शायरी के लिए कलेक्टरी छोड़ने वाले लेखक थे फिराक गोरखपुरी

नई दिल्ली. फिराक गोरखपुरी का मूल नाम रघुपति सहाय था. उनका जन्म उत्तर प्रदेश के गोरखपुर शहर में एक कायस्थ परिवार में हुआ था. 29 जून 1914 को उनका विवाह प्रसिद्ध जमींदार विन्देश्वरी प्रसाद की बेटी किशोरी देवी से हुआ. कला स्नातक में पूरे प्रदेश में चौथा स्थान पाने के बाद आई.सी.एस. में चुने गये. 1920 में डिप्टी कलेक्टर की नौकरी छोड़कर स्वराज्य आंदोलन में कूद पड़े. डेढ़ वर्ष की जेल की सजा भी काटी.

जेल से छूटने के बाद जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें अखिल भारतीय कांग्रेस के दफ्तर में अवर सचिव की जगह दिला दी. बाद में नेहरू जी के यूरोप चले जाने के बाद अवर सचिव का पद छोड़ दिया. फिर इलाहाबाद विश्वविद्यालय में 1930 से लेकर 1949 तक अंग्रेजी के के अध्यापक रहे. 1970 में उनकी उर्दू काव्यकृति ‘गुले नग्‍़मा’ पर ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला. 3 मार्च 1982 में फिराक साहब का 85 वर्ष की उम्र में देहांत हो गया था. फिराक गोरखपुरी को उनके योगदान के लिए पद्मभूषण, जनपथ पुरुस्कार और साहित्य अकादमी पुरुस्कार से सम्मानित किया गया.

फिराक गोरखपुरी के जन्मदिन पर पढ़ें, उनकी कुछ चुनिंदा शायरी-