जानिए ‘ग्राम न्यायलयों’ के बारे में जिनको लेकर सुप्रीम कोर्ट ने 7 राज्यों पर लगाया 1-1 लाख रुपए का जुर्माना

जानिए ‘ग्राम न्यायलयों’ के बारे में जिनको लेकर सुप्रीम कोर्ट ने 7 राज्यों पर लगाया 1-1 लाख रुपए का जुर्माना

नई दिल्ली. बीते 3 फरवरी को ‘ग्राम न्यायालय’ की स्थापना से संबंधित एक याचिका की सुनवाई के दौरान न्यायाधीश एन वी रम्नना की अध्यक्षता वाली उच्चतम न्यायालय की खंड पीठ ने देश के कई राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों द्वारा ग्राम न्यायालयों की स्थापना न किये जाने पर असंतोष व्यक्त किया है.

उच्चतम न्यायालय ने ग्राम न्यायालयों की स्थापना के संबंध में जवाब न देने वाले राज्यों (असम, चंडीगढ़, गुजरात, हरियाणा, ओडिशा, पंजाब, तेलंगाना और पश्चिम बंगाल) की सरकारों पर 1-1 लाख रुपए का ज़ुर्माना भी लगाया है. इसके साथ ही न्यायालय ने राज्यों को एक माह के भीतर ग्राम न्यायालयों की स्थापना करने और इस संबंध में अधिसूचना जारी कर न्यायालय को सूचित करने का आदेश दिया है.

क्या है ग्राम न्यायालय?

देश के आम नागरिकों तक न्याय व्यवस्था की पहुंच को बढ़ाने और प्रत्येक नागरिक को देश के न्यायिक तंत्र से जोड़ने के लिये ‘ग्राम न्यायालय अधिनियम, 2008’ के तहत ‘ग्राम न्यायालयों’ की स्थापना की रूपरेखा प्रस्तुत की गई है. इसके अंतर्गत राज्यों को ग्राम पंचायत स्तर पर ‘ग्राम न्यायलयों’ की स्थापना करने के निर्देश दिये गए हैं, जिससे पंचायत स्तर पर दीवानी या फौजदारी (Civil or Criminal) के सामान्य मामलों (अधिकतम सजा 2 वर्ष) में सुनवाई कर नागरिकों को जल्द से जल्द न्याय उपलब्ध कराया जा सके.

ग्राम न्यायालय की स्थापना :

ग्राम न्यायालय अधिनियम-2008 के अनूसार राज्य सरकारों को जिले की प्रत्येक पंचायत या निकटवर्ती पंचायतों के समूह के लिये एक या एक से अधिक ‘ग्राम न्यायालय’ स्थापित करने का अधिकार दिया गया है. अधिनियम के अनुसार, राज्य सरकारें इस संबंध में उच्च न्यायालय से परामर्श के पश्चात् अधिसूचना जारी कर ‘ग्राम न्यायालयों’ की स्थापना कर सकेंगी.

‘ग्राम न्यायालय’ की संरचना

‘ग्राम न्यायालय’ के संचालन के लिये राज्य सरकार हाईकोर्ट के परामर्श पर एक ‘न्यायाधिकारी’ की नियुक्ति करेगी. न्यायाधिकारी के रूप में नियुक्ति की योग्ताएं एक प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट के समान होंगी इसके साथ ही न्यायाधिकारी के वेतन, भत्ते और उसकी सेवा से संबंधित अन्य नियम व शर्तें भी प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट के समान होंगी.

‘ग्राम न्यायालय’ की शक्तियां और अधिकार :

‘ग्राम न्यायालयों’ में सिर्फ उन्ही मामलों की सुनवाई की जाएगी जिनमें अधिकतम सज़ा दो वर्ष का कारावास (ज़ुर्माने के साथ या बगैर) या इससे कम हो, अपराध क्षमायोग्य (प्रशमनीय) हो आदि. अधिनियम के अनूसार ग्राम न्यायालयों को सामान्य मामलों में सुनवाई करने के लिये कुछ शक्तियाँ और अधिकार प्रदान किये गए हैं. केंद्र तथा राज्य सरकारें इस अधिनियम में निर्धारित मामलों की सूची में परिवर्तन या संशोधन कर सकती हैं.

ग्राम न्यायालय आपराधिक मामलों में न्याय प्रक्रिया के सिद्धांतों का पालन करते हुए शीघ्र न्याय प्रदान करने का प्रयास करेंगे. ग्राम न्यायालयों में दीवानी मामलों में आपसी समझौतों और फौजदारी मामलों में ‘प्ली बार्गेनिंग’ के माध्यम से मामलों का निपटारा करने की व्यवस्था भी की गई है.