सूख गई एशिया में मीठे पानी की सबसे बड़ी झील ‘कावर’

कावर सूखने से मचा है हड़कंप, परेशान हो रहे हैं पशुपालक और मछुआरे
कावर झील सूख गई है

-कावर सूखने से मचा है हड़कंप, परेशान हो रहे हैं पशुपालक और मछुआरे
-अब यहां न कमल खिलते हैं और न प्रवासी पक्षी आते हैं, मखाना की बात कोसों दूर
-मछलियों के साथ झील के अन्य जलीय जीव विलुप्त, किसी को नहीं वेटलैंड प्रक्षेत्र की सुध

बेगूसराय. कभी रामसर साइट में शामिल एशिया में मीठे पानी का सबसे बड़ी झील कावर सूख चुका है. कावर में पड़ी सैकड़ों नाव यहां की दुर्दशा बयां कर रही हैं. कावर झील एशिया की सबसे बड़ी शुद्ध जल (वेट लैंड एरिया) की झील है और पक्षी अभयारण्य (बर्ड संचुरी) भी है. बिहार सरकार ने 1980 के दशक में 42 वर्ग किलोमीटर के 6311 हेक्टेयर क्षेत्रफल में फैले इस झील को पक्षी विहार का दर्जा दिया गया था. यहां कि बर्ड संचुरी में मलेशिया, चीन, श्रीलंका, जापान, साइबेरिया, मंगोलिया, रूस आदि देशों से जाड़े के मौसम में प्रवास पर विभिन्न किस्म के विदेशी पक्षी और एक सौ से अधिक किस्म के देसी पक्षी आते थे.

कावर सूखने से मचा है हड़कंप, परेशान हो रहे हैं पशुपालक और मछुआरे

जून का महीना समाप्त हो गया है. सामान्यतया अब तक 144 एमएम वर्षा हो जानी चाहिए थी. लेकिन जलवायु परिवर्तन के कारण अब तक केवल 44 एमएम वर्षा भी नहीं हो सकी है. इसके कारण हर ओर त्राहिमाम-त्राहिमाम मचा है. सात नदियों वाले बेगूसराय की पांच नदियां वाया, बैंती, बलान, चंद्रभागा और छोटी बागमती सुख चुकी है. बूढ़ी गंडक में भी कई जगहों पर लोग पैदल पार कर दूसरी तरफ पहुंच रहे हैं. अन्य सूखी नदी क्षेत्र में खेती हो रही है.

विश्व के वेटलैंड प्रक्षेत्र में होती है इसकी गिनती

कावर के रूप में प्रकृति ने प्रदेश को यहां एक अमूल्य धरोहर प्रदान किया था. विश्व के विभिन्न झीलों के संरक्षण के लिए 1971 में ईरान के रामसर में अंतर्राष्ट्रीय संस्था का गठन किया गया. 1981 में भारत इसका सदस्य बना. जिसमें संरक्षण के लिए चयनित विश्वस्तरीय झीलों में एशिया में मीठे पानी की झील के सबसे बड़े झील के तौर पर कावर को भी स्थान मिला था. इसकी गिनती विश्व के वेटलैंड प्रक्षेत्र में होती है.

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सरकारी अधिसूचना के मुताबिक यहां पशु-पक्षी का शिकार अवैध है. इसमें पक्षियों के साथ-साथ विभिन्न प्रजाति की मछलियां भी पाई जाती हैं. एक अध्ययन के मुताबिक सैंतीस तरह की मछलियों की उपलब्धता इस झील में होती थी. झील के जलीय प्रभाग में कछुआ और सर्प जैसे जंतुओं की कई प्रजातियां तो पाई ही जाती थीं. स्थलीय भाग में सरीसृप वर्ग के छिपकलियों की विभिन्न प्रजातियां भी यहां पाई जाती हैं. झील के निकटवर्ती स्थलीय भाग में नीलगाय, सियार और लोमड़ी बड़ी तादाद में हैं. पशु-पक्षियों के साथ-साथ व्यावसायिक दृष्टिकोण से फल और सब्जियों का उत्पादन भी इस झील में किया जाता था और मखाना, सिंघाड़ा, रामदाना जैसे पौष्टिक तत्वों का उत्पादन यहां सालों भर होता था. लेकिन जैव विविधता और नैसर्गिक, प्राकृतिक संपदा से परिपूर्ण यह झील विलुप्त हो रही है.

