एक नजर भारतीय कृषि क्षेत्र की समस्याओं पर

एक नजर भारतीय कृषि क्षेत्र की समस्याओं पर - Panchayat Times

नई दिल्ली/रांची. भारतीय कृषि क्षेत्र देश की अर्थव्यवस्था में हमेशा ही महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता रहा है. भारत में विश्व का 10वां सबसे बड़ा कृषि योग्य भू-संसाधन मौजूद है. वर्ष 2011 की कृषि जनगणना के अनुसार, देश की कुल जनसंख्या का 61.5 प्रतिशत हिस्सा ग्रामीण भारत में निवास करता है और कृषि पर निर्भर है.

वर्ष 2019 में देश के कृषि क्षेत्र में कई प्रकार के हस्तक्षेप और व्यवधान देखे गए. वर्ष 2019 के पहले हिस्से में 75000 करोड़ रुपए के निवेश के साथ प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (PM-KISAN) योजना की शुरुआत की गई. हालांकि वर्ष 2019 का दूसरा हिस्सा इस क्षेत्र के लिये आपदा के रूप में सामने आया और देश के कई हिस्सों में सूखे और बाढ़ की घटनाएँ देखी गईं. इसके अलावा आर्थिक मंदी और सब्जियों खासकर प्याज तथा दालों की कीमतों में वृद्धि ने उपभोक्ताओं (जिसमें किसान भी शामिल हैं) पर बोझ को और अधिक बढ़ा दिया.

क्या है भारत में कृषि की मौजूदा स्थिति

2019-20 के लिए जारी आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार भारतीय आबादी का एक बड़ा हिस्सा प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से अन्य क्षेत्रों की तुलना में रोजगार अवसरों के लिये कृषि क्षेत्र पर अधिक निर्भर है. आर्थिक सर्वेक्षण के आंकड़ों के मुताबिक देश में चालू कीमतों पर सकल मूल्यवर्द्धन (GVA) में कृषि एवं सहायक क्षेत्रों का हिस्सा वर्ष 2014-15 के 18.2 प्रतिशत से गिरकर वर्ष 2019-20 में 16.5 प्रतिशत हो गया है, जो कि विकास प्रक्रिया का स्वभाविक परिणाम है. 

आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार भारत में कृषि का मशीनीकरण 40 प्रतिशत है, जो कि ब्राजील के 75 प्रतिशत तथा अमेरिका के 95 प्रतिशत से काफी कम है. इसके अलावा भारत में लाखों ग्रामीण परिवारों के लिये पशुधन आय का दूसरा महत्त्वपूर्ण साधन है. किसानों की आय दोगुनी करने के लक्ष्य को प्राप्त करने में इसकी भूमिका महत्त्वपूर्ण है.

बीते 5 वर्षों के दौरान पशुधन क्षेत्र 7.9 प्रतिशत की औसत वार्षिक वृद्धि दर से बढ़ रहा है. विश्व कृषि व्यापार में भारत का योगदान मात्र 2.15 प्रतिशत ही है. ज्ञात हो कि वर्ष 1991 में आर्थिक सुधारों की शुरुआत से ही भारत कृषि उत्पादों के निर्यात को निरंतर बनाए हुए है.

कृषि क्षेत्र की बड़ी समस्याएं और चुनौती

पहले कृषि क्षेत्र से संबंधित भारत की रणनीति मुख्य रूप से कृषि उत्पादन बढ़ाने और खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने पर केंद्रित रही है जिसके कारण किसानों की आय में बढ़ोतरी करने पर कभी ध्यान नहीं दिया गया. विगत पचास वर्षों के दौरान हरित क्रांति को अपनाए जाने के बाद, भारत का खाद्य उत्पादन 3.7 गुना बढ़ा है जबकि जनसंख्या में 2.55 गुना वृद्धि हुई है, इसके साथ किसानों की आय वृद्धि संबंधी आंकड़े अभी भी निराशाजनक हैं.

ज्ञात हो कि केंद्र सरकार ने वर्ष 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने का लक्ष्‍य निर्धारित किया है, जो कि इस दिशा में महत्त्वपूर्ण कदम है किंतु यह लक्ष्य काफी चुनौतिपूर्ण माना जा रहा है. ज्यादा फसल कि पैदावार प्राप्त करने और कृषि उत्पादन में निरंतर वृद्धि के लिये बीज एक महत्त्वपूर्ण और बुनियादी कारक है.

अच्छी गुणवत्ता वाले बीजों का उत्पादन करना जितना महत्त्वपूर्ण है, उतना ही महत्त्वपूर्ण है उन बीजों का वितरण करना किंतु दुर्भाग्यवश देश के अधिकतर किसानों तक उच्च गुणवत्ता वाले बीज पहुँच ही नहीं पाते हैं. भारत का कृषि क्षेत्र काफी हद तक मानसून पर निर्भर करता है, प्रत्येक वर्ष देश के करोड़ों किसान परिवार बारिश के लिये प्रार्थना करते हैं.

प्रकृति पर अत्यधिक निर्भरता के कारण कभी-कभी किसानों को नुकसान का भी सामना करना पड़ता है, यदि अत्यधिक बारिश होती है तो भी फसलों को नुकसान पहुँचता है और यदि कम बारिश होती है तो भी फसलों को नुकसान पहुँचता है. इसके अतिरिक्त कृषि के संदर्भ में जलवायु परिवर्तन भी एक प्रमुख समस्या के रूप में सामने आया है और उनकी मौसम के पैटर्न को परिवर्तन करने में भी भूमिका अदा की है.

आजादी के 73 वर्ष बाद भी भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि विपणन व्यवस्था गंभीर हालत में है. इसका विपणन सुविधाओं के अभाव में किसानों को अपने खेत की उपज को बेचने के लिये स्थानीय व्यापारियों और मध्यस्थों पर निर्भर रहना पड़ता है, जिससे उन्हें फसल का सही मूल्य प्राप्त हो पाता.