‘एक राष्ट्र-एक चुनाव’ को लेकर फिर से बहस शुरू, जानिए कहां तक सभंव है ये सोच

'एक राष्ट्र-एक चुनाव' को लेकर फिर से बहस शुरू, जानिए कहां तक सभंव है ये सोच
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नई दिल्ली. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 26 नवंबर को संविधान दिवस के अवसर पर वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से केवड़िया (गुजरात) 80वें अखिल भारतीय पीठासीन अधिकारी सम्मेलन (All India Presiding Officers Conference) के समापन सत्र को संबोधित करते हुए उन्होंने एक बार फिर से ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ और सभी चुनावों के लिये एक एकल (One Voter List) मतदाता सूची को दोहराया.

इसके साथ ही प्रधानमंत्री ने पीठासीन अधिकारियों से कहा कि वे कानूनी किताबों की भाषा को सरल बनायें और पुराने पड़ चुके कानूनों को खत्म करने के लिये एक आसान प्रक्रिया का सुझाव दें.

एक राष्ट्र-एक चुनाव कितना बड़ी है ये सोच

दरअसल ‘एक राष्ट्र-एक चुनाव’ के विचार को अगर भारत में लागू किया जाये तो इसका असर भारत के चुनावों पर बड़े स्तर पर देखने को मिलेगा. इस विचार का मकसद ये है कि, देश में लोकसभा एवं राज्य विधानसभाओं के चुनावों से लेकर पंचायातों तक के चुनाव को एक साथ एक ही समय पर कराया जाए. जिससे दोनों का चुनाव एक निश्चित समय के भीतर हो सके.

कितना फायदा मिलेगा 

एक राष्ट्र एक चुनाव होने से मतदान में होने वाले खर्च, राजनीतिक पार्टियों के खर्च आदि पर नज़र रखने में मदद मिलेगी और जनता के पैसे को भी बचाया जा सकता है. प्रशासनिक व्यवस्था और सुरक्षा बलों पर बढ़ते बोझ को भी कम किया जा सकता है.

इससे सरकारी नीतियों को समय पर लागू करने में मदद मिलेगी और यह भी सुनिश्चित किया जा सकता है कि, प्रशासनिक मशीनरी चुनावी मोड के बजाय विकास संबंधी गतिविधियों में लगी हुई है.

क्या है चुनौतियां :

भारत की संसदीय प्रणाली ब्रिटेन की तरह प्रथाओं एवं परंपराओं के आधार पर भी चलती है, इसी को देखते हुए एक साथ चुनाव कराना एक बड़ी समस्या है. भारत में सरकार लोकसभा (निचले सदन) के प्रति जवाबदेह है और यह संभव है कि सरकार अपना कार्यकाल पूरा करने से पहले गिर जाए और जिस भी समय सरकार गिरती है उसके 6 महीने के अंदर चुनाव करवाना जरूरी है.

वहीं भारत में बहुत सारी राजनितिक पार्टीयां है और सभी राजनीतिक दलों को इस विचार (एक राष्ट्र-एक चुनाव) पर विश्वास दिलाना और उनको एक साथ लाना मुश्किल है.

एक साथ चुनाव कराने के लिये, इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) और वोटर वेरिफाइड पेपर ऑडिट ट्रेल (VVPATs) की दोगुणी से भी अधिक जरूरत पड़ेगी, क्योंकि चुनाव आयोग को अलग-अलग चुनावों को लेकर अतिरिक्त EVM मशीन लगानी होंगी.

मसलन एक गांव के एक बूथ पर एक साथ तीन मशीनें लगानी पड़ेंगी एक लोकसभा के लिए एक विधानसभा के लिए जबकि एक पंचायत चुनाव के लिए लगानी पड़ेगी.

एक राष्ट्र एक चुनाव को लेकर सुझाव :

भारत में साल 1951-52 से साल 1967 तक विधानसभा के साथ-साथ लोकसभा के लिये भी चुनाव हुए थे. इसमें ये तो जोड़ा जा सकता है कि जब में और अब में काफी बदलाव आ चुका है, लेकिन ये अब भी सभंव है. यहां तक कि भारत एक साथ स्थानीय निकायों के लिये भी चुनाव कराने के बारे में सोच सकता है.

राज्य विधानसभाओं के कार्यकाल को लोकसभा के कार्यकाल के साथ जोड़ने के लिये, राज्य विधानसभाओं के कार्यकाल को घटाया जा सकता है और उसके अनुसार उनमें वृद्धि भी की जा सकती है. हालांकि ऐसा करने के लिये संविधान के अनुच्छेद 83, 85, 172, 174 और 356 में संवैधानिक संशोधनों की जरूरत पड़ सकती है. 

एकल मतदाता सूची (One Voter List):

लोकसभा, विधानसभा और अन्य चुनावों के लिए केवल एक मतदाता सूची का उपयोग किया जाना चाहिये. क्योंकि अलग-अलग संस्थाओं द्वारा तैयार की जाने वाली अलग-अलग मतदाता सूचियों के निर्माण में काफी फर्क देखने को मिलता है.

लेकिन राज्य सरकारों को अपने कानूनों को संशोधित करने और नगरपालिका व पंचायत चुनावों के लिये ECI मतदाता सूची को अपनाने के लिये राजी कर पाना कठिन है. इसको लेकर बड़े पैमाने पर आम सहमति की जरूरत होगी.

इसको लेकर राज्यों को चुनाव आयोग की एकल मतदाता सूची अपनाने का विकल्प दिया जाए. चुनाव आयोग की मतदाता सूची में राज्य निर्वाचन आयोग के वार्डों की सूची स्थापित करना एक कठिन कार्य है लेकिन तकनीक के उपयोग से इसे आसानी से किया जा सकता है.