कई किलोमीटर क्षेत्र में फैली थी यह झील

किसान प्रभात भारती, मुकेश यादव, विनोद यादव, सुरेश सिंह आदि बताते हैं ‘बारह कोस बरैला, चौदह कोस कबरैला’ मतलब एक समय था जब बरैला झील बारह कोस (36 वर्ग किलोमीटर) में और कबरैला (कावर) झील चौदह कोस (42 वर्ग किलोमीटर) के क्षेत्र में फैली हुई थी. इस झील से उत्तरी बिहार का एक बड़ा हिस्सा कई प्रकार से लाभान्वित होता था. ऊपरी जमीन पर गन्ना, मक्का, गेहूं, जौ आदि की अच्छी पैदावार देती थीं. करीब दो हजार मल्लाह इस झील से मछली पकड़ कर अपना जीवन यापन करते थे. झील किनारे करीब 50 गांव के पशुपालक यहां का घास खिलाकर दूध उत्पादन में आगे रहते थे.

प्रदेश के प्रथम सीएम ने कावर में हमेशा पानी के लिये की थी व्यवस्था

बिहार के प्रथम मुख्यमंत्री डॉ. श्रीकृष्ण सिंह ने कावर में सब दिन पानी की उपलब्धता के लिए बगरस तक नहर बनाकर बूढ़ी गंडक में स्लूइस गेट के माध्यम से जोड़ा था. लेकिन प्रशासनिक और राजनीतिक उपेक्षा के कारण वह नहर बेकार हो गयी. 2007 में बसही के समीप बांध टूटने से गंडक का गाद कावर में भर गया. बरसाती पानी बहकर नालों के जरिए पहले झील में गिरता था, लेकिन अब इन नालों में गाद भर जाने से पानी झील तक नहीं पहुंच पाता है. जिसके कारण हालत बदतर होती गई और आज कावर 90 प्रतिशत से अधिक सूख गया.

कावर सूखने से मचा है हड़कंप, परेशान हो रहे हैं पशुपालक और मछुआरे

कावर के एक दर्जन से अधिक बहियार सूख गए हैं और सिर्फ महालय एवं कोचालय में कुछ पानी बच गया है. जिसके कारण हड़कंप मच गया है. किनारे वाले गांव में पानी का लेयर 15 फीट तक नीचे चला गया है. पशुपालक और किसान परेशान हैं, जीवनयापन करने वाले अधिकांश मछुआरे मजदूरी करने दूसरे जगह चले गये हैं तो सैकड़ों ने कावर को शराब कारखाना बना दिया है. जहां सालोभर खिले कमल झील की शोभा बढ़ाते थे, वहां आज एक भी कमल नहीं दिखता है.
कावर झील और पक्षी विहार अनमोल झील-ताल-तलैयों की श्रृंखला से परिपूर्ण इस बड़े भूभाग में लगातार कभी बाढ़ तो कभी सुखा की स्थिति अत्यंत चिंताजनक है. फिलहाल समय रहते यदि झील को बचाने के लिए प्रयास नहीं किया गया तो आने वाली पीढ़ियां कावर का केवल नाम ही सुन पाएंगी.

केंद्रीय मंत्री और बेगूसराय के सांसद गिरिराज सिंह ने इस संबंध में बताया कि कावर के हालत की जानकारी बराबर मिल रही है. बेगूसराय के डीएम और बिहार सरकार के पर्यावरण एवं वन मंत्रालय सचिव को इस संबंध में रिपोर्ट देने को कहा गया है. जिसके बाद इस ओर नए प्रयास किए जाएंगे.