मनरेगा: पंचायतों की बढ़ती जिम्मेदारी ओर घटती गरीबी के जानिए क्या है कारण

'महिलाएं योजना का ज्यादा से ज्यादा लाभ उठाएं'- Panchayat Times

नई दिल्ली/रांची. एक लोकतांत्रिक और लोककल्याणकारी राज्य की सफलता का आकलन इस आधार पर किया जा सकता है कि उसने सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति को ऊपर चढ़ने में किस प्रकार राह दिखलाई है.

मनरेगा को सच्चे अर्थों में ग्रामीण भारत के निर्धनतम और बेरोजगार लोगों की सामाजिक-आर्थिक प्रगति के वाहक के रूप में देखा जा सकता है. मनरेगा की इस सोच को UNDP की ग्लोबल ह्यूमन डेवलपमेंट रिपोर्ट, 2015 से भी पहचान मिली है.

मनरेगा की सफलता

इस समय मनरेगा के माध्यम से 13.55 करोड़ परिवारों के लगभग 26.43 करोड़ कामगारों के पास जॉब कार्ड उपलब्ध हैं. नेशनल काउंसिल ऑफ एप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च (NCAER) की 2015 कि रिपोर्ट के अनुसार मनरेगा शुरू होने के बाद गरीबी में 25% कि कमी देखी गई है.

रिपोर्ट की मानें तो गरीब व सामाजिक रूप से कमजोर वर्गों, जैसे-मजदूर, आदिवासी, दलित एवं छोटे सीमांत कृषकों के बीच गरीबी कम करने में मनरेगा की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है. मनरेगा के चलते ग्रामीण श्रम बाजार में मजदूरी में वृद्धि हुई है तथा श्रमिकों द्वारा मोलभाव करने की क्षमता (Bargaining power) भी बढ़ी है. मनरेगा से जुड़े लोगों द्वारा संगठित क्षेत्र से ऋण लेने की दर में इजाफा हुआ है. जिससे साहूकारों पर निर्भरता काफी घटी है.

मनरेगा योजना के लाभ

मनरेगा योजना में ग्रामीण लोगों को अपने परिवेश में ही रोजगार प्राप्त हो जाता है, केंद्र सरकार ने इस योजना के अंतर्गत 100 कार्य दिवस के रोजगार की गारंटी दी है. छत्तीसगढ़ राज्य में महात्मा मनरेगा योजना के अंतर्गत 100 कार्य दिवस को बढ़ा कर 150 कार्यदिवस की रोजगार गारंटी दी है. 50 कार्य दिवस के व्यय का वहन राज्य सरकार के द्वारा किया जायेगा. ध्यातव्य है कि सूखाग्रस्त क्षेत्र और जनजातीय इलाकों में मनरेगा के तहत 150 दिनों के रोज़गार का प्रावधान है.

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इस योजना के अंतर्गत परिवार के वयस्क सदस्य के द्वारा आवेदन किया जाता है, आवेदन होने के 15 दिन के अंदर रोजगार प्रदान किया जाता है, यदि किसी कारणवश 15 दिन के अंदर रोजगार प्राप्त नहीं होता है, तो सरकार के द्वारा उसे बेरोजगारी भत्ता प्रदान किया जाता है, यह भत्ता पहले 30 दिन का एक चौथाइ होता है, 30 दिन के बाद यह न्यूनतम मजदूरी दर का पचास प्रतिशत प्रदान किया जाता है. इस योजना में मजदूरी का भुगतान बैंक डाकघर के बचत खातों के माध्यम से किया जाता है, आवश्यकता पड़ने पर नगद भुगतान की व्यवस्था विशेष अनुमति लेकर की जा सकती है.

पंचायतों की बढ़ती जिम्मेदारी

नरेगा के लिए परिवार का कोई भी वयस्क सदस्य आवेदन कर सकता है. इसके लिए उसे लिखित अथवा मौखिक तौर पर स्थानीय ग्राम पंचायत में अपना पंजीकरण कराना होता है. ये पंजीयन पाँच साल के लिए होता है. समुचित जाँच के बाद आवेदन करने वाले का जॉब कार्ड मिलता है. जॉब कार्ड में परिवार के सभी वयस्क सदस्यों के फोटो लगे होते हैं. एक फोटोयुक्त जॉब कार्ड आवेदक को निःशुल्क दिया जाता है. इसके लिए किसी भी प्रकार की फीस जमा नहीं करनी पड़ती. आवेदक को मात्र सात दिन में कार्ड मिल जाता है.

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जॉब कार्ड मिलने के बाद ग्राम पंचायत से लिखित अथवा मौखिक में कार्य के लिए आवेदन किया जा सकता है. आवेदक को यह बताना होता है कि उसे कब और किस अवधि में रोजगार चाहिए. एक बार के आवेदन में उसे न्यूनतम 15 दिन का रोजगार जरूर दिया जाता है. ग्राम पंचायत की यह जिम्मेदारी है कि वह काम के लिए आवेदन मिलने पर आवेदक को तारीख सहित पावती रसीद जारी करे. क्योंकि रसीद पर अंकित तिथि के अनुरूप ही उसे 15 दिन के बाद रोजगार मुहैया कराया जाता है. 15 दिन के अन्दर आवेदक को रोजगार नहीं मिलता है तो उसे दैनिक मजदूरी के हिसाब से बेरोजगारी भत्ता देना होगा.

बेरोजगारी का हिसाब सम्बन्धित राज्य में निर्धारित न्यूनतम (न्यूनतम मजदूरी अधिनियम 1948) पर आधारित है. यह भी व्यवस्था दी गई कि यदि केन्द्र सरकार कोई दर निर्धारित करती है तो वही लागू होगी जो किसी भी हाल में 60 रुपये प्रतिदिन से कम नहीं होगी. इस योजना में सामूहिक रूप से भी आवेदन किया जा सकता है. इस तरह देखा जाए तो रोजगार उपलब्ध कराने की प्रमुख जिम्मेदारी ग्राम पंचायत की है. यानी ग्राम पंचायत की जिम्मेदारी बढ़ गई है. वह पहले से ज्यादा सशक्त हो गई है. अब उसे अपने गाँव के मजदूरों को काम दिलाने के लिए दूसरों का मुंह नहीं ताकना पड़ता. साथ ही यह भी फायदा हुआ कि ग्राम पंचायत प्रस्ताव पारित करके ज्यादा से ज्यादा विकास कार्य कर सकती है

क्या है मजदूरी की भुगतान प्रक्रिया

मजदूरी का भुगतान साप्ताहिक आधार पर किया जाता है. किसी भी काम के लिए अधिकतम 15 दिन के भीतर मजदूरी भुगतान करना अनिवार्य है. नियोजक और क्रियान्वयन में पंचायती राज संस्थाओं की केन्द्रीय भूमिका है. अधिनियम में पहले यह व्यवस्था दी गई थी कि काम शुरू होते वक्त मजदूरों की संख्या कम से कम 50 होनी चाहिए, लेकिन अब इसे परिवर्तित कर 10 कर दिया गया है.

मजदूरी का भुगतान मेट की ओर से तैयार की गई मास्टर रोल के हिसाब से किया जाएगा. इसके लिए जॉब कार्डधारी का पोस्ट ऑफिस अथवा बैंक में खाता खोला गया है.