जानिए भारत में कृषि क्षेत्र से जुड़े वो बड़े मुद्दे जो किसान आंदोलन के साथ एक बार फिर से बने चर्चा का हिस्सा

जानिए भारत में कृषि क्षेत्र से जुड़े वो बड़े मुद्दे जो किसान आंदोलन के साथ एक बार फिर से बने चर्चा का हिस्सा - Panchayat Times
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नई दिल्ली. पिछले 49 दिनों से देश की राजधानी दिल्ली की सीमाओं पर हजारों किसानों द्वारा किये जा रहे तीन कृषि कानूनों के विरोध ने देश में एक बार फिर कृषि क्षेत्र से संबंधित मुद्दों को चर्चा के केंद्र में ला दिया है.

भारतीय कृषि क्षेत्र देश की अर्थव्यवस्था में हमेशा ही महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता रहा है. भारत में विश्व का 10वां सबसे बड़ा कृषि योग्य भू-संसाधन मौजूद है. 2011 की कृषि जनगणना के अनुसार, देश की कुल जनसंख्या का 61.5 प्रतिशत हिस्सा ग्रामीण भारत में निवास करता है और कृषि पर निर्भर है.

क्या है प्रदर्शनकारी किसानों की प्रमुख मांगे या चिंताएं

प्रदर्शन कर रहे किसानों का मानना है कि केन्द्र सरकार द्वारा लाए गए ये कानून देश में गेहूं और धान की न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) के आधार पर की जाने वाली खरीद प्रणाली के अंत का संकेत दे रहे हैं. आधुनिक खुदरा और ई-कॉमर्स क्षेत्रों में शामिल कॉरपोरेट्स (अडानी समूह, रिलायंस ग्रुप) द्वारा फसल भंडारण भी किसानों के लिये एक विशेष मुद्दा है.

कृषि भूमि का आकार

घटती खेती योग्य भूमि

आंकड़ों की मानें तो भारत में कृषि योग्य भूमि के आकार में कमी आ रही है, जहां एक ओर वर्ष 2010-11 में यह 15.95 करोड़ हेक्टेयर थी, वहीं वर्ष 2015-16 में घटकर 15.7 करोड़ हेक्टेयर रह गई. वहीं कृषि उत्पादन के लिये उपयोग की जाने वाली कुल भूमि इकाइयों में वर्ष 2010-11 की तुलना में वर्ष 2015-16 में 5 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई है.

बढ़ता परिवार घटती जोत

देश में कृषि उत्पादन हेतु उपयोग की जाने वाली जोतो की कुल संख्या वर्ष 2010-11 में 13.8 करोड़ से बढ़कर 2015-16 में 14.6 करोड़ हो गई है. इसके कारण किसानों की औसत जोत के आकार में कमी आई है, जो कि 1.2 हेक्टेयर से घटकर लगभग 1.08 हेक्टेयर हो गई है.

छोटी जोत के कारण प्राय प्रति इकाई उत्पादन भी कम

क्योंकि छोटी जोत के कारण प्राय प्रति इकाई उत्पादन भी काफी कम होता है, जिसके कारण छोटे और सीमांत किसान प्रायः मजबूरन अपनी उपज बेचने के प्रति संवेदनशील हो जाते हैं.

यह विशेष रूप से उन राज्यों में देखा जाता है जहां कृषि उपज विपणन समिति (AMPC) मंडियों का नेटवर्क काफी कमजोर है. बिहार को हम इसके एक उदाहरण के तौर पर देख सकते है. जहां पर साल 2006 में कृषि उपज विपणन समितियों को खत्म कर दिया था.

किसानों की तुलना में खेत मजदूरों की अधिक संख्या

किसान आमतौर पर खेत का मालिक होता है, जबकि एक खेत पर कई कर्मचारी और मजदूर भी काम करते हैं. श्रम ब्यूरो के हालिया अनुमानों के मुताबिक, भारत का 45 प्रतिशत कार्यबल (काम करने वाले) कृषि में कार्यरत है.

कृषि क्षेत्र में मजदूर

2011 की जनगणना के अनुसार, कृषि के क्षेत्र मे काम करने वालों में लगभग 55 प्रतिशत कृषि मजदूर हैं. ज्ञात हो की भारत में बीज किट, उर्वरक, कीटनाशक, कृषि यंत्र, सूक्ष्म सिंचाई, भूमि विकास सहायता आदि जैसे सभी लाभ केवल उन लोगों को प्राप्त होते हैं, जो खेत पर अपना मालिकाना हक साबित कर सकते हैं.

कृषि सब्सिडी

कृषि क्षेत्र के लिये मंजूर की गई अधिकांश सब्सि बड़े व्यवसायों को दी जा रही है. खाद्य प्रसंस्करण इकाइयों (Food Processing Units) और कोल्ड चेन (Cold Chain Systems) परियोजनाओं को दी जाने वाली सब्सिडी इसका मुख्य उदाहरण है.

न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP)

भारत सरकार द्वारा केवल 23 फसलों के लिये न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की घोषणा की जाती है, जबकि सरकार द्वारा सार्वजनिक वितरण प्रणाली (Public Distribution Systems) संबंधी आवश्यकताओं, जो कि लगभग 65 लाख टन है, को पूरा करने के लिये बड़ी मात्रा में केवल गेहूं और धान (चावल) की ही खरीद की जाती है.

किसानों का ये भी मानना है कि सरकार द्वारा हर साल घोषित किये जाने वाले न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) दरों में प्रतिवर्ष जो वृद्धि की जाती है, वह उत्पादन लागत में होने वाली वृद्धि जितनी नहीं होती है, जिसके कारण यह किसानों की बुनियादी आवश्यकताओं को पूरा करने में भी सक्षम नहीं होती है.

न्यूनतम समर्थन मूल्य की पहुंच व्यापक नहीं

इस योजना का लाभ सभी किसानों और फसलों तक एक समान रूप से नहीं पहुंचता है. देश में ऐसे कई क्षेत्र हैं, जहा. इस योजना का क्रियान्वयन काफी कमजोर है, उदाहरण के तौर पर हम पूर्वोत्तर क्षेत्र को देख सकते है.