25 सालों में कहां तक लागू हो पाया है देश के आदिवासी बहुल क्षेत्रों में पंचायती राज व्यवस्था के लिए 1996 में लाया गया पंचायत उपबंध विस्तार अधिनियम (पेसा एक्ट)

25 सालों में कहां तक लागू हुआ देश के आदिवासी बहुल क्षेत्रों में पंचायती राज व्यवस्था के लिए 1996 में लाया गया पंचायत उपबंध विस्तार अधिनियम (पेसा एक्ट) - Panchayat Times

नई दिल्ली/रांची. देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने राजस्थान के नागौर जिले में 2 अक्तूबर, 1959 को पंचायती राज व्यवस्था की शुरुआत कि गई थी. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 40 में राज्यों को पंचायतों के गठन का निर्देश दिया गया है.

1992 में संविधान में 73वें एवं 74वें संशोधन के जरिए देश के ग्रामीण तथा शहरी हिस्सों में त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था कायम की गई थी, लेकिन इसके दायरे से आदिवासी बहुल क्षेत्रों को बाहर रखा गया है. ये क्षेत्र संविधान की पांचवीं अनुसूची के तहत आते हैं.

देश में पंचायती राज व्यवस्था के तहत क्या-क्या हो और इसका स्वरूप कैसा हो, इसके लिए सबसे पहले बलवंत राय मेहता के नेतृत्व में 1956 में एक समिति गठित हुई थी. इसके बाद अशोक मेहता के नेतृत्व में 1977 में एक समिति बनी. फिर जीवीके राव समिति ने 1985 में अपनी रिपोर्ट सौंपी. इसके बाद डॉ एलएम सिंघवी समिति की रिपोर्ट 1986 में आयी.

आदिवासी बहुल क्षेत्रों में पंचायती राज व्यवस्था के लिए 1996 पारित किया गया था पंचायत उपबंध विस्तार अधिनियम (पेसा)

वहीं देश के आदिवासी बहुल क्षेत्रों में पंचायती राज व्यवस्था को और अधिक लोकतांत्रिक बनाने के लिए 1995 में आई भूरिया समिति की सिफारिशों के आधार पर संसद में पंचायत उपबंध विस्तार अधिनियम (पेसा), 1996 पारित किया गया.

पेसा के तहत जनजाति समाज को कई अधिकार मिले हैं, जैसे- ग्राम सभा को आदिवासी समाज की परंपरा, रीति-रिवाज, सांस्कृतिक पहचान, समुदाय, स्थानीय संसाधन और विवाद समाधान के लिए परंपरागत तरीकों के इस्तेमाल का अधिकार है. लेकिन हालत ये है कि आज लगभग 25 साल के बाद भी किसी जनजाति बहुल प्रदेश ने इस कानून को पूरी तरह लागू नहीं किया है.

क्या है पेसा एक्ट

प्रोविजन ऑफ पंचायत (एक्सटेंशन टू शिड्यूल्ड एरियाज) एक्ट-पीईएसए यानी पंचायत उपबंध (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम (पेसा) का लक्ष्य सत्ता की शक्तियों का विकेंद्रीकरण करना एवं आदिवासी समुदायों का उद्दार करना था.

पेसा को 1996 में लागू किया गया था. इसे संविधान की पांचवीं अनुसूची में दर्ज आदिवासी बहुल क्षेत्रों के लिए स्थानीय स्व-शासन के मकसद से लाया गया था, जिसे जिलों के प्रशासन के साथ तालमेल से काम करना था. पेसा को देश के 10 राज्यों, झारखंड, छत्तीसगढ़, ओडिशा, आंध्र प्रदेश, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान और तेलंगाना में लागू किया गया.

लेकिन इस कानून को लागू हुए 25 वर्ष पूरे हो गए हैं, फिर भी यह अक्षमता और ढांचागत कमियों से जूझ रहा है. आज भी देश के लगभग 40 फीसदी राज्यों ने पीईएसए के संदर्भ में आवश्यक नियमों को नहीं बनाया है, उनका यह रवैया इस अधिनियम को और कमजोर करने की उनकी मंशा को जाहिर करता है. देश के चार राज्यों- छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्य प्रदेश और ओडिशा ने तो इस अधिनियम के क्रियान्वयन के लिए अभी तक इसके नियम भी नहीं बनाए हैं.

पेसा के तहत ग्राम सभाओं को निम्नलिखित शक्तियां और कार्य प्रदान किये गए हैं –

भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और विस्थापित व्यक्तियों के पुनर्वास में अनिवार्य परामर्श का अधिकार.

पारंपरिक आस्था और आदिवासी समुदायों की संस्कृति का संरक्षण.

लघु वन उत्पादों का स्वामित्व.

स्थानीय विवादों का समाधान.

भूमि अलगाव की रोकथाम.

गांव के बाजारों का प्रबंधन.

शराब के उत्पादन, आसवन और निषेध को नियंत्रित करने का अधिकार.

साहूकारों पर नियंत्रण का अधिकार.

अनुसूचित जनजातियों से संबंधित कोई अन्य अधिकार.

झारखंड की जनजातीय शासन प्रणाली

वर्ष 2000 में झारखंड को बिहार के दक्षिणी भाग से अलग कर  भारत के 28वें राज्य के रूप में बनाया गया था. यह हिस्सा भूगोल और सामाजिक संरचना की दृष्टि से बिहार के उत्तरी भाग से विशिष्ट रूप से अलग था.

झारखंड में 32 विभिन्न जनजातियां हैं, जिनमें नौ विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह (PVTG) शामिल हैं. राज्य में  2001 की जनगणना के अनुसार, संथाल (34%), उरांव (19.6%), मुंडा (14.8%) और हो (10.5%) संख्या के मामले में प्रमुख जनजातियों में से हैं.