीय तनाव पर एक अस्थायी विराम ही प्रदान कर सकता है, लेकिन दोनों पक्षों के आपसी सहमति में LAC के निर्धारण और भारत-चीन सीमा के अंतिम समाधान का विकल्प नहीं होगा.

कैलाश पर्वतमाला में कब्जे में ली गई महत्त्वपूर्ण पहाड़ियों से हटने की मांग

इसके अतिरिक्त पैंगोंग झील के उत्तरी तट से सैनिकों को वापस बुलाने के बदले चीन, भारत से कैलाश पर्वतमाला में कब्जे में ली गई महत्त्वपूर्ण पहाड़ियों से हटने की मांग कर रहा है. अगर यह होता है तो ये लद्दाख में चीन के खिलाफ भारत की एकमात्र बढ़त को खोने के विचार पर प्रश्न खड़ा करता है.

भारत और चीन के बीच अविश्वास की गहरी खाई

पिछले साल हुई घटनाओं ने भारत और चीन के बीच पहले से रहे अविश्वास को और गहरा कर दिया है, जो अभी भी एक बड़ी बाधा बना हुआ है. इसके अतिरिक्त चीन की कार्रवाई हमेशा उसकी प्रतिबद्धताओं से मेल नहीं खाती है.

क्वाड को लेकर भी चीन सतर्क

चीन,  संयुक्त राज्य अमेरिका (USA) और क्वाड (India, the US, Australia and Japan) के साथ भारत की बढ़ती निकटता को लेकर भी सतर्क है. भारत और चीन की विवादित सीमा तथा दोनों पक्षों के बीच बढ़ते अविश्वास के बीच ‘नो पेट्रोल जोन’ के किसी भी उल्लंघन के परिणाम (15 जून 2020 में गालवान घाटी की तरह) बड़े घातक हो सकते हैं.